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तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

संशय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रहस्थान व उपसंहार

उत्पत्तिक्रमः ] प्रमेयनिरूपणम् १८१
कार्यद्रव्याणामुत्पत्तिविनाशक्रमः
तत्र पृथिव्यादीनां चतुर्णां कार्यद्रव्याणामुत्पत्तिविनाशक्रमः कथ्यते
द्वयोः परमाण्वोः क्रियया संयोगे सति द्व्यणुकमुत्पद्यते। तस्य परमाणू
समवायिकारणं, तत्संयोगोऽसमवायिकारणम्, अदृष्टादि निमित्तकारणम् ।
ततो द्व्यणुकानां त्रयाणां क्रियया संयोगे सति त्र्यणुकमुत्पद्यते । तस्य
द्व्यणुकानि समवायिकारणं, शेषं पूर्ववत् । एवं त्र्यणुकैश्चतुर्भिश्चतुरणुकम् ।
चतुरणुकैरपरं स्थूलतरं, स्थूलतरैरपरं स्थूलतमम् । एवं क्रमेण महापृथिवी,
महत्य आपो, महत् तेजो, महांश्च वायुरुत्पद्यते । कार्यगता रूपादयः
स्वाश्रयसमवायिकारणगतेभ्यो रूपादिभ्यो जायन्ते । 'कारणगुणा हि कार्य-
गुणानारभन्ते' इति न्यायात् ।
इन परमाणुओं से ही सारे जगत् की उत्पत्ति होती है। इसलिए पहिले इन
परमाणुओं से इस स्थूल जगत् की उत्पत्ति किस क्रम से होती है यह
दिखलाते हैं ।
उनमें पृथिवी आदि चार कार्यरूप द्रव्यों के उत्पत्ति और विनाश का क्रम
वर्णन करते हैं । दो परमाणुओ में [ परमात्मा के संकल्प और प्राणियों के अदृष्ट
के कारण होने वाली ] क्रिया से संयोग होने पर [ दोनों परमाणुओं से मिल कर
एक ] द्व्यणुक उत्पन्न होता है। दोनों परमाणु उस [ द्व्यणुक ] के समवायि-
कारण [ होते हैं ], उन [ दोनों परमाणुओं ] का संयोग असमवायि कारण, और
अदृष्टादि निमित्त कारण होता है । उसके बाद तीन द्व्यणुकों का [ईश्वर के संकल्प
तथा अदृष्ट आदि से जन्य] क्रिया से संयोग होने पर [ तीन द्व्यणुकों से मिलकर
एक] त्र्यणुक की उत्पत्ति होती है। तीनों द्व्यणुक उस [त्र्यणुक] के समवायिकारण
होते हैं और शेष पूर्ववत् [ अर्थात् तीनों द्व्यणुकों का संयोग त्र्यणुक का असम-
वायिकारण तथा अदृष्टादि निमित्त कारणं होता ] है। इसी प्रकार चार त्र्यणुकों
से चतुरणुक, चतुरणुकों से अन्य स्थूलतर, और स्थूलतरों से अन्य स्थूलतम
[ पदार्थ ] उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार [ महा ] स्थूल पृथिवी, [महत्] स्थूल जल,
[ महत् ] स्थूल तेज, और [ महान् ] स्थूल वायु उत्पन्न होता है । कार्य [ पृथिवी
आदि ] में रहने वाले रूप आदि [ गुण ] अपने [ रूपादि के ] आश्रय [ भूत
द्व्यणुकादि ] के समवायिकारण [परमाणु आदि] में रहने वाले रूप आदि [गुणों]
से उत्पन्न होते हैं। 'कारण के गुण कार्य के गुणों को उत्पन्न करते हैं' इस नियम
के होने से ।
कार्य द्रव्यों के विनाश का क्रम—
आगे विनाश का क्रम कहते हैं । कार्य के विनाश के दो प्रकार हैं ।

१८२ तर्कभाषा [ विनाशक्रमः
इत्थमुत्पन्नस्य रूपादिमतः कार्यद्रव्यस्य घटादेरवयवेषु कपालादिषु
नोदनादभिघाताद्वा क्रिया जायते । तया विभागस्तेनावयव्यारम्भक-
स्यासमवायिकारणीभूतस्य संयोगस्य नाशः क्रियते, ततः कार्यद्रव्यस्य
घटादेरवयविनो नाशः। एतेनावयव्यारम्भकासमवायिकारणनाशे द्रव्य-
नाशो दर्शितः ।
क्वचित् समवायिकारणनाशे द्रव्यनाशो यथा पूर्वोक्तस्यैव पृथिव्यादेः
संहारे सञ्जिहीर्षोर्महेश्वरस्य सञ्जिहीर्षा जायते । ततो द्व्यणुकारम्भकेषु
परमाणुषु क्रिया, तया विभागः, ततस्तयोः संयोगनाशे सति द्व्यणुकेषु
एक समवायिकारण के नाश से कार्य का नाश और दूसरा असमवायिकारण
के नाश से कार्य का नाश। साधारणतः घट आदि कार्यों का नाश उसके
असमवायिकारण अर्थात् अवयव-संयोग के विनाश से ही होता है। परन्तु
प्रलय काल में संसार का नाश प्रायः समवायिकारण के नाश से होता है। उस
समय परमात्मा की संहारेच्छा से विश्व के कारणभूत परमाणुओं में क्रिया
उत्पन्न होती है। उससे द्व्यणुकों के बनाने वाले संयुक्त परमाणुओं में विभाग,
और विभाग से द्व्यणुकारम्भक संयोग का नाश हो जाने से द्व्यणुकों का नाश
तो परमाणु-संयोग रूप असमवायिकारण के नाश से होता है। परन्तु द्व्यणुक
के बाद जो त्र्यणुक आदि का नाश होता है वह समवायिकारण रूप द्व्यणुक
आदि के नाश से होता है। इसलिए समवायिकारण और असमवायिकारण के
नाश से कार्य का नाश होने से कार्य का नाश की दो प्रकार की प्रक्रियाएँ
आगे दिखाते हैं। इनमें पहिले असमवायिकारण के नाश से कार्यनाश की
प्रक्रिया दिखलाते हैं।
इस प्रकार उत्पन्न हुए रूपादिमान् कार्यद्रव्य घट आदि के अवयव रूप कपाल
आदि में नोदन [ चेतन-प्रदत्त प्रेरणा ] अथवा अभिघात [ अचेतन पदार्थ के
साथ संघर्ष ] से क्रिया उत्पन्न होती है। उस से [ संयुक्त कपाल आदि अवयवों
में ] विभाग [ उत्पन्न होता है ] उस [ विभाग ] से अवयवी [ घट आदि ] के
आरम्भक [ असमवायि कारण ] संयोग का नाश होता है। उससे कार्यद्रव्य
घटादि अवयवी का नाश होता है। इस [ उदाहरण ] से अवयवी [ घट आदि ]
के आरम्भक [ कपाल आदि के संयोग रूप ] असमवायि कारण के नाश [ होने ]
से द्रव्य का नाश दिखलाया है।
कहीं समवायिकारण के नाश [ होने ] से भी द्रव्य का नाश [ होता है ]
जैसे पूर्वोक्त पृथिवी आदि के संहार में ही संहारेच्छुक परमात्मा में संहार की
इच्छा उत्पन्न होती है। उससे द्व्यणुकों के आरम्भक परमाणुओं में क्रिया, [ और ]
उससे विभाग [ उत्पन्न होता है ] उस के बाद उन दोनों [ परमाणुओं ] के संयोग

