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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 330 में से

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पृष्ठ 88

लक्षणान्तरखण्डनम् ] प्रमाणनिरूपणम् २३
यत्तु कश्चिदाह कार्यानुकूतान्वयव्यतिरेकि कारणमिति, तदयुक्तम् ।
नित्यविभूनां व्योमादीनां कालतो देशतश्च व्यतिरेकासम्भवेनाकारणत्व-
प्रसङ्गात् ।
था । उस लक्षण में नियत पद के रखने की आवश्यकता न थी । क्योंकि उसका
काम अनन्यथासिद्ध पद से ही पूरा हो जाता । परन्तु उसके इस विशेष महत्त्व
के कारण ही कारण के लक्षण में उसका समावेश किया गया है ।
इस शैली का अवलम्बन भाष्यकार वात्स्यायन ने भी न्यायदर्शन के प्रथम
सूत्र की व्याख्या में किया है । न्याय के षोडश पदार्थों में से संशय दृष्टान्त
आदि पदार्थों का अन्तर्भाव प्रमेय पदार्थ में ही हो सकता है । परन्तु न्यायशास्त्र
की दृष्टि से उनका विशेष महत्त्व होने से सूत्रकार ने उसका पृथक् परिगणन
किया है । भाष्यकार का लेख इस प्रकार है:—
'तत्र संशयादीनां पृथग्वचनमनर्थकं, संशयादयो हि यथासम्भवं प्रमाणेषु
प्रमेयेषु चान्तर्भवन्तो न व्यतिरिच्यन्ते इति ।
'सत्यमेतत्, इमास्तु चतस्रो विद्याः पृथक्प्रस्थानाः प्राणभृतामनुग्रहायोपदि-
श्यन्ते । यासां चतुर्थीयमान्वीक्षिकी न्यायविद्या । तस्याः, पृथक्प्रस्थानाः
संशयादयः पदार्थाः । तेषां पृथग्वचनमन्तरेणाध्यात्मविद्यामात्रमियं स्यात् ,
यथोपनिषदः । तस्मात् संशयादिभिः पदार्थैः पृथक् प्रस्थाप्यते'१
इन पाँच प्रकार के अन्यथासिद्धों में तृतीय अन्यथासिद्ध का उदाहरण
आकाश को बताया है । 'तृतीयन्तु भवेद् व्योम' । परन्तु यह उदाहरण ठीक
नहीं है क्योंकि आकाश को कार्यमात्र के प्रति साधारण कारण माना गया है ।
जैसा कि मूल ग्रन्थ की अगली ही पङ्क्ति में आता है । इसलिए आकाश को
अन्यथासिद्ध का उदाहरण न बनाकर उसका कोई अन्य ही उदाहरण देना
चाहिए था । मुक्तावलीकार का 'तृतीयं तु भवेद् व्योम' लिखकर आकाश को
अन्यथासिद्ध बताना उचित नहीं है, क्योंकि आकाश को अन्यथासिद्ध मान
लेने पर ग्रन्थ की अगली पंक्ति का समन्वय नहीं हो सकेगा ।
और जो किसी ने कहा है कि 'कार्यानुकूतान्वयव्यतिरेकि कारणम्' यह कारण
का लक्षण है वह अयुक्त है । क्योंकि वैसा कहने पर नित्य और विभु आकाश
काल आदि पदार्थों का किसी काल या देश में व्यतिरेक [अभाव] सम्भव न होने
१. न्याय वा० भा० १, १, १ ।