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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 330 में से

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पृष्ठ 85

१० तर्कभाषा [ कारणलक्षणम्
यद्यपि पटोत्पत्तौ दैवादागतस्य रासभादेः पूर्वभावो विद्यते, तथापि
नासौ नियतः।

केवल इतना लक्षण रखा जाय तो कुम्हार जब घड़ा बनाता है उस समय जो
वस्तुएँ उपस्थित हों वे सभी घट के प्रति कारण कहलाने लगेंगी। जैसे यदि
कोई देखने वाला पुरुष अथवा गर्दभ आदि कोई अन्य प्राणी वहाँ उपस्थित हो
गया है तो घटोत्पत्ति के पूर्व उसकी भी सत्ता होने से उसमें कारण का लक्षण
चला जायगा। अतएव उसके वारण करने के लिए 'नियत:' पद रखा है।
दैवात् आये हुए रासभ [ गदहा ] आदि की पूर्वसत्ता तो है परन्तु वह नियत
नहीं है। अर्थात् जब जब घड़ा बने तब तब रासभ आदि अवश्य उपस्थित
हों यह आवश्यक नहीं है। इसलिए रासभ आदि में कारण का लक्षण नहीं
जायगा। और तन्तु वेमा आदि का पूर्व भाव नियत है अर्थात् जब पट की
उत्पत्ति होगी उसके पूर्व तन्तु वेमादिक की उपस्थिति अवश्य होगी। इसलिए
नियत पूर्व भावी होने से तन्तु वेमादिक पट के कारण कहलाते हैं। परन्तु
रासभादि 'पूर्व भावी' होते हुए भी 'नियत पूर्वभावी' न होने से कारण नहीं
कहलाते हैं। यही बात आगे कहते हैं।

यद्यपि पट की उत्पत्ति [ के समय ] में दैवात् आए हुए रासभ [ गदहा ]
आदि का पूर्वभाव [ हो सकता ] है, फिर भी वह निश्चित् नहीं है। [ अर्थात्
जब जब कपड़ा बने तब तब रासभ की उपस्थिति अवश्य हो यह बात अनिवार्य
नहीं है। इसलिए रासभादि में कारण का लक्षण अतिव्याप्त नहीं होता ]

तन्तु तो पट का कारण है ही। तब जहाँ तन्तु रहेगा वहाँ उसका रूप
भी रहेगा। इसलिए जैसे तन्तु पट के प्रति कारण है। इसी प्रकार नियत
पूर्व भावी होने से तन्तुरूप भी पट के प्रति कारण हो सकता है, यह शङ्का
उत्पन्न होती है। उसका समाधान यह किया है कि तन्तुरूप पट के प्रति नहीं
अपितु पट के रूप के प्रति कारण है, पट के प्रति तो वह 'अन्यथासिद्ध' होने से
कारण नहीं है। क्योंकि कारण के लक्षण में 'अनन्यथासिद्ध' विशेषण भी रखा
गया है। उसका अभिप्राय यह है कि जो नियत पूर्वभावी होने पर 'अन्य-
थासिद्ध' न हो उसको कारण कहते हैं। तन्तुरूप पटरूप के प्रति, तो कारण
है परन्तु पट के प्रति कारण नहीं है। क्योंकि पटरूप के उत्पादन में ही तन्तु
रूप का उपयोग समाप्त हो जाता है। अतः पट के प्रति वह 'अन्यथासिद्ध'
होने से कारण नहीं है। यही आगे कहते हैं—