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तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

नव्यप्रत्नभेदः ] उपोद्घातः ५
व्याकरण और प्राचीन व्याकरण, नवीन वेदान्त और प्राचीन वेदान्त आदि
शब्दों का प्रयोग बहुधा होता है परन्तु इस नव्य और प्राचीन का भेद किस
आधार पर किया जाय यह कहीं निर्दिष्ट नहीं किया गया है। इसलिए बहुधा
लोग कालक्रम को ही इस नवीनता और प्राचीनता का भेदक मानते हैं।
अर्थात् जो अधिक प्राचीन समय में लिखा गया वह प्राचीन और जो अपेक्षाकृत
बाद में या आजकल लिखा गया उसको नवीन कहते हैं। परन्तु यह व्यवस्था
ठीक नहीं है। क्योंकि इसमें काल की कोई ऐसी सीमा निर्धारित नहीं की जा
सकती है कि अमुक संवत् के पूर्व का लिखा साहित्य प्राचीन समझा जावे
और उसके बाद का लिखा साहित्य नवीन समझा जावे। हमारे मत में नवीन
और प्राचीन का यह भेद कालकृत नहीं अपितु प्रकारकृत है। इन सभी शास्त्रों
में जिनमें नवीन और प्राचीन का व्यवहार होता है दो प्रकार की रचनाएँ पाई
जाती हैं। न्याय, वेदान्त अथवा व्याकरण आदि शास्त्रों के आदि ग्रन्थों का
निर्माण सूत्ररूप में हुआ था। न्याय दर्शन के मूल आधार अक्षपाद गौतम
के न्यायसूत्र हैं। वेदान्त दर्शन का मूल आधार बादरायण व्यासकृत वेदान्तसूत्र
हैं। इसी प्रकार व्याकरण का मूल आधार पाणिनिकृत अष्टाध्यायी के सूत्र हैं।
इस प्रकार इन सब के मूल ग्रन्थ सूत्ररूप में हैं। आगे इन विषयों पर जो
ग्रन्थ लिखे गए उनमें दो प्रकार की पद्धति का अवलम्बन किया गया है। एक
पद्धति के ग्रन्थकारों ने सूत्रक्रम का अवलम्बन करके उनकी व्याख्या में ही
अपने ग्रन्थ लिखे। जैसे व्याकरण में 'काशिका', 'महाभाष्य' आदि, न्याय में
'वात्स्यायन भाष्य' 'न्याय वार्तिक' आदि, वेदान्त में शङ्कराचार्य, रामानुजाचार्य
आदिकृत भाष्य। ये सब सूत्र क्रम का अनुसरण करके ही लिखे गए हैं।
इस सूत्रक्रमानुसारिणी पद्धति को हम प्राचीन पद्धति कहना चाहते हैं। इन
विषयों में दूसरी पद्धति के ग्रन्थ इस प्रकार के हैं जिनमें सूत्रक्रम का ध्यान न
रख कर उस शास्त्र के विषय को स्वतन्त्र रूप से लिखा गया है। जैसे व्याकरण
में 'सिद्धान्तकौमुदी', न्याय में 'तर्कभाषा' 'मुक्तावली' आदि वेदान्त में अद्वैत-
सिद्धि', 'चित्सुखी' आदि। यह ग्रन्थ यद्यपि मूलग्रन्थों के विषय का ही प्रतिपादन
करते हैं परन्तु उनमें मूलग्रन्थों के सूत्रक्रम का अवलम्बन नहीं किया गया है।
इस पद्धति को नव्यशैली कहना चाहिये। इस दृष्टि से प्राचीनकाल में भी लिखे
गए 'सिद्धान्तकौमुदी' आदि ग्रन्थ नव्य व्याकरण के और आधुनिक काल में भी
सूत्रक्रम के अनुसार लिखे जाने वाले यह ग्रन्थ प्राचीन व्याकरण के अन्तर्गत

६ तर्कभाषा [ प्रकरणग्रन्थाः