परमाणुसिद्धिः ] प्रमेयनिरूपणम् १८३
नष्टेषु स्वाश्रयनाशात् त्र्यणुकादिनाशः । एवं क्रमेण पृथिव्यादिनाशः ।
यथा वा तन्तूनां नाशे पटनाशः । तद्गतानां रूपादीनां स्वाश्रयनाशेनैव
नाशः । अन्यत्र तु सत्येवाश्रये विरोधिगुणप्रादुर्भावेण विनाशः । यथा
पाकेन घटादौ रूपादिनाश इति ।
परमाणुसिद्धिः
किं पुनः परमाणुसद्भावे प्रमाणम् ?
उच्यते, यदिदं जालं सूर्यमरीचिस्थं सर्वतः सूक्ष्मतमं रज उपलभ्यते
तत् स्वल्पपरिमाणद्रव्यारब्धं कार्यद्रव्यत्वाद् घटवत् । तच्च द्रव्यं कार्यमेव
महद्द्रव्यारम्भकस्य कार्यत्वनियमात् । तदेवं द्व्यणुकाख्यं द्रव्यं
सिद्धम् । तदपि स्वल्पपरिमाणसमवायिकारणारब्धं कार्यद्रव्यत्वाद्
घटवत् । यस्तु द्व्यणुकारम्भकः स एव परमाणुः । स चानारब्ध एव ।
का नाश होने पर द्व्यणुकों के नष्ट हो जाने पर, अपने आश्रय [ अर्थात् त्र्यणुक
के आश्रय द्व्यणुक ] के नाश होने से त्र्यणुक आदि का नाश हो जाता है । इस
प्रकार [ त्र्यणुक के नाश से चतुरणुक आदि के नाश ] क्रम से [ स्थूल ] पृथिवी
आदि का नाश होता है । अथवा जैसे तन्तुओं का नाश हो जानेपर [ होने वाला ]
पट का नाश । [ दोनों उदाहरण समवायिकारण के नाश से कार्य के नाश को
दिखलाने वाले उदाहरण हैं । इन दोनों में ] उन [ त्र्यणुकादि अथवा पट आदि ]
में रहने वाले रूपादि [ गुणों ] का अपने आश्रय [ समवायि कारण ] के नाश से
ही नाश होता है । और अन्यत्र [ घट आदि में ] तो आश्रय [ घटादि ] के विद्यमान
रहते हुए ही विरोधी गुण [ पाकज रक्त रूपादि ] के प्रादुर्भाव से ही [ पूर्ववर्ती
रूपादि का ] नाश होता है । जैसे पाक से घटादि में रूपादि का नाश होता है ।
परमाणुसिद्धि —
[ प्रश्न ] अच्छा फिर परमाणु की सत्ता में क्या प्रमाण है ?
[ उत्तर ] कहते हैं । यह जो [ बन्द कमरे में किवाड़ आदि के किसी छिद्र
में से आती हुई ] सूर्यकिरणों में चारों ओर सूक्ष्मतम धूलि [ के कण ]
उपलब्ध होते हैं [ वह त्रसरेणु या त्र्यणुक कहलाते हैं । उनका षष्ठ भाग परमाणु
होता है ] वह कार्य द्रव्य होने से स्वल्प परिमाण वाले द्रव्य [ तीन द्व्यणुकों ]
से बना है घट के समान [ इस अनुमान से उस त्रसरेणु या त्र्यणुक रूप धूलि-
कण के अवयव रूप द्व्यणुक की सिद्धि होती है ] और वह [ द्व्यणुक ] भी
कार्य [ द्रव्य ] ही है । महत् [ परिमाण वाले त्र्यणुक ] के आरम्भक के कार्य
द्रव्य होने का नियम होने से । इस प्रकार द्व्यणुक नामक [ कार्यभूत ] द्रव्य
सिद्ध हुआ । वह भी स्वल्प परिमाण वाले द्रव्य से बना हुआ है कार्य द्रव्य
होने से घट के समान । और जो [ उस ] द्व्यणुक का कारण है वह ही

१८४ तर्कभाषा [ परमाणुसिद्धिः
ननु कार्यद्रव्यारम्भकस्य कार्यद्रव्यत्वाभिचारात् तस्य कथमनारब्ध-
त्वम् ? उच्यते, अनन्तकार्यपरम्परादोषप्रसङ्गात् । तथा च सत्यनन्त-
द्रव्यारब्धत्वाविशेषेण मेरुसर्षपयोरपि तुल्यपरिमाणत्वप्रसङ्गः । तस्माद्-
नारब्ध एव परमाणुः ।
परमाणु है । और वह अनारब्ध [ नित्य ] ही [ होता ] है ।
[ प्रश्न ] कार्य [ अनित्य ] द्रव्य के आरम्भक [ कारण ] का अवश्य
[ अनित्य ] कार्य द्रव्य होने का नियम होने से [ अनित्य द्वयणुक के उत्पादक ]
उस [ परमाणु ] का अनारब्धत्व [ नित्यत्व ] कैसे [ हो सकता ] है ?
[ उत्तर ] कहते हैं । [ परमाणु को अनित्य कार्य द्रव्य मानने पर ] अनन्त
कार्य-परम्परा का दोष आ जाने से । [ अर्थात् यदि परमाणु का भी कारण
माना जाय तो फिर उसके कारण का भी कारण, फिर उसका भी कारण, इस
प्रकार अनन्त कारण और अनन्त कार्य-परम्परा माननी होगी जिसकी कहीं
विश्रान्ति नहीं होगी ] और वैसा होनेपर [मेरु पर्वत और सरसों के दाना दोनों के]
अनन्त अवयवों से निर्मित होने में समानता होने से मेरु [पर्वत] और सरसों [ के
दाने ] का समान परिमाण होने लगेगा । [ क्योंकि मेरु के भी अनन्त अवयव
हैं और सर्षप के अनन्त अवयव हैं । इस लिये जब दोनों ही अनन्त अवयवों
से बने हैं तो दोनों का परिमाण भी समान मानना चाहिए । परन्तु ऐसा मानना
युक्ति विरुद्ध है ] इसलिए परमाणु अनारब्ध [ नित्य ] ही है ।
परमाणु को नित्य, अनारब्ध, या अवयवरहित मानने पर तो यह कहा
जा सकता है कि सरसों का दाना १०० पचास या किसी परिमित संख्या के
परमाणुओं से बना है और मेरु पर्वत उससे अरबों गुना अधिक परमाणुओं से
बना होने से उनके परिमाण में साम्य प्राप्त नहीं होता है। परन्तु परमाणु के
भी अवयव माने तो फिर सर्षप तथा सुमेरु दोनों के अवयवों की धारा कहीं
समाप्ति न हो सकेगी । अर्थात् दोनों के ही अनन्त अवयव होंगे इसलिए
दोनों के अनन्त अवयवों से निर्मित होने के कारण दोनों का आकार या
परिमाण समान मानना होगा । जो कि युक्तिसङ्गत नहीं है ।
द्वयणुक तथा त्र्यणुक के अवयवों का नियम —
इस प्रकार परमाणु की सत्ता और उसकी नित्यता सिद्ध की । अब यह
बतलाते हैं कि दो परमाणुओं से ही द्वयणुक की, और तीन द्वयणुकों से ही
एक त्र्यणुक की उत्पत्ति होती है ऐसा क्यों मानते हैं ? एक परमाणु से अथवा
तीन परमाणुओं से द्वयणुक की उत्पत्ति क्यों नहीं मानते ? इसी प्रकार

द्व्यणुकाद्यवयवनियमः ] प्रमेयनिरूपणम् १८५
द्व्यणुकादीनामवयवनियमः
द्व्यणुकं तु द्वाभ्यामेव परमाणुभ्यामारभ्यते। एकस्यानारम्भकत्वात्,
त्र्यादिकल्पनायां प्रमाणाभावात्। त्र्यणुकं तु त्रिभिरेव द्व्यणुकैरारभ्यते।

दो द्व्यणुकों अथवा चार द्व्यणुकों से एक त्र्यणुक की उत्पत्ति न मान कर तीन
ही द्व्यणुकों से एक त्र्यणुक की उत्पत्ति क्यों मानते हैं? इसका उत्तर यह है कि
एक परमाणु से कोई कार्य उत्पन्न नहीं हो सकता है। और जब दो परमाणुओं
से द्व्यणुक बन सकता है तब तीन तक क्यों बढ़ा जाय। इसी प्रकार त्र्यणुककी
उत्पत्ति तीन द्व्यणुकोंसे मानी है। उसमें भी एक द्व्यणुक से कार्यकी उत्पत्ति
नहीं हो सकती है। दो द्व्यणुकों से यदि त्र्यणुक की उत्पत्ति माने तो त्र्यणुक में पाया
जाने वाला 'महत्-परिमाण' उत्पन्न नहीं हो सकता है। क्योंकि 'महत्-परिमाण'
की उत्पत्ति के दो ही कारण हैं। एक 'कारण-महत्त्व', और दूसरा 'कारण-बहुत्व ।'
अर्थात् कार्य में जो 'महत्-परिमाण' उत्पन्न होता है वह या तो तब उत्पन्न हो
सकता है जब कि उसके कारण में 'महत्-परिमाण' हो। अथवा उसके कारण
में बहुत संख्या हो। इन दो के अतिरिक्त कार्य में 'महत्-परिमाण' की उत्पत्ति
का और कोई कारण नहीं है। त्र्यणुक का परिमाण 'महत्-परिमाण' है यह
'महत् परिमाण' तब ही उत्पन्न हो सकता है जब कि या तो त्र्यणुक के कारण
अर्थात् द्व्यणुक में 'महत्-परिमाण' हो अथवा उसमें बहुत्व संख्या हो।
सो त्र्यणुक के कारणभूत द्व्यणुक का परिमाण 'अणु-परिमाण' होने से उसमें
'महत्-परिमाण' तो रहता नहीं है। इसलिए त्र्यणुक के 'महत्-परिमाण' का
कारण, 'कारण-महत्त्व' तो बनता नहीं, इसलिए दूसरा कारण अर्थात् 'कारण-
बहुत्व' को ही द्व्यणुक के 'महत्-परिमाण' का कारण मानना चाहिए। और
बहुत संख्या कम से कम तीन की अपेक्षा रखती है। इसलिए दो द्व्यणुकों
से तो त्र्यणुक की उत्पत्ति नहीं हो सकती है। अतएव बहुत्व संख्या वाले तीन
द्व्यणुकों से ही त्र्यणुक की उत्पत्ति माननी चाहिए। और जब बहुत्व संख्या
तीन में बन जाती है तब आगे चार या पांच द्व्यणुकों को त्र्यणुक का कारण
मानने की आवश्यकता नहीं रहती। इसलिए तीन द्व्यणुकों से ही त्र्यणुक की
उत्पत्ति मानना उचित है। इसी बात को आगे कहते हैं।
द्व्यणुक तो दो परमाणुओं से ही बनता है। एक [ परमाणु ] के अनारम्भक
होने से और [ जब दो परमाणुओं से ही द्व्यणुक की उत्पत्ति बन जाती है तब ]
तीन आदि की कल्पना करने में कोई प्रमाण न होने से [ दो परमाणुओं से ही

