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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 330 में से

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पृष्ठ 83

१८ तर्कभाषा [ स्मृतप्रत्यभिज्ञे
विना सादृश्यदर्शन या चिन्ता के भी संस्कार का उद्बोध और स्मृति की उत्पत्ति
हो जाती है। जैसा कि महाकवि और प्रकाण्ड दार्शनिक श्रीहर्ष ने लिखा है—
'अदृष्टमप्यर्थमहदृवैभवात्करोति सुसिर्जनदर्शनातिथिम्” १ ।
स्मृति और प्रत्यभिज्ञा—
ज्ञान का एक भेद और भी है जिसको 'प्रत्यभिज्ञा' कहते हैं। प्रत्यभिज्ञा
का लक्षण 'तत्तेदन्तावगाहिनी प्रतीतिः प्रत्यभिज्ञा' यह किया गया है। अर्थात्
'तत्ता, और 'इदन्ता' दोनों को अवगाहन करने वाली प्रतीति 'प्रत्यभिज्ञा'
कहलाती है। तत्ता का अर्थ तद्देश और तत्काल सम्बन्ध अर्थात् पूर्वदेश और
पूर्वकाल सम्बन्ध है। और 'इदन्ता' का अर्थ एतद्देश और एतत्कालसम्बन्ध है।
जिसमें पूर्वदेश पूर्वकाल और वर्तमान देश वर्तमान काल दोनों की प्रतीति हो
उस प्रतीति को प्रत्यभिज्ञा कहते हैं। जैसे 'सोऽयं देवदत्तः' यह प्रत्यभिज्ञा का
उदाहरण है। यह वही देवदत्त है जिसे हमने काशी में देखा था। इसमें 'सः'
पद 'तत्ता' अर्थात् पूर्वदेश पूर्वकाल सम्बन्ध का द्योतक और 'अय' पद 'इदन्ता'
अर्थात् एतद्देश एतत्काल सम्बन्ध अर्थात् वर्तमान देश और काल के सम्बन्ध
का बोधक है अर्थात् '