तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमवायिकारणम् ] प्रमाणनिरूपणम् २५
तच्च कारणं त्रिविधम् । समवायि-असमवायि-निमित्त-भेदात् । तत्र यत्स-
मवेतं कार्यमुत्पद्यते तत्समवायिकारणम् । यथा तन्तवः पटस्य समवायिका-
रणम् । यतस्तन्तुष्वेव पटः समवेतो जायते, न तुर्यादिषु ।
आकाश काल आदि को कार्यमात्र के प्रति साधारण कारण माना गया है ।
यद्यपि तर्कभाषाकारने कारण के समवायिकारण, असमवायि कारण और निमित्त
कारण ये तीन ही भेद किए है । परन्तु वाक्यवृत्ति में प्रकारान्तर से साधारण
कारण और असाधारण कारण ये दो भेद भी किए हैं । उनमें से १ ईश्वर
तथा उसके २ ज्ञान, ३ इच्छा तथा ४ कृति, ५ प्रागभाव, ६ आकाश, ७ काल,
८ दिक् इन आठों को कार्य मात्र के प्रति साधारण कारण माना है । और
कहीं-कहीं प्रतिबन्धकसंसर्गाभाव को भी कार्यमात्र के प्रति साधारण कारण माना
गया है । इस प्रकार ९ साधारण कारण होते हैं ।
योगदर्शन के व्यास भाष्य में भी उत्पत्तिकारण और स्थितिकारण आदि
भेद से नौ प्रकार के कारणों का वर्णन करते हुए यह लिखा है :—
‘उत्पत्तिस्थित्यभिव्यक्तिविकारप्रत्ययाप्तयः ।
वियोगान्यत्वधृतयः कारणं नवधा स्मृतम् ॥’
नित्य और विभु पदार्थों को कारण मानने का सिद्धान्त श्री उदयनाचार्य
ने भी अपनी न्यायकुसुमाञ्जलि में प्रतिपादित किया है और कारण का ‘अन-
न्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वं कारणत्वम्’ यही लक्षण माना है ।
‘पूर्वभावो हि हेतुत्वं मीयते येन केनचित् ।
व्यापकस्यापि नित्यस्य धर्मिंधीरन्यथा न हि ॥’
इस प्रकार नित्य और विभु आकाश आदि, कार्यमात्र के प्रति साधारण
कारण हैं । इस लिए न्यायमुक्तावलीकार श्री विश्वनाथ ने जो आकाश को तृतीय
अन्यथा सिद्ध का उदाहरण बना दिया है वह उचित नहीं हुआ है। इसी प्रकार
आकाशादि में अव्याप्त होने के कारण ‘कार्यानुकूलान्वयव्यतिरेकि कारणम्’ यह
कारण का लक्षण भी ठीक नहीं है ।
और वह कारण १ समवायि कारण, २ असमवायि कारण और ३ निमित्त
कारण इस भेद से तीन प्रकार का होता है ।
उसमें से जिसमें समवाय सम्बन्ध से कार्य उत्पन्न होता है उसको ‘समवायि-
कारण’ कहते हैं । जैसे—तन्तु पट के समवायि कारण हैं । क्योंकि तन्तुओं में
ही समवाय सम्बन्ध से पट पैदा होता है । तुरी आदि में नहीं ।
१ योग० २, २८ । २ न्यायकुसुमाञ्जलिः ४, १, १९ ।