१८६ तर्कभाषा [ आकाशद्रव्यम्
एकस्यानाम्भकत्वात् । द्वाभ्यामारम्भे कार्यगुणमहत्त्वानुपपत्तिप्रसङ्गात् ।
कार्ये हि महत्त्वं कारणमहत्त्वाद्वा कारणबहुत्वाद्वा । तत्र प्रथमस्यासम्भ-
वाच्चरममेषितव्यम् । न च चतुरादिकल्पनायां प्रमाणमस्ति त्रिभिरेव
महत्त्वारम्भोपपत्तेरिति ।
शब्दगुणमाकाशम् । शब्द-संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-संयोग-विभागवत् ।
एकं विभु नित्यञ्च । शब्दलिङ्गकञ्च ।
शब्दलिङ्गकत्वमस्य कथं ?
परिशेषात् । 'प्रसक्तप्रतिषेधेऽन्यत्राप्रसङ्गात् परिशिष्यमाणे सम्प्रत्ययः
परिशेषः' ।
द्व्यणुक की उत्पत्ति होती है ] । और त्र्यणुक तो तीन द्व्यणुकों से ही उत्पन्न
होता है । एक [ द्व्यणुक ] के आरम्भक होने से । दो [ द्व्यणुकों ] से
[ त्र्यणुक का ] आरम्भ मानने पर कार्य [ त्र्यणुक ] के गुण, महत् [ परिमाण ]
की अनुपपत्ति होने से [ दो [ द्व्यणुकों को त्र्यणुक का उत्पादक नहीं मान सकते
हैं ] । कार्य में महत्त्व [ 'महत् परिमाण' के ] कारण के 'महत् परिमाण'
से अथवा कारण के बहुत्व [ इन दो ही कारणों ] से आता है । उसमें से
[ त्र्यणुक के महत्त्व के उपपादन के लिए ] प्रथम [ अर्थात् कारण-महत्त्व ]
के असम्भव होने से [ त्र्यणुक के कारण द्व्यणुक में 'महत्-परिमाण' है ही नहीं
क्योंकि उसका परिमाण 'अणु-परिमाण' माना गया है । इसलिये कारणमहत्त्वात्
त्र्यणुक से महत्त्व असम्भव होने से ] अन्तिम [ अर्थात् 'कारण-बहुत्व' को ही
त्र्यणुक में 'महत्-परिमाण' का उत्पादक ] मानना चाहिए । [और वह बहुत्व,
तीन संख्या में बन जाता है इसलिये उससे अधिक ] चार आदि [ को कारण
मानने ] की कल्पना में प्रमाण नहीं है । तीन द्व्यणुकों से ही [त्र्यणुक के] महत्त्व
की उपपत्ति हो जाने से [ तीन से अधिक अथवा कम द्व्यणुकों को त्र्यणुक का
कारण मानना उचित नहीं है अपितु तीन द्व्यणुकों के ही त्र्यणुक का कारण
मानना चाहिए ] ।
आकाश-निरूपण—
शब्द गुण वाला आकाश है । १ शब्द, २ संख्या, ३ परिमाण, ४ पृथक्त्व,
५ संयोग, और ६ विभाग [ इन ६ गुणों ] वाला है । [ वह ] एक, नित्य, और
विभु और शब्दलिङ्गक [ अर्थात् शब्द रूप लिङ्ग से अनुमान द्वारा सिद्ध होने
वाला ] है ।
[ प्रश्न ] इस [ आकाश ] का शब्दलिङ्गत्व कैसे है !
[ उत्तर ] परिशेष [अनुमान] से [ सिद्ध होने के कारण ] । 'प्राप्त' का निषेध

आकाशद्रव्यम् ] प्रमेयनिरूपणम् १८७
तथाहि शब्दस्तावद् विशेषगुणः सामान्यवत्त्वे सत्यस्मदादिबाह्ये-
न्द्रियग्राह्यत्वाद् रूपांदिवत् । गुणश्च गुण्याश्रित एव । न चास्य पृथि-
व्यादिचतुष्टयमात्मा च गुणी भवितुमर्हति, श्रोत्रग्राह्यत्वाच्छब्दस्य । ये
हि पृथिव्यादीनां गुणा न ते श्रोत्रेन्द्रियेण गृह्यन्ते, यथा रूपादयः,
शब्दस्तु श्रोत्रेण गृह्यते । न दिक्कालमनसां गुणो विशेषगुणत्वात् । अत
एभ्योऽष्टभ्योऽतिरिक्तः शब्दगुणी एषितव्यः, स एवाकाश इति ।
स चैको, भेदे प्रमाणाभावात् । एकत्वेनैवोपपत्तेः। एकत्वाच्चाकाशत्वं
नाम सामान्यमाकाशे न विद्यते सामान्यस्यानेकवृत्तित्वात्-विभु चाकाशम्

हो जाने पर अन्य [ किसी को प्राप्ति ] का प्रसङ्ग न होने से जो बच रहे उसको
स्वीकार कर लेना 'परिशेष' [ अनुमान कहलाता है इस प्रकार परिशेषानुमान
का लक्षण भाष्यकार ने किया ] है ।
[ यहां शब्द के विषय में परिशेषानुमान का यह लक्षण इस प्रकार घटता
है कि ] जैसे शब्द सामान्य [ जाति ] युक्त होकर हमारी बाह्य एक [ श्रोत्र ]
इन्द्रिय से ग्राह्य होने से रूपादि के समान 'विशेष गुण' है। और गुण, गुणी के
आश्रित ही होता है । [ आकाश को छोड़कर शेष आठ द्रव्यों में से [ पृथिवी
आदि चार [ पृथिवी, अप्, तेज, वायु ] और आत्मा [ यह पांच ] इस [ शब्द-
गुण ] के गुणी नहीं हो सकते हैं। शब्द के श्रोत्र-ग्राह्य होने से [ पृथिवी आदि
चार और आत्मा इन पांचों के विशेष गुणों में से कोई भी श्रोत्र-ग्राह्य नहीं है
अतएव श्रोत्रग्राह्य शब्द इन पाँचों में से किसी का गुण नहीं हो सकता है ] जो
पृथिवी आदि के गुण हैं वह श्रोत्र इन्द्रिय से गृहीत नहीं होते हैं। जैसे रूपादि ।
और शब्द तो श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत होता है । [ इसलिए शब्द पृथिवी आदि
चार तथा आत्मा इन पांच का गुण नहीं है ] और न दिक्, काल, तथा मन
[ इन तीन ] का गुण है विशेष गुण होने से । [ दिक्, काल, और मन इन
तीनों में रहने वाले गुण सामान्य गुण हैं विशेष गुण नहीं और शब्द विशेष
गुण है इसलिए वह इन तीनों का भी गुण नहीं है ] । इसलिए इन आठों से
अतिरिक्त शब्द [ गुण ] का गुणी मानना चाहिए । वह ही आकाश है ।
और वह एक है भेद में [ साधक ] प्रमाण न होने से एकत्व से ही कार
हो जाने से [ आकाश को अनेक मानने की आवश्यकता नहीं है ] । एक होने के
कारण ही 'आकाशत्व' नामक सामान्य [ जाति ] आकाश में नहीं रहता है ।
सामान्य के अनेक में रहने वाला होने से । और आकाश विभु अर्थात् 'परममहत्-

