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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 330 में से

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पृष्ठ 86

कारणलक्षणम् ] प्रमाणनिरूपणम् २१
तन्तुरूपस्य तु नियतः पूर्वभावोऽस्त्येव किन्त्वन्यथासिद्धः पटरूपज-
ननोपक्षीणत्वात्, पटं प्रत्यपि कारणत्वे कल्पनागौरवप्रसङ्गात् ।
तेनानन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वं कारणत्वम् । अनन्यथासिद्धनियत-
पश्चाद्भावित्वं कार्यत्वम् ।
तन्तुरूप का नियत पूर्वभाव तो है ही, किन्तु वह अन्यथासिद्ध [ होने से पट
के प्रति कारण नहीं हो सकता ] है । पट के रूप के उत्पादन में ही उसकी
[ शक्ति या उपयोगिता की ] समाप्ति हो जाती है । [ इसलिए ] पट के प्रति भी
( तन्तु रूप के ) कारणत्व [ मानने ] में कल्पना गौरव होने लगेगा । [ इसलिए
तन्तुरूप पटरूप के प्रति कारण नहीं है ]
इसलिए 'अन्यथासिद्ध नियत पूर्वभावित्व' [ यह ] कारणत्व [ अर्थात्
कारण का लक्षण ] है । और 'अनन्यथासिद्ध नियतपश्चाद्भावित्व' [ ही ] कार्यत्व
[ अर्थात् कार्य का लक्षण ] है ।
कारण के इस लक्षण में 'अनन्यथासिद्ध' पद विशेष महत्त्व का है ।
इसलिए उसको विशेष रूप से समझ लेना उपयोगी होगा । श्री विश्वनाथ ने
न्याय मुक्तावली में पाँच प्रकार के अन्यथासिद्ध प्रतिपादित किए हैं—
येन१ सह पूर्वभावः कारणमादाय वा यस्य ।
अन्यं प्रति पूर्वभावे ज्ञाते यत्पूर्वभावविज्ञानम् ॥
जनकं प्रति पूर्ववृत्तितामपरिज्ञाय न यस्य गृह्यते ।
अतिरिक्तमथापि यद्भवेन्नियतावश्यकपूर्वभाविनः ॥
एते पञ्चान्यथासिद्धा दण्डत्वादिकमादिमम् ।
घटादौ दण्डरूपादि द्वितीयमपि दर्शितम् ॥
तृतीयन्तु भवेद्व्योम, कुलालजनकोऽपरः ।
पञ्चमो रासभादिः स्यादेतेष्वावश्यकस्त्वसौ ॥
१ 'येन सह पूर्वभावो' जिस धर्म के सहित कारण का कार्य के प्रति पूर्वभाव
गृहीत होता है वह धर्म कार्य के प्रति अन्यथासिद्ध होता है । यह प्रथम
अन्यथासिद्ध का लक्षण है । जैसे—दण्ड घट का कारण है । उसकी कारणता
दण्डत्व धर्म विशिष्ट दण्ड में गृहीत होती है । अतएव दण्डत्व के साथ
पूर्वभाव गृहीत होने से दण्डत्व घट के प्रति प्रथम प्रकार का अन्यथासिद्ध है।
२ 'कारणमादाय वा यस्य' यह द्वितीय अन्यथासिद्ध का लक्षण है । इसका
अभिप्राय यह है कि जिसका कार्य के साथ स्वतन्त्र रूप से अन्वय व्यतिरेक न
१ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली १९, २२ ।