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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 330 में से

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पृष्ठ 82

ज्ञानभेदाः ] प्रमाणनिरूपणम् १७
होने से तर्क को यथार्थ ज्ञान नहीं कह सकते हैं। हाँ उससे तत्त्वज्ञान में
सहायता मिलती है इसलिए सूत्रकार ने तर्क को ‘तत्त्वज्ञानार्थः’ तत्त्वज्ञान के
लिए ऐसा कहा है तत्त्वज्ञान ही नहीं कहा है। इस प्रकार भाष्यकार के
अनुसार तर्क भी अनवधारणात्मक, अनिश्चयात्मक ज्ञान है अतएव वह यथार्थ
ज्ञान के अन्तर्गत नहीं है। संशय और तर्क दोनों ज्ञान अनवधारणात्मक हैं
परन्तु संशय अनुमान का प्रवर्तक होने से परम्परया और तर्क तत्त्वज्ञान में
साक्षादुपयोगी है इसलिए संशय और तर्क एक नहीं हैं। इस प्रकार प्रमा का
लक्षण करते समय संशय विपर्यय और तर्क ज्ञान में प्रमा लक्षण की अतिव्याप्ति
वारण के लिए लक्षण में यथार्थ पद का निवेश किया गया है।
ज्ञान के भेद—
ज्ञान के भी 'अनुभव' तथा 'स्मृति' भेद से दो भेद माने गये हैं। उनमें
से ज्ञात विषयक ज्ञान को 'स्मृति' कहते हैं, और उससे भिन्न अर्थात् अज्ञात
विषयक ज्ञान को 'अनुभव' कहते हैं। ज्ञात विषयक ज्ञान भी दो प्रकार का होता
है जिनमें एक को 'स्मृति' और दूसरे को 'प्रत्यभिज्ञा' कहते हैं। किसी वस्तु को
जब हम देखते या किसी प्रकार से जानते हैं तब उस ज्ञान से हमारे आत्मा में एक
संस्कार उत्पन्न हो जाता है। वस्तु का ज्ञान तो स्थिर नहीं रहता है परन्तु वह
'संस्कार' बराबर बना रहता है। और कालान्तर में जब किसी कारण से वह
संस्कार उद्बुद्ध हो जाता है तब बिना बाह्य इन्द्रिय आदि की सहायता के उस
पदार्थ का पुनः ज्ञान होने लगता है। इसी ज्ञान को 'स्मृति' कहते हैं। स्मृति
सदा 'ज्ञात विषय' की ही होती है। इसलिए ‘ज्ञातविषयं ज्ञानं स्मृतिः’ यह स्मृति
का लक्षण है। स्मृति का कारण सदा संस्कार का उद्बोध ही होता है इसलिए
'संस्कारजन्यं ज्ञानं स्मृतिः' यह भी स्मृति का दूसरा लक्षण हो सकता है। स्मृति
को पैदा करने वाले संस्कार के उद्बोधक सादृश्यादि हैं। यथा ‘सादृश्यादृष्टचिन्ताद्याः
स्मृतिबीजस्य बोधकः’१। सादृश्य, अदृष्ट और चिन्ता आदि स्मृति के बीज
अर्थात् संस्कार के उद्बोधक हैं। जिस पदार्थ को हम पहिले देख चुके हैं उनके
सदृश पदार्थ को देखने पर उसकी स्मृति हो आती है कि ऐसा पदार्थ या व्यक्ति
हमने वहाँ देखा था। यहाँ सादृश्य संस्कार का उद्बोधक होता है। कभी किसी
बात को भूल जाने पर सोचने से उसका स्मरण हो आता है यहाँ चिन्ता या
सोचना संस्कार का उद्बोधक और स्मृति का जनक है। और कभी अदृष्ट वश
१ तर्कभाषा संस्कार प्रकरण।
२ त० भा०