१८८ तर्कभाषा [ आकाशद्रव्यम्
परममहत्परिमाणवदित्यर्थः¹। सर्वत्र तत्कार्योपलब्धेः। अतएव विभु-
त्वान्नित्यमिति।
परिमाण' वाला है। सर्वत्र उसका कार्य [ शब्द ] उपलब्ध होने से [ आकाश
विभु है ] और विभु होने से नित्य है।
एक होने से आकाश में 'आकाशत्व' जाति नहीं है। इसके कहने का
अभिप्राय यह है कि 'नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वम् सामान्यम्' यह
'सामान्य' का लक्षण किया गया है। अर्थात् 'सामान्य' नित्य और अनेक में
रहने वाला धर्म होता है। जैसे 'घटत्व', 'पटत्व' आदि 'सामान्य' कहलाते हैं।
वह अनेक घट तथा अनेक पट व्यक्तियों में रहने से और उन अनेक व्यक्तियों में
घटः, घटः इस प्रकार की एकाकार, अनुगत-प्रतीति के जनक होने से ही
'सामान्य' कहलाते हैं। परन्तु आकाश अनेक नहीं हैं इसलिए उसमें 'आका-
शत्व' नाम का 'सामान्य' नहीं रहता है। यद्यपि घटत्व के समान आकाश शब्द
के आगे भी 'त्व' प्रत्यय जोड़ कर 'आकाशत्व' व्यवहार होता है। परन्तु
'आकाशत्व' 'सामान्य' नहीं अपितु 'उपाधि' है।
काल-निरूपण—
आगे काल का निरूपण करते हैं। काल की सिद्धि दिग्विपरीत परत्व
और अपरत्व, से तथा दिक् की सिद्धि कालविपरीत परत्वापरत्व से अनुमान
द्वारा होती है। इसका अभिप्राय यह है कि जो आयु में बड़ा है जिसके
साथ काल का अधिक सम्बन्ध है वह 'कालिक-दृष्टि' से 'पर' कहा जाता है।
और जिसके साथ काल का अल्प सम्बन्ध है अर्थात् जो आयु में छोटा है
उसे 'कालिक-दृष्टि' से 'अपर' कहते हैं इसी प्रकार जिसके साथ अधिक
देश का सम्बन्ध है अर्थात् जो अधिक दूर बैठा है वह 'दैशिक-दृष्टि' से 'पर' है
और जिसके साथ देश का अल्प सम्बन्ध है अर्थात् जो समीप स्थित है वह
'दैशिक-दृष्टि' से 'अपर' है। इस दशा में वृद्ध पुरुष, युवक की अपेक्षा 'कालिक
दृष्टि' से 'पर' है परन्तु यदि वही वृद्ध पुरुष जो काल की दृष्टि से 'पर' है,
युवक की अपेक्षा समीप बैठा हो तो उस में 'अपर' व्यवहार होगा। यही
दिग्-विपरीत तथा काल-विपरीत परत्व और अपरत्व है। अत एव दिग्विप-
रीत परत्वापरत्व से काल का और कालविपरीत परत्वापरत्व से दिक् का
अनुमान होता है। यही आगे कहते हैं।
१ पूना के संस्करण में 'परममहत्परिमाणवानित्यर्थः' इस प्रकार पुल्लिंग पाठ है।

कालद्रव्यम् ] प्रमेयनिरूपणम् १८६
कालोऽपि दिग्-विपरीतपरत्वापरत्वानुमेयः । संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-
संयोग-विभागवान् । एको नित्यो विभुश्च । कथमस्य दिग्-विपरीत-
परत्वापरत्वानुमेयत्वम् । उच्यते । सन्निहिते वृद्धे सन्निधानादपरत्वार्हे
तद्विपरीतं परत्वं प्रतीयते । व्यवहिते यूनि व्यवधानात् परत्वार्हे तद्वि-
परीतमपरत्वम् । तदिदं तत्तद्विपरीतं परत्वमपरत्वञ्च कार्यं तत्कारणस्य
दिगादेरसम्भवात् कालमेव कारणमनुमापयति । स चैकोऽपि
वर्तमानातीतभविष्यत्क्रियोपाधिवशाद् वर्तमानादिव्यपदेशं लभते, ।
पुरुष इव पच्यादिक्रियोपाधिवशात् पाचक-पाठकादिव्यपदेशम् । नित्यत्व-
विभुत्वे चास्य पूर्ववत् ।
कालविपरीतपरत्वापरत्वानुमेया दिक् । एका नित्या विभ्वी च ।
संख्या-परिमाण-पृथक्त्व-संयोग-विभागवती । पूर्वादिप्रत्ययैरनुमेया ।
तेषामन्यनिमित्तासम्भवात् । पूर्वस्मिन् पश्चिमे वा देशे स्थितस्य
काल भी दिग्-विपरीत परत्व, अपरत्व से अनुमेय है । १ संख्या, २ परिमाण,
३ पृथक्त्व, ४ संयोग, ५ विभाग, [ इन पांच गुणों ] से युक्त, एक नित्य और
विभु है ।
[ प्रश्न ] इस का दिग्विपरीत परत्वापरत्व से अनुमेयत्व कैसे है ?
[ उत्तर ] कहते हैं । पास में स्थित अतएव सन्निधान के कारण [ 'दैशिक
दृष्टि' से ] 'अपरत्व' [ व्यवहार ] के योग्य वृद्ध [ पुरुष ] में उस [ अपरत्व ] के
विपरीत [ 'कालिकदृष्टि' से ] 'परत्व' प्रतीत होता है । [ इसी प्रकार ] दूरस्थ
अतएव व्यवधान के कारण [ 'दैशिक-दृष्टि' से [ 'परत्व' [ व्यवहार ] के योग्य
युवक में उस [ दैशिक परत्व ] के विपरीत 'अपरत्व' प्रतीत होता है । यह उस
उस [ दैशिक अपरत्व और परत्व ] के विपरीत 'परत्व', 'अपरत्व' कार्य, उसका
कारण दिगादि सम्भव न होने से से काल को ही कारण रूप में अनुमित कराता
है । वह एक होने पर भी वर्तमान, अतीत, भविष्यत् क्रिया रूप उपाधि के
सम्बन्ध से वर्तमान आदि संज्ञा को प्राप्त होता है जैसे पचन [ पठन ] आदि
क्रिया रूप उपाधि के कारण पुरुष पाचक, पाठक आदि व्यवहार को प्राप्त होता
है । इसके विभुत्व और नित्यत्व पूर्ववत् [ आकाश के समान ] होते हैं ।
'दिक्' का निरूपण—
कालविपरीत परत्व, अपरत्व से अनुमेय दिक्, एक, नित्य और विभु है ।
१ संख्या, २ परिमाण, ३ पृथक्त्व, ४ संयोग, ५ विभाग, [ इन पांचो गुणों ]
से युक्त है । पूर्व [ पश्चिम ] आदि ज्ञान से [ भी ] अनुमेय है उनका अन्य
निमित्त न होने से । पूर्व में या पश्चिम देश में स्थित वस्तु के समानरूप होने

१६० तर्कभाषा [ दिगात्ममनो द्रव्याणि
वस्तुनस्तादवस्थ्यात् । सा चैकापि सवितुस्तत्तद्देशसंयोगोपाधिवशात्
प्राच्यादिसंज्ञां लभते ।
आत्मत्वाभिसम्बन्धवान् आत्मा । सुखदुःखादिवैचित्र्यात् प्रतिशरीरं
भिन्नः । स चोक्त एव । तस्य सामान्यगुणाः संख्यादयः पञ्च, बुद्ध्यादयो
नव विशेषगुणाः । नित्यत्व-विभुत्वे पूर्ववत् ।
मनस्त्वाभिसम्बन्धवन्मनः । अणु, आत्मसंयोगि, अन्तरिन्द्रियम्
सुखाद्युपलब्धिकारणं नित्यञ्च । संख्याद्यष्टगुणवत् । तत्संयोगेन बाह्येन्द्रिय-
मर्थग्राहकम् । अतएव सर्वोपलब्धिसाधनम् । तच्च न प्रत्यक्षम्, अपि त्वनु-
मानगम्यम् । तथाहि सुखाद्युपलब्धयश्चक्षुराद्यतिरिक्तकरणसाध्याः,
[ पर भी यह पूर्व में रखी है या पश्चिम में इस प्रकार का व्यवहार-भेद होने का
दिक् के अतिरिक्त और कोई कारण न होने ] से । और वह एक होने पर भी
सूर्य के उस उस देश के साथ संयोग रूप उपाधि के वश पूर्व [ पश्चिम ] आदि
[ नाना ] संज्ञा को प्राप्त होती है ।
'आत्मा' का निरूपण—
आत्मत्व [ जाति ] के सम्बन्ध वाला आत्मा है । [ प्रत्येक व्यक्ति के ] सुख-
दुःखादि के वैचित्र्य होने से [ वह ] प्रत्येक शरीर में भिन्न भिन्न है । और उसका
वर्णन कर ही चुके हैं । उसके संख्या आदि पांच [ १ संख्या, २ परिमाण,
३ पृथक्त्व, ४ संयोग, ५ विभाग ] सामान्य गुण, और बुद्धि आदि नौ [ १ बुद्धि,
२ सुख, ३ दुःख, ४ इच्छा, ५ द्वेष, ६ प्रयत्न, ७ धर्म, ८ अधर्म, और ९ संस्कार]
विशेष गुण [ सब मिला कर १४ गुण ] हैं । नित्यत्व और विभुत्व पूर्ववत्
[ अर्थात् आकाश के समान ] है ।
'मन' का निरूपण—
मनस्त्व [ जाति ] के सम्बन्ध वाला मन अणु [ परिमाण वाला ] आत्म-
संयोगी और अन्तः इन्द्रिय है। सुखादि की उपलब्धि में कारण, नित्य, संख्या आदि
आठ [१ संख्या, २ परिमाण, ३ पृथक्त्व ४ संयोग, ५ विभाग, ६ परत्व, ७ अपरत्व,
८ संस्कार] गुणों से युक्त है । उसके संयोग से [ ही ] बाह्येन्द्रिय [अपने २] अर्थ
की ग्राहक होती है। इस लिए [ सब इन्द्रियों के अपने २ अर्थ के ग्रहण में
सहायक होने से ] सब [ विषयों ] की उपलब्धि का साधन है। वह प्रत्यक्ष
नहीं अपितु अनुमानगम्य है । जैसे कि [ अनुमान वाक्य का प्रयोग इस प्रकार
है ] सुखादि का ज्ञान चक्षु आदि से अतिरिक्त करण से साध्य है चक्षु आदि के
[ व्यापार के अथवा इन्द्रियों के ] न होने पर भी [ सुखादि के ] उत्पन्न होने से ।