समझने चाहिये। हमने अपने 'दर्शनमीमांसा' नामक ग्रन्थ में इस भेद का
निरूपण इस प्रकार किया है :—
“द्वैधं दर्शनसाहित्यं नूतनप्रत्नभेदतः ।
प्रत्नं सूत्रक्रमापेक्षि, तदुपेक्ष्य च नूतनम् ॥
सूत्रवार्तिकभाष्यादि, क्वचित्टीकापरम्परा ।
प्रत्नं दर्शनसाहित्यं नूतनं च तथेतरत् ॥
सूत्रक्रमं परित्यज्य स्वतन्त्रैर्विबुधैस्ततः ।
ग्रन्था येऽत्र कृतास्ते तु साहित्ये नूतने मताः ॥
नूतनप्रत्नभेदोऽयं न कालापेक्षिको मतः ।
अङ्गीकृतोऽसौ सर्वत्र भङ्गीभेदात्तु केवलम्”१ ॥
इस लक्षण के अनुसार तर्कभाषा नवीन शैली का अवलम्बन करके लिखी
गई है अतएव उसकी गणना 'नव्यन्याय' के साहित्य में की जानी चाहिए।
दो प्रकार के 'प्रकरण' ग्रन्थ—
नव्य शैली में सभी शास्त्रों में कुछ इस प्रकार के ग्रन्थ पाए जाते हैं जो
उस-उस शास्त्र के केवल एक देश का प्रतिपादन करते हैं, अर्थात् शास्त्र के
सम्पूर्ण विषय का प्रतिपादन नहीं करते हैं। ऐसे ग्रन्थों को 'प्रकरण ग्रन्थ' कहा
जाता है। प्रकरण ग्रन्थ का लक्षण इस प्रकार किया गया है :—
शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम् ।
आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चितः२ ॥
तर्कभाषा में न्याय के मुख्य मुख्य पदार्थों का प्रतिपादन किया है उनके
समस्त विषयों का पूर्ण रूप से वर्णन नहीं किया गया है अतएव इसको न्याय
का 'प्रकरण ग्रन्थ' कहना ही उचित है। तर्कभाषा के अतिरिक्त अन्नंभट्ट का
'तर्कसंग्रह' विश्वनाथ की 'न्यायमुक्तावली' जगदीश तर्कालङ्कार का 'तर्कामृत',
लौगाक्षि भास्कर की 'तर्ककौमुदी' आदि अन्य अनेक प्रकरण ग्रन्थ भी न्याय
में लिखे गए हैं। इन प्रकरण ग्रन्थों में प्रायः न्याय और वैशेषिक दोनों दर्शनों
के पदार्थों का सम्मिलित रूप से वर्णन किया गया है। परन्तु उनमें से कुछ
ग्रन्थों में न्याय को प्रधान और वैशेषिक को गौण और दूसरों में वैशेषिक को
१ दर्शनमीमांसा, अ० १। २ पाराशर उपपुराण अ० २८, २१ ।

प्रधान आधार बना कर न्याय के पदार्थों का गौण रूप से विवेचन किया गया
है । न्याय में प्रमाणादि सोलह पदार्थों का वर्णन है और वैशेषिक में द्रव्यादि
छः पदार्थों का । न्यायप्रधान प्रकरण ग्रन्थों में न्याय के प्रमाणादि सोलह
पदार्थों का मुख्य रूप से प्रतिपादन किया गया है । उनमें से प्रमेय नामक
द्वितीय पदार्थ के अन्तर्गत 'अर्थ' नामक प्रमेय में वैशेषिक में प्रतिपादित
द्रव्यादि छः पदार्थों का अन्तर्भाव करके उनका वर्णन किया है । तर्कभाषा में
इसी पद्धति का अवलम्बन किया है । अतएव वह न्यायप्रधान प्रकरण ग्रन्थ
है । इसके विपरीत 'तर्कसंग्रह' 'न्यायमुक्तावली' आदि में वैशेषिक के द्रव्यादि
पदार्थों का मुख्य रूप से वर्णन किया गया है । और उसमें गुण नामक द्वितीय
