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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 330 में से

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पृष्ठ 93

२८ तर्कभाषा [ विशेषलक्षणम्
कारण होना चाहिए । इसलिए एक घड़ा दूसरे घड़े से क्यों भिन्न है यह प्रश्न
हो सकता है । इस प्रश्न का उत्तर उसके कारण भेद अर्थात् अवयव भेद के
आधार पर यह दिया जा सकता है कि दोनों घड़े अलग-अलग अवयवों से बने
हैं इसलिए भिन्न हैं । घट के अवयवों को कपाल कहते हैं । अर्थात् दोनों घड़ों
के कपाल भिन्न हैं इसलिए दोनों घड़े भी भिन्न हैं । फिर कपालों के विषय में
भी यही प्रश्न उत्पन्न होगा कि वह कपाल एक दूसरे से क्यों भिन्न है । इसका
उत्तर भी अवयव भेद के आधार पर दिया जा सकता है कि उन दोनों कपालों
के अवयव अर्थात् कपालिकाएँ भिन्न हैं अतएव उन भिन्न कपालिकाओं से बने
कपाल भिन्न हैं । इसके बाद जब कपालिकाओं के विषय में यही प्रश्न होगा तो
वहाँ भी अवयव भेद की पद्धति से काम चल जायगा । अर्थात् कपालिकाएँ
क्यों भिन्न हैं इस प्रश्न का उत्तर यह दिया जा सकता है कि उनका निर्माण
भिन्न अवयवों अर्थात् भिन्न-भिन्न क्षुद्र कपालिकाओं से हुआ है अतएव
कपालिकाएँ परस्पर भिन्न हैं । इस प्रक्रिया से घट का विश्लेषण करते-करते हम
द्वयणुक तक पहुँचते हैं । तब द्वयणुक के विषय में भी यही प्रश्न होता है कि
दो द्वयणुकों में परस्पर भेद क्यों है । इसका उत्तर भी वही होगा कि उनके
अवयव अर्थात् परमाणु भिन्न हैं इसलिए भिन्न परमाणुओं से बने हुए द्वयणुक
भिन्न हैं । अब यही प्रश्न परमाणु के विषय में उपस्थित होता है कि वे दो
परमाणु जो एक दूसरे से भिन्न हैं उसका क्या कारण है । यहाँ अब तक दिए
हुए अवयव भेद वाले उत्तर से काम नहीं चलेगा क्योंकि परमाणु के अवयव
नहीं होते । स्थूल पदार्थ का विश्लेषण करते-करते जो सबसे छोटा अन्तिम
अवयव है उसको ही परमाणु कहते हैं । उसके आगे और अवयव विभाग नहीं
हो सकता है । इसलिए परमाणु के अवयव नहीं होते अपितु परमाणु नित्य
है । तब इन परमाणुओं में परस्पर भेद के लिए वैशेषिक दर्शन में 'विशेष'
नामक एक पदार्थ की कल्पना की गई है । इसी 'विशेष' नामक पदार्थ के
प्रतिपादन के आधार पर इस दर्शन को 'वैशेषिक' दर्शन कहते हैं । एक
परमाणु दूसरे परमाणु से भिन्न इसलिए है कि उनमें रहने वाला 'विशेष' भिन्न-
भिन्न है । और विशेष का स्वरूप ही 'स्वतो व्यावृत्त' माना गया है । इस
प्रकार नित्य द्रव्य परमाणु आदि में रहने वाला अन्तिम भेदक धर्म 'विशेष'
कहा जाता है । हर परमाणु में रहने वाला विशेष एक दूसरे से भिन्न और
स्वतो व्यावृत्त ही है इसलिए उसके आगे और कोई भेदक धर्म नहीं है ।
विशेष अन्तिम भेदक धर्म है और वह नित्य द्रव्य परमाणु आदि में रहता है ।
परन्तु जैसे जाति को व्यक्ति से या गुण को गुणी से अलग नहीं किया जा