गुणाः ] प्रमेयनिरूपणम् १६१
असत्स्वपि चक्षुरादिषु जायमानत्वात् । यद्वस्तु यद्विनैवोत्पद्यते तत्
तदतिरिक्तकरणसाध्यं, यथा कुठारं विनोत्पद्यमाना पचनक्रिया तद्-
तिरिक्तवह्न्यादिकरणसाध्या । यच्च करणं तन्मनः तच्च चक्षुराद्यतिरिक्तम् ।
तच्चाणुपरिमाणम् ।
द्रव्याण्युक्तानि ।
गुणाः
अथ गुणा उच्यन्ते । सामान्यवान् असमवायिकारणं स्पन्दात्मा
गुणः । स च द्रव्याश्रित एव । रूप-रस-गन्ध-स्पर्श-संख्या-परिमाण-
पृथक्त्व-संयोग-विभाग-परत्व-अपरत्व-गुरुत्व-द्रवत्व-स्नेह-शब्द-बुद्धि-सुख-
दुःख-इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-धर्म-अधर्म-संस्कार-भेदाच्चतुर्विंशतिधा ।
१–तत्र रूपं चक्षुर्मात्रग्राह्यो विशेषगुणः । पृथिव्यादित्रयवृत्ति । तच्च
जो वस्तु जिस के बिना ही उत्पन्न होती है वह उससे भिन्न करण से उत्पन्न
होती है जैसे कुठार के बिना उत्पन्न होने वाली पचन क्रिया उससे भिन्न वह्नि
आदि करण से साध्य होती है । जो [ उसका ] करण है वह मन है और वह
चक्षु आदि [ बाह्येन्द्रियों ] से भिन्न है । और वह अणु परिमाण वाला है ।
द्रव्यों का वर्णन हो गया । [ इन नौ द्रव्यों में से किस में कितने गुण
रहते हैं । उसका संग्रह निम्न प्रकार किया है । ]
वायोर्नवैकादश तेजसो गुणा,-
जलक्षितिप्राणभृतां चतुर्दश ॥
दिक्कालयोः पञ्च षडेव चाम्बरे,
महेश्वरेऽष्टौ मनसस्तथैव च ॥
गुण-निरूपण—
अब गुणों का वर्णन करते हैं । सामान्यवान्, असमवायिकारण, कर्मभिन्न
गुण है । [ यह गुण का लक्षण है ] । और वह [गुण] द्रव्याश्रित ही [ रहता ]
है । १ रूप, २ रस, ३ गन्ध, ४ स्पर्श, ५ संख्या, ६ परिमाण, ७ पृथक्त्व,
८ संयोग, ९ विभाग, १० परत्व, ११ अपरत्व, १२ गुरुत्व, १३ द्रवत्व, १४
स्नेह, १५ शब्द, १६ बुद्धि, १७ सुख, १८ दुःख, १९ इच्छा, २० द्वेष, २१
प्रयत्न, २२ धर्म, २३ अधर्म और २४ संस्कार भेद से चौबीस प्रकार के हैं ।
१–रूप-निरूपण—
उनमें से चक्षुर्मात्रग्राह्य विशेष गुण 'रूप' है । [ संख्या, परिमाण आदि में
अतिव्याप्ति-वारण के लिए 'मात्र' तथा 'विशेष' पद का प्रयोग किया है । वह
१ न्याय-सिद्धान्त-मुक्तावली ।

१६२ तर्कभाषा [ रूप-रस-गन्ध-स्पर्शाः
शुक्लाद्यनेकप्रकारकम्। पाकजञ्च पृथिव्याम्। तच्चाऽनित्यं पृथिवीमात्रे।
आप्यतैजसपरमाण्वोर्नित्यम्। आप्यतैजसकार्येष्वनित्यम्। शुक्लभास्वर-
मपाकजं तेजसि। तदेवाभास्वरमप्सु।
२-रसो रसनेन्द्रियग्राह्यो विशेषगुणः पृथिवीजलवृत्तिः। तत्र पृथिव्यां
मधुरादिषट्प्रकारो मधुर-अम्ल-लवण-कटु-कषाय-तिक्त-भेदात्, पाकजश्च
अप्सु मधुरोऽपाकजो नित्योऽनित्यश्च। नित्यः परमाणुभूतास्वप्सु
कार्यभूतास्वनित्यः।
३-गन्धो घ्राणग्राह्यो विशेषगुणः। पृथिवीमात्रवृत्तिः। अनित्य एव।
स द्विविधः सुरभिरसुरभिश्च। जलादौ गन्धप्रतिभानं तु संयुक्तसमवायेन
द्रष्टव्यम्।
सामान्य गुण हैं और उनका ग्रहण केवल चक्षु से नहीं अपितु चक्षु और त्वक्
दोनों से होता है। अतः मात्र पद तथा विशेष पद जोड़ देने से उसमें अतिव्याप्ति .
नहीं होती।] पृथिवी आदि [१ पृथिवी, २ जल, ३ तेज] तीन में रहनेवाला
और वह शुक्ल आदि [१ शुक्ल, २ लोहित, ३ पीत, ४ कृष्ण, ५ हरित,
६ कपिश और ७ चित्र भेद से सात] अनेक प्रकार का है। पृथिवी में पाकज
है। और वह पृथिवी मात्र में अनित्य और आप्य तथा तैजस परमाणुओं में
नित्य एवं आप्य तथा तैजस कार्यों में अनित्य होता है। तेज में भास्वर शुक्ल
और अपाकज तथा वही [रूप] जल में अभास्वर शुक्ल [और अपाकज]
होता है।
२-रस-निरूपण-
रसना इन्द्रिय से ग्राह्य विशेष गुण 'रस' है। पृथिवी और जल में रहता
है। उसमें से पृथिवी में मधुर आदि छः प्रकार का, १ मधुर, २ अम्ल, ३ लवण,
४ कटु, ५ कषाय, ६ तिक्त, भेद से [६ प्रकार का] और पाकज है। जल में
मधुर अपाकज होता है। [वह] नित्य और अनित्य [दो प्रकार का] है।
परमाणु रूप जल में नित्य, और कार्य भूत [जल] में अनित्य होता है।
३-गन्ध-निरूपण-
घ्राणेन्द्रिय-ग्राह्य विशेष गुण 'गन्ध' है [जो] केवल पृथिवी में रहता है।
और अनित्य ही है। वह सुगन्ध और दुर्गन्ध दो प्रकार का होता है। जल
आदि में [होने वाली] गन्ध की प्रतीति संयुक्त समवाय [जल में संयुक्त
पार्थिव अंश में समवाय सम्बन्ध से रहने वाली गन्ध का जल में भान संयुक्त
समवाय] से समझना चाहिए। [उस गन्ध को जलका गुण न मानना चाहिए]।

