तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० तर्कभाषा [ अयुतसिद्धौ
तदुक्तम्— तावेवायुतसिद्धौ द्वौ विज्ञातव्यौ ययोर्द्वयोः ॥
अनश्यदेकमपराश्रितमेवावतिष्ठते ॥
होगा तब उसके बाद घटगत रूप अथवा क्रिया का नाश होगा। इसलिए
घटनाश और घटगत रूपादि गुण तथा क्रिया के विनाश में कम से कम एक
क्षण का अन्तर अवश्य होगा। यह जो एक क्षण का काल है वही गुण तथा
क्रिया का 'विनश्यत्ताकाल' है और उस काल में गुण तथा क्रियादि निराश्रय हो
जाते हैं। जब घट का नाश हो गया और घटगत रूपादि गुण अथवा क्रिया
का नाश अगले क्षण में होना है तब उस एक क्षण में रूपादि का कोई आश्रय
नहीं है क्योंकि उनका आश्रय भूत घट पहिले क्षण में नष्ट हो चुका है। इस
लिए इस क्षण में रूपादि गुण निराश्रित हो जाते हैं। इस क्षण के अगले क्षण
में रूपादि गुणों का भी नाश हो जाता है। यह क्षण उनके नाश के अव्यवहित
पूर्व का क्षण है। विनाश से अव्यहित पूर्व का क्षण ही उसका 'विनश्यत्त
काल' कहा जाता है। 'विनश्यत्ता' का अर्थ 'विनाश कारणसामग्री सान्निध्य'
है। अर्थात् जिस क्षण में विनाश के समग्र कारण उपस्थित हो जायं वही
'विनश्यत्ता काल' है। उस विनाश कारण सामग्री के एकत्र हो जाने पर अगले
क्षण में कार्य का विनाश अवश्य हो जायगा। आश्रयभूत घटादि का नाश ही
रूपादि के विनाश की सामग्री का सान्निध्य है। इसलिए इस 'विनश्यत्ता काल'
में रूपादि निराश्रय भी रहते हैं। अतएव यदि 'ययोर्मध्ये एकमपराश्रितमेवा-
वतिष्ठते तावेवायुतसिद्धौ विज्ञातव्यौ' यही अयुतसिद्ध का लक्षण रखा जाय तो
'गुण गुणी' 'क्रिया क्रियावान्' और 'अवयव अवयवी' में यह लक्षण नहीं घट
सकेगा क्योंकि गुणादि अपराश्रित ही नहीं अपितु विनश्यत्ता काल में निराश्रित
भी रहते हैं। इस दोष के निवारण के लिए ही अयुतसिद्ध के लक्षण में
'अविनश्यत्' पद का समावेश किया गया है। इसका प्रयोजन यह हुआ कि
अविनश्यदवस्था में जो पराश्रित ही रहे उसको अयुतसिद्ध कहेंगे 'विनश्यत्ता
काल' में पराश्रित होना आवश्यक नहीं है। उस काल में निराश्रित भी रह
सकता है। इस प्रकार 'अयुतसिद्ध' के लक्षण में 'अविनश्यत्' पद का समावेश
कर देने से उक्त दोष का परिहार हो जाता है। गुण क्रिया आदि 'विनश्यत्ता
काल, में निराश्रित रहते हैं परन्तु अविनश्यत्ता काल में तो अपराश्रित ही रहते
हैं। इसलिए उनमें लक्षण का समन्वय हो जाता है। इसी बात को ग्रन्थकार
प्रतिपादित करते हैं:—
इसी से कहा है:—
उन हीं दो को अयुतसिद्ध समझना चाहिए जिन दोनों में से एक अविनश्यदवस्था
में दूसरे के आश्रित ही रहता है।