पदार्थ के अन्तर्गत 'बुद्धि' नामक पदार्थ में न्याय के प्रमाणादि पदार्थों का
अन्तर्भाव करके वर्णन किया गया है । अतएव वह वैशेषिकप्रधान प्रकरण ग्रन्थ
है । हमने अपनी 'दर्शनमीमांसा' में इस विषय का प्रतिपादन इस प्रकार
किया है :—
“ग्रन्थाश्च प्रकरणाख्या नव्याः सन्ति तथाविधाः ।
न्यायकाणादयोस्तत्त्वं यत्रैकत्रैव वर्ण्यते ॥
क्वचित् पदार्था न्यायस्य, क्वचिद् वैशेषिकस्य च ।
वर्णिता मुख्यतस्तेषु तथान्तर्भाविताः परे ॥
षट्पदार्थान् कणादस्यैवान्तर्भाव्य प्रमेयके ।
न्यायस्यार्थान् समालम्ब्य वर्णनं चैषु दृश्यते ॥
वरदराजस्तार्किकरक्षां चक्रे तथाविधाम् ।
कृता केशवमिश्रेण तर्कभाषा च तद्विधा ॥
न्यायात् प्रमाणमादाय षट्पदार्थान् कणादतः ।
अन्नंभट्टेन संगृह्य रचितस्तर्कसंग्रहः ।
न्यायलीलावतीं चैव चकार वल्लभस्तथा ।
तर्कालङ्कारः कृतवान् जगदीशस्तर्कामृतम् ॥
अथ भाषापरिच्छेदं न्यायमुक्तावलीं तथा ।
न्यायपञ्चाननश्चक्रे विश्वनाथाभिधः सुधीः ॥
लौगक्षिभास्करेणाथ रचिता तर्ककौमुदी ।
प्रकरणग्रन्थश्रेण्यामस्यामायाति च ध्रुवम्” ॥

१ दर्शनमीमांसा अ० ३ ।

८ तर्कभाषा [ पदार्थोद्देशः
'प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्त-अवयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-
वितण्डा-हेत्वाभास-च्छल-जाति-निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः'¹
इति न्यायस्यादिमं सूत्रम् ।
अस्यार्थः । प्रमाणादिषोडशपदार्थानां तत्त्वज्ञानान्मोक्षप्राप्तिर्भवतीति ।
न च प्रमाणादीनां तत्त्वज्ञानं सम्यग्ज्ञानं तावद्भवति यावदेषामुद्देशलक्षण-
परीक्षा न क्रियन्ते । यदाह भाष्यकारः—
'त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिरुद्देशो लक्षणं परीक्षा चेति' ।²
उद्देशस्तु नाममात्रेण वस्तुसङ्कीर्त्तनम् । तच्चास्मिन्नेव सूत्रे कृतम् ।
लक्षणन्त्वसाधारणधर्मवचनम् । यथा गोः सास्नादिमत्त्वम् । लक्षितस्य
इस प्रकार प्रस्तुत तर्कभाषा नव्यन्याय का न्यायप्रधान प्रकरण ग्रन्थ है ।
अतएव ग्रन्थकार ने प्रमाण-प्रमेयादि न्याय के प्रथम सूत्र को उद्धृत करते हुए
अपने ग्रन्थ का प्रारम्भ इस प्रकार किया है :—
१ प्रमाण, २ प्रमेय, ३ संशय, ४ प्रयोजन, ५ दृष्टान्त, ६ सिद्धान्त,
७ अवयव, ८ तर्क, ९ निर्णय, १० वाद, ११ जल्प, १२ वितण्डा, १३ हेत्वाभास,
१४ छल, १५ जाति, १६ निग्रहस्थानोंके तत्त्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।
यह न्याय [ दर्शन ] का प्रथम सूत्र है ।
इसका अर्थ [ यह है ] प्रमाणादि सोलह पदार्थों के तत्त्वज्ञान से मोक्ष की
प्राप्ति होती है ।
और प्रमाणादि [ सोलह पदार्थों ] का तत्त्वज्ञान [ अर्थात् ] यथार्थज्ञान
तब तक नहीं हो सकता है जब तक इनके १ उद्देश, २ लक्षण और ३ परीक्षा