स्पर्श-संख्यागुणौ ] प्रमेयनिरूपणम् १६३
४-स्पर्शस्त्वगिन्द्रियग्राह्यो विशेषगुणः। पृथिव्यादिचतुष्टयवृत्तिः।
स च त्रिविधः शीत-उष्ण-अनुष्णाशीतभेदात्। शीतः पयसि, उष्णस्तेज-
सि, अनुष्णाशीतः पृथिवीवाय्वोः। पृथिवीमात्रे ह्यनित्यः। आप्य-तैजस-
वायवीयपरमाणुषु नित्यः, आप्यादिकार्येष्वनित्यः। एते च रूपादयश्च-
त्वारो महत्त्वैकार्थसमवेतत्वे सत्युद्भूता एव प्रत्यक्षाः।
५-संख्या एकत्वादिव्यवहारहेतुः सामान्यगुणः। एकत्वादिपरार्द्ध-
पर्यन्ता। तत्रैकत्वं द्विविधं नित्यानित्यभेदात्। नित्यगतं नित्यमनि-
त्यगतमनित्यम्। स्वाश्रयसमवायिकारणगतैकत्वजन्यञ्च। द्वित्वञ्चानित्य-
४-स्पर्श-निरूपण—
त्वगिन्द्रिय से, ग्राह्य विशेष गुण 'स्पर्श' है। पृथिवी आदि चार [१ पृथिवी,
२ जल, ३ वायु ४ अग्नि] में रहता है। और वह १ शीत, २ उष्ण, ३ अनुष्णा-
शीत, भेद से तीन प्रकार का है। शीत [स्पर्श] जल में, उष्ण [स्पर्श] अग्नि
में, और अनुष्णाशीत [स्पर्श] पृथिवी तथा वायु में [रहता] है। पृथिवी मात्र
में अनित्य होता है। जल, वायु और तेज के परमाणुओं में नित्य तथा जल आदि
कार्यों में अनित्य है। यह रूपादि चारो [गुण], महत् [परिमाण] के साथ
एक अर्थ में समवेत और उद्भूत होने पर ही प्रत्यक्ष होते हैं। [अन्यथा नहीं
जैसे परमाणु तथा द्व्यणुक में महत् परिमाण न होने से उनमें रहने वाले रूपादि
गुणों का प्रत्यक्ष नहीं होता है। और उष्ण जल में अग्नि के भास्वर शुक्ल रूप के
'उद्भूत' न होने से उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है। इसलिए रूपादि चारों गुणों के
प्रत्यक्ष होने के लिए उनका 'उद्भूत' होना और महत्परिमाण वाले द्रव्य में
समवेत होना यह दोनों बातें आवश्यक हैं]।
५-संख्या-निरूपण
५-एकत्वादि व्यवहार का हेतुभूत सामान्य गुण 'संख्या' [कहलाता] है।
वह एकत्व से लेकर परार्द्ध [शंख, दश शंख, महा शंख से भी आगे की संख्या]
पर्यन्त [होती] है। उनमें से नित्य और अनित्य के भेद से 'एकत्व' दो प्रकार
का होता है। नित्य [आकाशादि] में रहने वाला [एकत्व] नित्य, और
अनित्य [घटादि] में रहने वाला [एकत्व] अनित्य होता है। [अनित्य एकत्व]
अपने आश्रय [घटादि] के समवायिकारण [कपालादि] में रहने वाले एकत्व
से उत्पन्न होता है। और 'द्वित्व' तो [सर्वत्र] अनित्य ही होता है। और वह
दो पिण्डों [घटादि वस्तुओं] की, 'यह एक है' और 'यह एक है', इस [प्रकार
के ज्ञान, जिसको] 'अपेक्षा-बुद्धि' [कहते हैं] से उत्पन्न होता है। उस
१३ त० भा०

१६४ तर्कभाषा [ द्वित्वोत्पत्तिः
मेव। तच्च द्वयोः पिण्डयोः 'इदमेकम्' इत्यपेक्षाबुद्ध्या जन्यते ।
तत्र द्वौ पिण्डौ समवायिकारणे। पिण्डयोरेकत्वे असमवायिकारणे,
अपेक्षाबुद्धिर्निमित्तकारणम् । अपेक्षाबुद्धिनाशादेव द्वित्वविनाशः।
एवं त्रित्वायुत्पत्तिर्विज्ञेया ।
[ द्वित्व ] के दोनों पिण्ड 'समवायि-कारण' [ होते हैं ] दोनों पिण्डों में रहने वाले
एकत्व 'असमवायि-कारण' और 'अपेक्षा-बुद्धि' के विनाश से ही 'द्वित्व' का
विनाश होता है । इसी प्रकार त्रित्वादि की उत्पत्ति [ और विनाश ] भी समझनी
चाहिए ।
यहाँ द्वित्व की उत्पत्ति और विनाश की प्रक्रिया संक्षेप से दिखाई है ।
यह प्रक्रिया वैशेषिक दर्शन का एक मुख्य भाग है और प्रशस्तपाद भाष्य
आदि में बहुत विस्तार के साथ उसका विवेचन हुआ है। इसी से द्वित्व के
ज्ञान को वैशेषिक दर्शन के ज्ञान की कसौटी माना गया है—
'द्वित्वे च पाकजोत्पत्तौ विभागे च विभागजे ।
यस्य न स्खलिता बुद्धिस्तं वै वैशेषिकं विदुः ॥
प्रशस्तपाद में प्रदर्शित द्वित्वोत्पत्ति की प्रक्रिया में सात क्षण और उसके
विनाश की प्रक्रिया में नौ क्षण लगते हैं । द्वित्व की उत्पत्ति 'अपेक्षा-बुद्धि' से
और उसका विनाश 'अपेक्षा बुद्धि' के विनाश से होता है ।
द्वित्वोत्पत्ति की प्रक्रिया—
इसकी उत्पत्ति की प्रक्रिया का संग्रह एक श्लोक में इस प्रकार किया
गया है—
आदाविन्द्रियसन्निकर्षघटनादेकत्वसामान्यधी—
रैकत्वोभयगोचरा मतिरतो, द्वित्वं ततो जायते ।
द्वित्वत्वप्रमितिस्ततो नु, परतो द्वित्वप्रमाऽनन्तरं
द्वे द्रव्ये इति धीरियं निगदिता द्वित्वोदयप्रक्रिया ॥
अर्थात् प्रथम क्षण में इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष होता है । द्वितीय
क्षण में दोनों घटों में रहने वाले 'एकत्व-सामान्य' का ज्ञान होता है । तृतीय
क्षण में उन दोनों को ग्रहण करने वाली 'अयम् एकः अयम् एकः' इस प्रकार
की 'अपेक्षा-बुद्धि' उत्पन्न होती है । चतुर्थ क्षण में इस अपेक्षा-बुद्धि से द्वित्व
की उत्पत्ति होती है । पञ्चम में उस द्वित्व में रहने वाली 'द्वित्वत्व' जाति का
ग्रहण होता है । छठे क्षण में द्वित्व का ज्ञान होता है और सातवें क्षण में
१, २ सर्वदर्शनसंग्रह ।

द्वित्वविनाशप्रक्रिया ] प्रमेयनिरूपणम् १६५
द्वित्व से विशिष्ट 'द्वे द्रव्ये' इस प्रकार का द्रव्य ज्ञान होता है। इस प्रकार
द्वित्व की उत्पत्ति-प्रक्रिया में अर्थात् 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की उत्पत्ति में
सात क्षण लगते हैं।
द्वित्वविनाश की प्रक्रिया—
इसी प्रकार द्वित्व के नाश की प्रक्रिया में नौ क्षण लगते हैं। द्वित्व के
नाश का एक कारण तो 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश है और दूसरा कारण 'आश्रय
द्रव्य' का नाश भी है। उसमें 'अपेक्षा-बुद्धि' के नाश से 'द्वित्व' का नाश किस
प्रकार होता है इसका संग्रह तीन श्लोकों में इस प्रकार किया गया है—
आदावपेक्षाबुद्ध्या हि नश्येदेकत्वजातिधीः ।
द्वित्वोदयसमं पश्चात् सा च तज्जातिबुद्धितः ॥ १ ॥
द्वित्वाख्यगुणधीकाले ततो द्वित्वं निवर्तते ।
अपेक्षाबुद्धिनाशेन द्रव्यधीजन्मकालतः ॥ २ ॥
गुणबुद्धिर्द्रव्यबुद्ध्या संस्कारोत्पत्तिकालत: ।
द्रव्यबुद्धिश्च संस्कारादिति नाशक्रमो मतः ॥ ३ ॥
ज्ञान क्षणिक है इसलिए एक समय में दो ज्ञान 'अविनश्यत्-अवस्था' में
नहीं रह सकते हैं। और न दो ज्ञानों की एक साथ उत्पत्ति हो सकती है।
इसलिए उत्पत्ति की प्रक्रिया में इन्द्रिय-सन्निकर्ष से द्वितीय क्षण में 'एकत्व-
सामान्य' ज्ञान की उत्पत्ति, तृतीय क्षण में 'अपेक्षा-बुद्धि' की उत्पत्ति, और
चतुर्थ क्षण में 'अपेक्षा-बुद्धि' से द्वित्व की उत्पत्ति दिखलाई थी। जिस चतुर्थ
क्षण में 'द्वित्व' की उत्पत्ति होगी उसी समय 'अपेक्षा-बुद्धि' से 'एकत्व सामान्य-
ज्ञान' का नाश होगा। उसके बाद पञ्चम क्षण में 'द्वित्व सामान्य-ज्ञान' उत्पन्न
होता है। उस 'द्वित्व-सामान्य-ज्ञान' से 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश होता है
जो अगले अर्थात् षष्ठ क्षण में होता है। उस षष्ठक्षण में 'द्वित्व-
गुणबुद्धि' उत्पन्न होती है। इस प्रकार 'द्वित्वगुणबुद्धि' के उत्पन्न
होने के समय अर्थात् षष्ठ क्षण में 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश होता है।
और अगले सप्तम क्षण में जब कि 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान उत्पन्न होता है
उसके पूर्व 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश हो चुकने से द्वित्व का नाश और 'द्वे द्रव्ये'
इस बुद्धि की उत्पत्ति, दोनों एक साथ सप्तम क्षण में होती हैं। और उसके
बाद अष्टम क्षण में संस्कार से 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान का भी नाश हो जाता है।
किस किस क्षण में किस किस की उत्पत्ति और विनाश होता है इसको इस
प्रकार दिखाया जा सकता है।

