तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअयुतसिद्धौ ] प्रमाणनिरूपणम् २६
सकता है इसी प्रकार विशेष को नित्य द्रव्य परमाणु आदि से अलग नहीं
किया जा सकता है इसलिए नित्य द्रव्य और विशेष ये दोनों अयुत सिद्ध कहे
जाते हैं और उनका सम्बन्ध समवाय कहा जाता है।
इस प्रकार ‘ययोर्मध्ये एकमपराश्रितमेवावतिष्ठते तावयुतसिद्धौ विज्ञातव्यौ’
अर्थात् जिन दो में से कोई एक, दूसरे के आश्रित ही रहे उससे अलग न किया
जा सके उन दोनों को अयुतसिद्ध कहते हैं। इसी लिए १ अवयव अवयवी’,
२ ‘गुण गुणी’, ३ ‘क्रिया क्रियावान्’, ४ ‘जाति व्यक्ति’ और ५ ‘नित्यद्रव्य
तथा विशेष’ ये पांच अयुतसिद्ध माने गए हैं। यहां तक अयुतसिद्ध के लक्षण
का स्पष्टीकरण हो गया। परन्तु लक्षण में ‘अविनश्यत्’ पद भी दिया हुआ
है। अयुतसिद्ध के लक्षण में इस ‘अविनश्यत्’ पद के रखने का क्या प्रयोजन
है इसके स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। यदि इस लक्षण में ‘अविनश्यत्’ पद
न रखा जाय तो इस लक्षण में अव्याप्ति दोष आ जायगा। ‘लक्ष्यैकदेशावृत्ति-
त्वमव्याप्तिः’ जो लक्षण लक्ष्य के एक देश में न जावे उसे अव्याप्ति दोष ग्रस्त
कहा जाता है। यदि ‘अयुतसिद्ध’ के इस लक्षण में से ‘अविनश्यत्’ पद को
हटा कर केवल ‘ययोर्मध्ये एकमपराश्रितमेवावतिष्ठते तावयुतसिद्धौ’ इतना ही
लक्षण किया जाय तो अयुतसिद्ध के जो पांच भेद अभी प्रदर्शित किए हैं उनमें
से पहिले तीनों में यह लक्षण नहीं जा सकेगा। क्योंकि गुण आदि सदा गुणी
आदि के आश्रित ही नहीं रहते हैं अपितु एक समय ऐसा भी आता है जब
कि गुण, क्रिया, तथा अवयवी ये सब निराश्रित भी हो जाते हैं। इसलिए
‘एकमपराश्रितमेवावतिष्ठते’ यह लक्षण उनमें नहीं घट सकता है। जाति और
व्यक्ति में भी जाति के नित्य होने पर भी व्यक्ति के अनित्य होने से व्यक्ति का
नाश होने पर जाति के निराश्रय हो जाने की सम्भावना है। केवल नित्य
द्रव्य और विशेष इन में दोनों के नित्य होने से अयुतसिद्ध का लक्षण घट
सकेगा। शेष चार में अव्याप्त हो जायगा फलतः लक्ष्यैकदेश में अवृत्ति होने
से यह लक्षण अव्याप्त हो जायगा। उसका वारण करने के लिए लक्षण में
‘अविनश्यत्’ पद का प्रयोग आवश्यक है।
घटरूप का कारण घट है इसी प्रकार घट में रहने वाली क्रिया का कारण
भी घट है। इन गुण तथा क्रिया के नाश के अन्य प्रकारों से अतिरिक्त एक
प्रकार यह भी है कि कारण के नाश से कार्य का नाश होता है। अर्थात् घट
के नाश से घटगत रूप तथा क्रिया आदि का नाश होता है। इस दशा में घट
का नाश कारण है, और रूपादि गुण तथा क्रिया का नाश कार्य होगा। कारण
और कार्य में पौर्वापर्य का होना आवश्यक है। अतएव पहिले घट का नाश