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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 330 में से

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पृष्ठ 80

अप्रमालक्षणम् ] प्रमाणनिरूपणम् १५
ही है। किस पद के रखने का क्या प्रयोजन है इसके जानने का सीधा मार्ग
यह है कि उस पद को लक्षण से हटा दिया जाय और तब उसका क्या प्रभाव
होता है इसको देखा जाय तब उस पद के रखने की उपयोगिता प्रतीत हो
जायेगी। जैसे यहाँ यदि यथार्थ पद को हटा दिया जाय तो 'अनुभवः प्रमा'
केवल इतना लक्षण रह जाता है। इस लक्षण के होने पर शुक्ति को रजत रूप
में ग्रहण करने वाला 'भ्रम' या 'विपर्यय' ज्ञान भी अनुभव रूप होने से 'प्रमा'
कहलाने लगेगा। अथवा अँधेरे में किसी ऊँचे से पेड़ के ठूंठ को खड़ा देख
कर 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' यह 'संशयात्मक' ज्ञान भी अनुभव रूप होने से 'प्रमा'
कहलाने लगेगा। इसी प्रकार तर्क ज्ञान में भी प्रमा का लक्षण चला जायगा।
परन्तु संशय, विपर्यय और तर्क ज्ञान यथार्थ ज्ञान नहीं है। उनको 'प्रमा'
नहीं कहा जाता है। यदि 'अनुभवः प्रमा' इस लक्षण के साथ 'यथार्थ' पद
जोड़ दिया जाय तो 'अयथार्थ' ज्ञान रूप 'संशय' 'विपर्यय' और 'तर्क' ज्ञान
में प्रमा के लक्षण की अतिव्याप्ति के निराकरण के लिए 'यथार्थ' पद का सन्नि-
वेश 'प्रमा' के लक्षणों में किया गया है।
इसी प्रकार स्मृति को भी प्रमा नहीं मानते हैं। अतएव स्मृति में प्रमा
के लक्षण की अतिव्याप्ति के निवारण के लिए अनुभव पद का निवेश इस
लक्षण में किया गया है। लक्षणों में आए हुए पदों के इस प्रकार प्रयोजन-
प्रदर्शन को 'पदकृत्य' कहते हैं। और इस प्रकार 'पदकृत्य' अर्थात् प्रत्येक पद
के रखे जाने के प्रयोजन बताते हुए की गई व्याख्या को सपदकृत्य व्याख्या
कहते हैं, 'सपदकृत्यं व्याख्यायताम्' कहने से इसी प्रकार पदकृत्य-सहित
व्याख्या कराना ही अभिप्रेत होता है।
अप्रमा लक्षण—
जो पदार्थ जैसा है उसको उसी रूप में ग्रहण करना यथार्थ ज्ञान अथवा
'प्रमा' कहलाता है। उससे भिन्न रूप में ग्रहण करना अयथार्थ ज्ञान या
अप्रमा कहलाता है। इस अयथार्थ ज्ञानके संशय, विपर्यय और तर्कज्ञान ये तीन
भेद यहाँ प्रदर्शित किए हैं। योगदर्शनमें 'विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्'१
अर्थात् अतद्रूप में प्रतिष्ठित मिथ्या ज्ञान को विपर्यय कहते हैं यह विपर्यय
का लक्षण किया है। जैसे शुक्ति को पड़ी देखकर कभी-कभी उसके 'चाकचिक्य'
अर्थात् चमक आदि के कारण उसको रजत समझ लिया जाता है। ऐसी दशा में
१. योग, १,८