न किए जायें । जैसा कि [ न्याय दर्शन के ] भाष्यकार [ वात्स्यायन ] ने कहा
है [ कि ] इस [ न्याय ] शास्त्र की तीन प्रकार से प्रवृत्ति होती है । १ उद्देश,
२ लक्षण और ३ परीक्षा ।
उनमें से नाम मात्र से वस्तु का कथन उद्देश [ कहा जाता ] है । और वह
[ उद्देश ] इसी [ प्रमाणप्रमेयादिरूप प्रथम ] सूत्र में कर दिया है । २ असाधारण
धर्म का कथन लक्षण [ कहलाता ] है । जैसे गौ का 'सास्नादिमत्त्व' [ गाय के गले
के नीचे जो खाल लटकती रहती है उसको सास्ना या गलकम्बल कहते हैं । सास्ना
१ गौ० न्या० सू० १-१-१। २ न्या. सू. वा. भा. १-१-२

शास्त्रप्रवृत्तिभेदाः ] उपोद्धातः ६
लक्षणमुपपद्यते न वेति विचारः परीक्षा। तेनैते लक्षणपरीक्षे प्रमाणादीनां
तत्त्वज्ञानार्थे कर्त्तव्ये ।
गौ के अतिरिक्त अन्य किसी प्राणी के नहीं होती। अतएव यह गौ का असाधारण
धर्म या लक्षण है।] ३ जिसका लक्षण किया गया है वह उसका ठीक लक्षण
है या नहीं इस विचार का नाम परीक्षा है। इसलिए [ उद्देश के प्रथम सूत्र में
ही हो जाने के बाद अब शेष ग्रन्थ में ] प्रमाणादि के तत्त्वज्ञान के लिए
[ उनकी ] यह लक्षण और परीक्षा करनी चाहिए ।
शास्त्र-प्रवृत्ति के भेद—
यहाँ ग्रन्थकार ने 'त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिः—उद्देशो लक्षणं परीक्षा
चेति' इस वात्स्यायन भाष्य को उद्धृत करते हुए न्याय शास्त्र की त्रिविध प्रवृत्ति
का वर्णन किया है। इस त्रिविध प्रवृत्ति का प्रतिपादन सर्वप्रथम भाष्यकार
वात्स्यायन ने ही किया है। और वह मुख्यतः न्याय शास्त्र में ही लागू होता
है। अन्य सब शास्त्रों में लागू नहीं होता। न्याय के 'समान-तंत्र' कहलाने
वाले वैशेषिक में भी त्रिविध नहीं अपितु परीक्षा को छोड़ कर केवल उद्देश और
लक्षण रूप द्विविध प्रवृत्ति का ही वर्णन है। और कहीं कहीं अत्यन्त श्रद्धाप्रधान
[बौद्ध-जैनादिकों के धर्मसंग्रह आदि] ग्रन्थों में केवल उद्देश रूप एकविध प्रवृत्ति
भी पाई जाती है। द्विविध प्रवृत्ति का वर्णन करते हुए वैशेषिक दर्शन के
प्रशस्तपाद भाष्य पर 'कन्दली' टीका के लेखक श्रीधराचार्य लिखते हैं—
“अनुद्दिष्टेषु पदार्थेषु न तेषां लक्षणानि प्रवर्त्तन्ते निर्विषयत्वात् । अलक्षितेषु
च तत्त्वप्रतीत्यभावः कारणाभावात् । अतः पदार्थव्युत्पादनाय प्रवृत्तस्य शास्त्रस्यो-
भयथा प्रवृत्तिः । उद्देशो लक्षणं च । परीक्षायास्तु न नियमः ।
यत्राभिहिते लक्षणे प्रवादान्तरव्याक्षेपात् तत्त्वनिश्चयो न भवति तत्र परप-
क्षव्युदासार्थं परीक्षाविधिरधिक्रियते । यत्र तु लक्षणाभिधानसामर्थ्यादेव तत्त्व-
निश्चयः स्यात् तत्रायं व्यर्थो नार्थ्यते । योऽपि त्रिविधां शास्त्रस्य प्रवृत्तिमित्छति
तस्यापि प्रयोजनादीनां नास्ति परीक्षा । तत् कस्य हेतोर्लक्षणमात्रादेव ते प्रती-
