तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ तर्कभाषा [ प्रमालक्षणम्
प्रमा
का पुनः प्रमा, यस्याः करणं प्रमाणम् ।
उच्यते । यथार्थानुभवः प्रमा । यथार्थ इत्ययथार्थानां संशय-विपर्यय-
तर्कज्ञानानां निरासः । अनुभव इति स्मृतेर्निरासः ।
ज्ञातविषयं ज्ञानं स्मृतिः । अनुभवो नाम स्मृतिव्यतिरिक्तं ज्ञानम् ।
[ उत्तर ] ठीक है [ अर्थात् करण का फल अवश्य होता है । इसलिये ]
प्रमा ही [ प्रमाणरूप करण या साधन का ] फल अर्थात् साध्य है । [ जिसका
साधन होता है वही उसका फल होता है .प्रमा का करण या साधन प्रमाण है
तो उसका फल प्रमा ही होगी ] जैसे छेदन [ काटने ] के करण फरसे का फल
छेदन ही होता है । [ इसी प्रकार यहां प्रमा के करण अर्थात् प्रमाण का फल
प्रमा ही समझना चाहिए ]
इस प्रकार प्रमाण का सामान्य लक्षण हुआ । परन्तु इस लक्षण में प्रमा
और करण दो शब्द आए जब तक उनकी व्याख्या न हो तब तक यह लक्षण
स्पष्ट नहीं होता । अतएव आगे प्रमा का लक्षण करते हैं ।
[ प्रश्न ] फिर प्रमा क्या है जिसका करण प्रमाण [ कहा जाता ] है ।
[ उत्तर ] कहते हैं । यथार्थ अनुभव [ का नाम ] प्रमा है । यथार्थ पद से
अयथार्थ [ ज्ञान रूप ] संशय, विपर्यय, और तर्क ज्ञान का निराकरण किया
[ जिससे संशय-विपर्यय और तर्क ज्ञान में प्रमा का लक्षण न चला जाय ] ।
अनुभव इस [ पद ] से स्मृति का निराकरण किया [ अर्थात् अनुभव पद इस
लिए रखा कि स्मृति में प्रमा का लक्षण अतिव्याप्त न हो जाय ] ।
[ ज्ञान के दो भेद हैं एक अनुभव और दूसरा स्मृति । उनमें से ] ज्ञात
विषयक ज्ञान को स्मृति कहते हैं और स्मृति से भिन्न ज्ञान को अनुभव कहते हैं ।
पदकृत्य—
'प्रमाकरणं प्रमाणम्' यह प्रमाण का सामान्य लक्षण किया था । उसके
स्पष्टीकरण के लिए 'प्रमा' का लक्षण करना आवश्यक है अतएव 'यथार्थानुभवः
प्रमा' यह 'प्रमा' का लक्षण किया है । इस लक्षण में भी 'प्रमा' यह पद लक्ष्य
अंश है और 'यथार्थानुभवः' इतना लक्षण अंश है । लक्षण अंश में यथार्थ
और अनुभव इन दो पदों का समावेश है । लक्षण में ये दोनों पद विशेष
अभिप्राय से रखे गए हैं । ऊपर अतिव्याप्ति आदि लक्षण के दोषों का वर्णन
किया है । इन पदों के रखने का प्रयोजन अतिव्याप्ति दोष का निराकरण करना