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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 330 में से

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पृष्ठ 91

२६ तर्कभाषा [ अयुतसिद्धौ
ननु तन्तुसम्बन्ध इव तुर्यादिसम्बन्धोऽपि पटस्य विद्यते, तत्कथं
तन्तुष्वेव पटः समवेतो जायते न, तुर्यादिषु ?
सत्यम् । द्विविधः सम्बन्धः संयोगः समवायश्चेति । तत्रायुतसिद्धयोः
सम्बन्धः समवायः । अन्ययोस्तु संयोग एव ।
कौ पुनरयुतसिद्धौ ? ययोर्मध्ये एकमविनश्यदपराश्रितमेवावतिष्ठते
तावयुतसिद्धौ ।
इसका अभिप्राय यह है कि पट की उत्पत्ति के प्रति 'तुरी' 'तन्तु' 'वेमा'
आदि अनेक कारण हैं । परन्तु उनमें से समवायि कारण केवल तन्तु ही हैं,
'तुरी' 'वेमा' आदि पट के समवायि कारण नहीं अपितु निमित्त कारण होते हैं ।
पट के प्रति तुरी, तन्तु, वेमादिक की इसी कारणता का वर्णन महाकवि श्रीहर्ष
ने अपने नैषधीय चरित नामक महाकाव्य में बड़ी सुन्दरता से इस प्रकार
किया है—
'सितांशुवर्णैर्वयति स्म तद्गुणैर्महासिनेम्नः सहकृत्वरी बहुम् ।
दिगङ्गनाङ्गावरणं रणाङ्गणे यशः पट तद्भटचातुरी तुरी' ॥
अर्थात्, रणभूमि के प्राङ्गण में महान् असिरूप वेमा की सहकारिणी
नल के सैनिकों की चातुरीरूप तुरी, उसके शुभ्र वर्ण के शौर्यादि गुणरूप तन्तुओं
से दिगङ्गना के आवरण के लिए कीर्तिरूप पट को बुन रही थी । इस समस्त
वस्तु विषयक साङ्गरूपक द्वारा कवि ने इस कार्य कारण भाव को प्रदर्शित
किया है ।
[ प्रश्न ] तन्तु [ के साथ ] सम्बन्ध के समान तुरी आदि के साथ भी
पट का सम्बन्ध है तब फिर क्यों तन्तुओं में ही समवाय सम्बन्ध से पट उत्पन्न
होता है और तुरी आदि में नहीं ।
[ उत्तर ] ठीक है । [ पट का तुरी और तन्तु दोनों के साथ सम्बन्ध अवश्य
है ] परन्तु सम्बन्ध दो प्रकार का होता है [ एक ] संयोग और [ दूसरा ] समवाय ।
उनमें से दो अयुतसिद्ध [ पदार्थों ] का सम्बन्ध समवाय [ होता है ] और अन्यों
का तो संयोग [ सम्बन्ध ] ही [ होता है, समवाय नहीं । इनमें से तन्तु और पट
अयुतसिद्ध हैं इसलिए उनका सम्बन्ध समवाय है और तुरी पट अयुतसिद्ध नहीं
हैं । इसलिए उनका संयोग सम्बन्ध है । अतः तन्तु पट के समवायि कारण हैं
और तुरी पट का समवायि कारण नहीं अपितु निमित्त कारण मात्र है ]
[ प्रश्न ] किन दो को अयुतसिद्ध कहते हैं ?
[ उत्तर ] जिन दो में से एक अविनश्यदवस्था में दूसरे के आश्रित ही रहता
है वे दोनों ही [ परस्पर ] अयुतसिद्ध [ कहलाते ] हैं ।
१ नैषध० १, १२ ।