यन्त इति । एवं चेदर्थप्रतीत्यनुरोधात् शास्त्रस्य प्रवृत्तिर्न त्रिविधैव । नामधेयेन
पदार्थानामभिधानमुद्देशः । उद्दिष्टस्य स्वपरजातीयव्यावर्त्तको धर्मो लक्षणम् ।
लक्षितस्य यथालक्षणं विचारः परीक्षा'” ।
१ 'न्यायकन्दली' पृष्ठ २६ ।

१० तर्कभाषा [ विभागान्तर्भावः
इसका अभिप्राय यह है कि, "पदार्थों का उद्देश [ नाममात्र से कथन ]
न करने पर उनके लक्षण नहीं हो सकते हैं क्योंकि लक्षण का कोई विषय
उपस्थित नहीं है जिसका लक्षण किया जाय । [ अतएव उद्देश करना
आवश्यक है ] यदि पदार्थों के लक्षण न किए जायँ तो [ तत्त्वज्ञान का ] कारण
न होने से तत्त्वज्ञान नहीं होगा । इस लिए पदार्थ बोधन के लिए प्रवृत्त शास्त्र
के उद्देश और लक्षण रूप दोनों प्रकार की प्रवृत्ति आवश्यक है । परन्तु परीक्षा
का कोई नियम नहीं है ।"
“जहाँ लक्षण कर देने पर भी दूसरे मतों के आक्षेप के कारण तत्त्वनिर्णय
नहीं हो पाता है वहाँ परपक्ष के खण्डन के लिये परीक्षा विधि का अवलम्बन
किया जाता है । और जहाँ लक्षण कथन मात्र से ही तत्त्व का निश्चय हो जाता
है वहाँ परीक्षा विधि के व्यर्थ होने से उसका अवलम्बन नहीं किया जाता ।
और जो [भाष्यकार वात्स्यायन] त्रिविध शास्त्र-प्रवृत्ति मानते हैं उनके यहां भी
प्रयोजन आदि की परीक्षा नहीं की गई है । यह क्यों है ? इसलिए कि लक्षणमात्र
से ही उनकी प्रतीति हो जाती है । जब ऐसा है तब अर्थ की प्रतीति के
अनुसार प्रवृत्ति होती है न कि तीन ही प्रकार की यह कहना चाहिए" ।
इस प्रकार न्याय के भाष्यकार वात्स्यायन ने त्रिविध प्रवृत्ति का प्रतिपादन
किया है और वैशेषिक दर्शन के टीकाकार श्रीधराचार्य ने द्विविध प्रवृत्ति का
वर्णन किया है । इसका कारण यह है कि न्याय दर्शन के अधिकांश विषयों
के विवेचन में सूत्रकार ने ही परीक्षा विधि का भी अवलम्बन किया है ।
प्रयोजन आदि के वर्णन में यद्यपि परीक्षा विधि का प्रयोग न्यायसूत्रों में नहीं
मिलता है फिर भी अधिकांश भाग में परीक्षा भी पाई जाती है इसलिए न्याय
के भाष्यकार ने सामान्य रूप से त्रिविध प्रवृत्ति का वर्णन किया है । इसके
विपरीत वैशेषिक दर्शन में सूत्रकार ने परीक्षा विधि का अवलम्बन नहीं किया
है । केवल उद्देश और लक्षण ही अधिकतर किए गए हैं । अतएव वैशेषिक
दर्शन के टीकाकार श्रीधराचार्य ने परीक्षा को छोड़ कर केवल द्विविध शास्त्र
प्रवृत्ति का वर्णन किया है ।
विभाग—
न्याय की इस त्रिविध प्रवृत्ति के अतिरिक्त 'न्यायवार्तिककार' श्री उद्योत-
कराचार्य तथा 'न्यायमञ्जरीकार' जयन्त भट्ट ने शास्त्र-प्रवृत्ति के चतुर्थ प्रकार
'विभाग' का प्रश्न उठाकर और अन्त में उसका उद्देश में ही समावेश दिखा कर
त्रिविध प्रवृत्ति का ही समर्थन किया है । उन्होंने लिखा है :—

लक्षणलक्षणम् ] उपोद्घातः ११
