तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 89, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ें२४ तर्कभाषा [ लक्षणान्तरखण्डनम्
से उनका अकारणत्व प्राप्त होने लगेगा । [अर्थात् 'यदि कार्यानुकृतान्वयव्यतिरेकि
कारणम्' यह कारण का लक्षण किया जायगा तो नित्य और सर्वव्यापक आकाश
आदि पदार्थों का किसी देश या किसी काल में अभाव सम्भव न होने से उनमें
कारण का यह लक्षण नहीं जा सकेगा । इसलिए अव्याप्तिदोष ग्रस्त हो जाने से
यह लक्षण ठीक नहीं है । ]
मीमांसक आदि 'कार्यानुकृतान्वयव्यतिरेकि कारणम्' यह कारण का
लक्षण करते हैं । इस लक्षण का अभिप्राय यह है कि 'कार्येण अनुकृतौ अन्वय-
व्यतिरेकौ यस्य तत्कारणम्' अर्थात् कार्य जिसके अन्वय और व्यतिरेक का
अनुसरण करता है उसको कारण कहते हैं । इसमें अन्वय और व्यतिरेक का
लक्षण 'तत्सत्त्वे तत्सत्ता अन्वयः' और 'तदभावे तदभावो व्यतिरेकः' किया
जाता है । साधारणतः कारणता का निर्णय अन्वयव्यतिरेक से ही होता है ।
जैसे अग्नि दाह के प्रति कारण है यह बात अन्वयव्यतिरेक से ही सिद्ध होती
है । अग्नि और दाह का अन्वयव्यतिरेक इस प्रकार होगा—'अग्निसत्त्वे दाहसत्ता'
अर्थात् अग्नि के होने पर दाह होता है यह अन्वय हुआ और 'अग्न्य-
भावे दाहाभावः' अग्नि के अभाव में दाह का अभाव होता है यह व्यतिरेक
हुआ । इन दोनों के होने से ही अग्निदाह के प्रति कारण सिद्ध होता है ।
इसी आधार पर कुछ लोग 'कार्यानुकृतान्वयव्यतिरेकि कारणम्' यह कारण
का लक्षण करते हैं ।
नैयायिकों का सिद्धान्त पक्ष यह है कि 'कार्यानुकृतान्वयव्यतिरेकि कारणम्'
यह कारण का लक्षण ठीक नहीं है, क्योंकि आकाश काल आदि जो नित्य और
विभु पदार्थ हैं उनमें कारण का यह लक्षण सम्भव न होगा । आकाश, काल
आदि पदार्थ नित्य हैं अतएव किसी काल में उनका अभाव नहीं मिलेगा। और वे
विभु अर्थात् सर्वत्र व्यापक हैं अतएव किसी देश में उनका अभाव नहीं मिलेगा।
इसलिए यद्यपि 'आकाशसत्त्वे घटसत्ता' यह अन्वय तो बन जायगा परन्तु
'आकाशाभावे घटाभावः' यह व्यतिरेक नहीं बन सकेगा । क्योंकि आकाश के
नित्य होने से किसी काल में और विभु होने से किसी देश में उसका अभाव
नहीं मिलेगा । इसी प्रकार 'कालसत्त्वे घटसत्ता' यह अन्वय तो बन जायगा
परन्तु 'कालाभावे घटाभावः' यह व्यतिरेक नहीं मिल सकेगा । इसलिए अन्वय
बन जाने पर भी व्यतिरेक के असम्भव होने से कारण यह लक्षण आकाश
काल आदि नित्य विभु पदार्थों में नहीं घट सकेगा । अतः अव्याप्ति दोषग्रस्त
होने से यह कारण का लक्षण ठीक नहीं है ।