१६६ तर्कभाषा [ द्वित्वविनाशप्रक्रिया
प्रथमक्षण में—इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष होता है ।
द्वितीयक्षण में—'एकत्व-सामान्य-ज्ञान' उत्पन्न होता है ।
तृतीयक्षण में—एकत्वोभयगोचरा मतिः, अर्थात् 'अयमेकः, अयमेकः' इस
प्रकार की 'अपेक्षा-बुद्धि' उत्पन्न होती है ।
चतुर्थ क्षण में—१ द्वित्वोत्पत्तिः । २ एकत्वसामान्यज्ञान का नाश ।
३ द्वित्वसामान्यज्ञान की उत्पद्यमानता यह तीनों बातें एक साथ होती हैं ।
पञ्चम क्षण में—१ द्वित्वसामान्य ज्ञान की उत्पत्ति । २ 'अपेक्षा-बुद्धि' की
विनश्यमानता ३ द्वित्वगुण-बुद्धि की उत्पद्यमानता ये तीनों बातें एक साथ होती हैं ।
षष्ठ क्षण में— १ द्वित्वगुणबुद्धि की उत्पत्ति । २ अपेक्षा-बुद्धि का नाश,
३ 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की उत्पद्यमानता ये तीनों बातें एक साथ होती हैं ।
सप्तम क्षण में—१ 'द्वे द्रव्ये' ज्ञान की उत्पत्ति । २ द्वित्व का विनाश ।
३ द्वित्वगुण बुद्धि की विनश्यमानता ये तीनों बातें एक साथ होती हैं ।
अष्टम क्षण में—१ संस्कार की उत्पत्ति । २ द्वित्वगुणबुद्धि का विनाश,
३ 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की विनश्यमानता ये तीनों बातें एक साथ होती हैं ।
नवम क्षण में—'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान का संस्कार से विनाश हो जाता है ।
इस प्रकार अपेक्षा बुद्धि के नाश से जहाँ द्वित्व का विनाश होता है उसकी
यह नौ क्षण की प्रक्रिया दिखाई है । इसके अतिरिक्त कहीं आश्रय-नाश से भी
द्वित्व का नाश होता है उस की क्षणानुसारिणी प्रक्रिया निम्न प्रकार है ।}
आश्रय के नाश से द्वित्वका नाश—
प्रथम क्षण में—१ एकत्वाधार घटादि के अवयवों में कर्म की उत्पत्ति होती
है । २ उसी समय एकत्व सामान्य ज्ञान की उत्पत्ति होती है ।
द्वितीय क्षण में—१ कर्म से अवयवों के विभाग की उत्पत्ति । २ और
उसी समय एकत्व सामान्य ज्ञान से 'अपेक्षा-बुद्धि' की उत्पत्ति होती है ।
तृतीय क्षण में—१ विभाग से द्रव्यारम्भक संयोग का नाश । २ और
उसी समय 'अपेक्षा-बुद्धि' से द्वित्व की उत्पत्ति होती है ।
चतुर्थ क्षण में—१ द्रव्यारम्भक संयोग के नाश से द्रव्य का नाश । २ और
उसी समय द्वित्व सामान्य ज्ञान की उत्पत्ति होती है ।
पञ्चम क्षण में—१ आश्रयद्रव्य के ज्ञान से द्वित्व का नाश । २ और
द्वित्वसामान्यज्ञान से 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश होता है ।
इस प्रक्रिया से पञ्चम क्षण में एक ओर आश्रय द्रव्य के नाश से

विरोधपरिहारः ] प्रमेयनिरूपणम् १६७
द्वित्व का नाश हो जाता है और दूसरी ओर उसी क्षण में द्वित्व सामान्य ज्ञान
से 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश होता है। इस स्थिति में 'अपेक्षा-बुद्धि' तथा 'द्वित्व'
दोनों का नाश एक ही क्षण में होने से उन दोनों में कार्य-कारण-भाव नहीं
कहा जा सकता है। अर्थात् वह द्वित्व का नाश 'अपेक्षा-बुद्धि' के नाश से
नहीं अपितु आश्रय द्रव्य के नाश से होता है। यह आश्रय-नाश से द्वित्व-
नाश की प्रक्रिया हुई :
'सहानवस्थान' विरोध पक्ष में दोष और उसका परिहार—
वैशेषिक दर्शन में इस उत्पत्ति और विनाश की प्रक्रिया के प्रसङ्ग में
'वध्यघातक भाव' और 'सहानवस्थान' रूप दो प्रकार के विरोधों का उल्लेख
किया गया है। और दोनों पक्षों में 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की उत्पत्ति नहीं बनेगी
यह दोष देकर उसका समाधान करने का प्रयत्न किया गया है। 'सहानव-
स्थान' विरोध में विनाशक सामग्री की उत्पत्ति के क्षण में ही विनाश्य पदार्थ
का विनाश हो जाता है इसलिए द्वित्वगुणबुद्धि की उत्पत्ति के क्षण अर्थात्
छठे क्षण में द्वित्वगुणबुद्धि के उत्पन्न होते ही 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश उसी
क्षण में हो जाने से उसी समय द्वित्व का नाश हो जायगा। अतः जब छठे
क्षण में द्वित्व का नाश हो गया तब सातवें क्षण में द्वित्वगुण-विशिष्ट द्रव्य
अर्थात् 'द्वे द्रव्ये' इस प्रकार का ज्ञान कैसे उत्पन्न होगा। यह प्रश्न उत्पन्न
होता है। उसका समाधान 'आशूत्पत्ति' मान कर किया है। समाधान का
आशय यह है कि जैसे 'शब्दवदाकाशम्' यह विशिष्ट ज्ञान जब तक उत्पन्न
होता है उसके पूर्व ही क्षणिक शब्द का नाश हो चुकता है। परन्तु शब्द
का नाश हो जाने पर भी उसका ज्ञान बुद्धि में रहता है और उस ज्ञान के
कारण अत्यन्त शीघ्रता से शब्द-विशिष्ट आकाश का ज्ञान 'शब्दवदाकाशम्'
इस रूप में जैसे बन जाता है इसी प्रकार छठे क्षण में द्वित्व का नाश हो जाने
पर भी 'आशूत्पत्ति' के कारण 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान बन सकता है। इस प्रकार
'सहानवस्थान' पक्ष में आए हुए दोष का समाधान किया गया है।
विरोध का दूसरा भेद 'वध्य-घातक-भाव' है। इस 'वध्य-घातक-भाव'
विरोध में पहिले क्षण में घातक उत्पन्न होता है और अगले क्षण में 'वध्य' का
वध अर्थात् विनाश होता है। अर्थात् 'घातक' की उत्पत्ति के एक क्षण बाद
'वध्य' का नाश होता है। पूर्वपक्ष की ओर से यह शङ्का होती है कि इस
'वध्य-घातक विरोध' में भी 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान नहीं उत्पन्न हो सकेगा क्योंकि
तृतीयक्षण में 'अपेक्षा-बुद्धि' उत्पन्न होती है उससे चतुर्थ क्षण में संस्कार से
पञ्चम क्षण में 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश और उसके बाद छठे क्षण में द्वित्व का

१६८ तर्कभाषा [ परिमाणगुणः
६-परिमाणं मानव्यवहारासाधारणं कारणम् । तच्चतुर्विधम्, अणु,
महद्, दीर्घं, ह्रस्वञ्चेति । तत्र कार्यगतं परिमाणं संख्या-परिमाण-प्रचय-
योनि । तद्यथा द्वयणुकपरिमाणमीश्वरापेक्षाबुद्धिजन्यपरमाणुद्वित्वज-
नित्वात् संख्यायोनि, संख्याकारणकमित्यर्थः । त्र्यणुकपरिमाणञ्च
स्वाश्रयसमवायिकारणगतबहुत्वसंख्यायोनि । चतुरणुकादिपरिमाणन्तु
स्वाश्रयसमवायिकारणपरिमाणजन्यम् । तूलपिण्डपरिमाणन्तु स्वाश्रय-
नाश हो जायगा तब सप्तम क्षण में द्वित्व के न होने से 'द्वे द्रव्ये' यह
ज्ञान कैसे होगा ? यह शङ्का का आशय है । इसका उत्तर यह है कि 'अपेक्षा-
बुद्धि' से संस्कार नहीं बनता है । क्योंकि 'अपेक्षा-बुद्धि' समूहालम्बनात्मक
ज्ञान नहीं है । संस्कार केवल समूहालम्बनात्मक ज्ञान से उत्पन्न होता है ।
अतः 'अपेक्षा-बुद्धि' से संस्कार के उत्पन्न न होने से 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश
संस्कार से नहीं अपितु पञ्चम क्षण में उत्पन्न होने वाले 'द्वित्वसामान्यज्ञान' से
ही होता है । इसलिए 'अपेक्षा-बुद्धि' का नाश षष्ठ क्षण में और उससे द्वित्व
का नाश सप्तम क्षण में होता है । उसी के साथ 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान उत्पन्न हो
जाता है । अतएव उसमें कोई बाधा नहीं है ।
६-परिमाण-निरूपण—
मानव्यवहार का असाधारण कारण 'परिमाण' है । वह १ अणु, २
महद्, ३ दीर्घ और ४ ह्रस्व, भेद से चार प्रकार का है । कार्यगत चारो प्रकार
का [ परिमाण प्रकारान्तर से ] १ संख्यायोनि, २ परिमाणयोनि और ३ प्रचय-
योनि [ तीन प्रकार का ] होता है । जैसे द्वयणुक का [ जन्य ] अणु परिमाण
[ संख्यायोनि अर्थात् संख्याकारणक है क्योंकि वह ] ईश्वर की 'अपेक्षा-बुद्धि'
से जन्य परमाणुगत द्वित्व [ संख्या ] से जन्य होने के कारण 'संख्या-योनि'
अर्थात् संख्याकारणक है । और त्र्यणुक का [ महत् ] परिमाण अपने [ अर्थात्
त्र्यणुकगत परिमाण के ] आश्रय [ अर्थात् त्र्यणुक ] के समवायिकारण [ अर्थात्
द्वयणुक ] गत बहुत्व [ संख्याजन्य होने से ] 'संख्या-योनि' है । चतुरणुक आदि
का परिमाण तो अपने परिमाण के ] आश्रय [ चतुरणुक आदि ] के समवायि
कारण [ त्र्यणुक आदि ] के परिमाण से उत्पन्न होता है [ अत एव वह चतुरणुकादि
का परिमाण 'परिमाण-योनि' परिमाण है] । रूई के पिण्ड का परिमाण तो अपने
आश्रय [ तूल-पिण्ड ] के समवायिकारण रूप अवयवों के प्रशिथिल संयोगसे जन्य
है । [इसलिए वह रूई के पिण्ड का परिमाण 'प्रचय-योनि' कहलाता है। प्रचय का

