तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ तर्कभाषा [ अन्यथासिद्धाः
हो, अपितु अपने कारण के द्वारा अन्वय व्यतिरेक हो वह अन्यथा सिद्ध
कहाता है। जैसे—घट के प्रति दण्डरूप का स्वतः अन्वय व्यतिरेक नहीं
है अपितु अपने कारण दण्ड के द्वारा अन्वय व्यतिरेक होता है। इसलिए
दण्डरूप घट के प्रति अन्यथासिद्ध है। यह अन्यथासिद्ध का दूसरा भेद हुआ।
३ 'अन्यं प्रति पूर्वभावे ज्ञाते यत्पूर्वभावविज्ञानम्' । यह तृतीय अन्यथासिद्ध
का लक्षण है। इसका अभिप्राय यह है कि किसी अन्य के प्रति पूर्वभाव
ज्ञात होने पर ही जिसका कार्य के प्रति पूर्वभाव गृहीत हो सके वह तृतीय
अन्यथासिद्ध होता है। जैसे—आकाश घट के प्रति अन्यथासिद्ध है। आकाश
प्रत्यक्ष नहीं है। उसकी सिद्धि शब्द के समवायि कारण के रूप में अनुमान
द्वारा ही होती है। इसलिए अन्य अर्थात् शब्द के प्रति पूर्वभाव अर्थात्
कारण के रूप में आकाश में सिद्ध होने पर ही उसकी घट के प्रति पूर्व-
वृत्तिता सम्भव हो सकती है। इसलिए आकाश, घटादि के प्रति तृतीय
प्रकार का अन्यथासिद्ध है।
४ 'जनकं प्रति पूर्ववृत्तित्वमपरिज्ञाय न यस्य गृह्यते' । यह चतुर्थ अन्यथासिद्ध
का लक्षण है। इसका आशय यह है कि कारण का जो कारण है वह
चतुर्थ अन्यथासिद्ध होता है। जनक अर्थात् कारण के प्रति पूर्ववृत्तिता
अर्थात् कारणत्व के बिना जिसकी कार्य के प्रति पूर्ववृत्तिता गृहीत न हो।
अर्थात् जो कारण का कारण है वह चतुर्थ अन्यथासिद्ध कहलाता है। जैसे
कुम्भकार का पिता घट के प्रति अन्यथासिद्ध है।
५ 'अतिरिक्तमथापि यद्भवेन्नियतावेक्षकपूर्वभाविनः' । यह पञ्चम अन्यथासिद्ध
का लक्षण है। इसका भाव यह है कि नियतावश्यक पूर्वभावी से अतिरिक्त
जो कुछ भी है वह सब पञ्चम अन्यथासिद्ध है। जैसे पटोत्पत्ति के प्रति
दैवादागत रासभ । 'अनन्यथासिद्धिनियतपूर्वभावित्वं कारणत्वम्' इस कारण
लक्षण की व्याख्या करते समय नियत पद का प्रयोजन रासभ में अतिव्याप्ति
वारण दिखाया था। वह रासभ पञ्चम प्रकार का अन्यथा सिद्ध कहलाता है।
इस प्रकार 'मुक्तावलीकार ने पाँच प्रकार के' 'अन्यथासिद्ध' दिखलाये हैं।
परन्तु इन सबों में 'पञ्चम' अन्यथासिद्ध ही सबसे मुख्य है। इसी लिये मुक्तावलीकार
ने 'एतेष्वावश्यकस्त्वसौ' लिखकर उसकी महत्ता को सूचित किया है। इसी कारण
तर्कभाषाकार ने इस पञ्चम अन्यथासिद्ध को उसके महत्त्वको ध्यान में रखते हुए,
अन्य 'अन्यथासिद्धों' से अलग विशेषरूप से नियतपद से सूचित किया। अन्यथा
'अनन्यथासिद्धपूर्वभावित्वं कारणत्वम्' इतना ही कारण का लक्षण किया जा सकता