परिमाणगुणः ] प्रमेयनिरूपणम् १६६
समवायिकारणावयवानां प्रशिथिलसंयोगजन्यम् । परमाणुपरिमाण-
ञ्चाकाशादिगतं नित्यमेव ।
अर्थ शिथिल-अवयव-संयोग है ] परमाणु का परिमाण [ जो कि 'पारिमा-
ण्डल्य' नाम से भी कहा जाता है ] और आकाशादि का 'परममहत्' परिमाण
नित्य ही होता है ।
अणु परिमाण केवल दो जगह रहता है एक परमाणु में और दूसरा
द्व्यणुक में । इनमें से परमाणुगत अणु परिमाण नित्य ही होता है और
उसका दूसरा नाम 'पारिमाण्डल्य' भी है। 'पारिमाण्डल्यभिन्नानां कारणत्व-
मुदाहृतम्' इत्यादि में 'पारिमाण्डल्य' शब्द से परमाणु के नित्य अणु परिमाण
का ही ग्रहण होता है। द्व्यणुक में भी अणु परिमाण रहता है। परमाणु
का अथवा द्व्यणुक का अणु परिमाण किसी परिमाण का आरम्भक या
कारण नहीं होता है। क्योंकि परिमाण के विषय में यह नियम है कि परिमाण
'स्वसमानजातीय उत्कृष्ट परिमाण' का आरम्भक होता है। जैसे तन्तु का
महत् परिमाण है। उससे जो पट का परिमाण उत्पन्न होता है। वह तन्तु के
परिमाण की अपेक्षा उत्कृष्ट अर्थात् 'महत्तर' परिमाण है। तन्तु के महत् परिमाण
से उसके समानजातीय और उत्कृष्ट अर्थात् 'महत्तर' परिमाण की उत्पत्ति होती
है। इसी प्रकार यदि परमाणु के अणु परिमाण को द्व्यणुक के परिमाण का
कारण माना जाय तो वह अणु परिमाण द्व्यणुक में अपने समानजातीय
उत्कृष्ट अर्थात् 'अणुतर' परिमाण को उत्पन्न करने लगेगा। परन्तु अणु परिमाण
तो कहते ही उसको हैं जिसके आगे और 'अणुतर' कोई न हो। इसलिए अणु
परिमाण को द्व्यणुक के परिमाण का कारण मानना युक्ति-सङ्गत नहीं है।
इसीलिए द्व्यणुक के अणु परिमाण को 'संख्यायोनि' परिमाण माना है। अर्थात्
दो परमाणुओं में रहने वाली द्वित्व संख्या से द्व्यणुक का अणु परिमाण उत्पन्न
होता है। द्वित्व संख्या भी अनित्य और 'अपेक्षा-बुद्धि' से जन्य है। परन्तु
परमाणुओं के विषय में अस्मदादि की 'अपेक्षा-बुद्धि' काम नहीं दे सकती है
क्योंकि परमाणु अस्मदादि के अनुभव के विषय नहीं हैं। इसलिए परमाणुओं में
जो द्वित्व संख्या उत्पन्न होती है वह ईश्वर की 'अपेक्षा-बुद्धि' से उत्पन्न होती
है। और उस द्वित्व संख्या से द्व्यणुक में 'संख्यायोनि' अणु परिमाण
उत्पन्न होता है।
इसी प्रकार त्र्यणुक का 'महत् परिमाण' भी 'संख्यायोनि' परिमाण माना
गया है। क्योंकि वह 'परिमाणयोनि' अथवा 'प्रचययोनि' नहीं हो सकता है,

२०० तर्कभाषा [ पृथक्त्वगुणः
७-पृथक्त्वम् पृथग्व्यवहारासाधारणं कारणम् । तच्च द्विविधम् ।
एकपृथक्त्वं द्विपृथक्त्वादिकञ्च । तत्राद्यं नित्यगतं नित्यमनित्यगतमनित्यम् ।
द्विपृथक्त्वादिकञ्चानित्यमेव ।
त्र्यणुक के परिमाण को यदि 'संख्यायोनि' परिमाण मानें तो उसे 'परिमाण-
योनि' परिमाण मानना होगा । अर्थात् उसकी उत्पत्ति द्वयणुक के अणु
परिमाण से माननी होगी । परन्तु अभी दिखा चुके हैं कि परिमाण के 'स्वस-
मानजातीय उत्कृष्ट परिमाण के आरम्भक' होने का नियम होने से द्वयणुक का
अणु परिमाण यदि त्र्यणुक में किसी परिमाण को उत्पन्न कर सकता है तो
केवल 'स्वसमानजातीय उत्कृष्ट' अर्थात् 'अणुतर' परिमाण को ही उत्पन्न कर
सकता है परन्तु 'अणुतर' परिमाण की उत्पत्ति सम्भव नहीं है। और त्र्यणुक
में महत् परिमाण रहता है । इसलिए त्र्यणुक का 'महत्' परिमाण 'परिमाण-
योनि' नहीं अपितु द्वयणुकनिष्ठ बहुत्व-संख्याजन्य होने से 'संख्यायोनि'
परिमाण है । शेष जन्य महत् परिमाण 'परिमाणयोनि' परिमाण होते हैं। जन्य
महत् परिमाण के अतिरिक्त नित्य महत् परिमाण भी होता है जिसे 'परम
महत्' परिमाण कहते हैं और वह आकाशादि विभु पदार्थों में रहता है।
यहाँ 'अणु' और 'महत्' दो प्रकार के परिमाणों का वर्णन किया है और
उन दोनों के नित्य तथा अनित्य दो दो भेद किए हैं। इनके अतिरिक्त 'दीर्घ'
और 'ह्रस्व' यह दो परिमाण और भी दिखाए हैं। यह 'दीर्घ' और 'ह्रस्व'
परिमाण जन्य 'महत्' तथा 'अणु' परिमाण के साथ ही रहते हैं। अर्थात्
जहाँ जन्य 'अणु' परिमाण रहता वहाँ 'ह्रस्व' और जहाँ जन्य 'महत्' परिमाण
रहता है वहाँ 'दीर्घ' व्यवहार होने से यह दोनों परिमाण अलग कोई विशेष
महत्त्व नहीं रखते हैं। इसी से उनका विशेष वर्णन यहाँ नहीं किया गया है
केवल नाम गिना दिए हैं।
७ पृथक्त्व-निरूपण—
पृथक् व्यवहार का असाधारण कारण 'पृथक्त्व' [ गुण कहलाता ] है ।
वह दो प्रकार का है 'एक-पृथक्त्व' और 'द्विपृथक्त्व' आदि । उनमें से पहिला
[ एकपृथक्त्व ] नित्य [ परमाणु आदि ] में रहने वाला नित्य और अनित्य
[ घटादि में ] रहनेवाला अनित्य होता है । द्विपृथक्त्वादि अनित्य ही होता है ।
संख्या के प्रकरण में एकत्व, द्वित्व का वर्णन हुआ था। वहाँ एकत्व, द्वित्वत्व
जाति थीं परन्तु यहाँ 'एकपृथक्त्व' और 'द्विपृथक्त्व' आदि जातियां नहीं है ।
उनका भेद केवल संख्या के सम्बन्ध से होता है। इसी से प्रशस्तपाद भाष्य
में लिखा है—