'त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिरित्युक्तम्। उद्दिष्टविभागश्च न त्रिविधायां
शास्त्रप्रवृत्तावन्तर्भवति। तस्मादुद्दिष्टविभागो युक्तः। न; उद्दिष्टविभागस्योद्देश
एवान्तर्भावात् । कस्मात् ? लक्षणसामान्यात् । समानं लक्षणं नामधेयेन
पदार्थाभिधानमुद्देश इति'१।
अर्थात् शास्त्र की त्रिविध प्रवृत्ति होती है यह कहा गया है परन्तु उस
त्रिविध प्रवृत्ति में उद्दिष्ट के 'विभाग' का अन्तर्भाव नहीं होता है इसलिए उद्दिष्ट
के 'विभाग' को भी चौथा प्रकार मानना उचित है। [ यह प्रश्न है इसका
उत्तर करते हैं ] नहीं, उद्दिष्ट के विभाग का अन्तर्भाव उद्देश में ही हो जाता
है। क्योंकि दोनों का लक्षण समान है। नाममात्र से पदार्थों के कथन को ही
उद्देश कहते हैं और 'विभाग' में विभक्त पदार्थों के नाममात्र का कथन ही
होता है अतः विभाग का अन्तर्भाव उद्देश में ही हो सकता है। अतः उसके
अलग परिगणन की आवश्यकता नहीं है।
लक्षण का लक्षण--
इन तीनों विभागों में से उद्देश और परीक्षा का लक्षण सीधा है। और जो
यहां ग्रन्थकार ने दिया है वही 'वात्स्यायन भाष्य' और 'न्यायकन्दली' आदि
अन्य ग्रन्थों में भी दिया है। परन्तु 'लक्षण' का 'लक्षण' थोड़ा समझने योग्य
है। यहाँ तर्कभाषाकार ने 'लक्षणन्त्वसाधारणधर्मवचनम्' । अर्थात् असाधारण
धर्म को लक्षण कहते हैं। जैसे गौ का लक्षण सास्नादिमत्त्व है। यह लक्षण
की व्याख्या की है। असाधारण धर्म या विशेष धर्म वह कहलाता है जो केवल
लक्ष्य [ जैसे गौ ] में रहे। जो धर्म लक्ष्य से भिन्न अलक्ष्य महिष आदि में भी
पाया जाय वह लक्षण नहीं कहलाता है क्योंकि उसमें 'अतिव्याप्ति' दोष होता
है। 'अलक्ष्यवृत्तित्वमतिव्याप्तिः' जो धर्म अलक्ष्य अर्थात् लक्ष्य से भिन्न में
रहे वह 'अतिव्याप्ति' दोषग्रस्त होने से लक्षण नहीं होता। जैसे शृङ्गित्त्व सींग
होनेको गौ का लक्षण नहीं कहा जा सकता है क्योंकि लक्ष्य गौ से भिन्न अर्थात्
अलक्ष्य महिषादि में भी शृङ्गित्त्व धर्म पाया जाता है। अर्थात् सींग भैंस आदि
के भी होते हैं, इसलिए 'शृङ्गित्त्व' गौ का लक्षण नहीं है।
इसी प्रकार 'लक्ष्यैकदेशावृत्तित्वमव्याप्तिः' जो धर्म लक्ष्य के एक अंश में
न पाया जाय वह 'अव्याप्ति' दोष ग्रस्त होने से लक्षण नहीं कहा जाता। जैसे
१ न्या० वा० १, १, ३, । न्यायमञ्जरी पृ० १२ ।

१२ तर्कभाषा [ लक्षणप्रयोजनम्
'शाबलेयत्व' अर्थात् चितकबरापन गाय का लक्षण नहीं हो सकता है। क्योंकि
लक्ष्य-गौ-के एक बहुत बड़े भाग में अर्थात् बहुत सी गौओं में यह 'शाबलेयत्व'
या चितकबरापन नहीं पाया जाता है। अतएव यह 'शाबलेयत्व' धर्म 'अव्याप्ति'
दोषग्रस्त होने से गौ का लक्षण नहीं हो सकता है।
तीसरा दोष असम्भव है। 'लक्ष्यमात्रावृत्तित्वमसम्भवः' अर्थात् जो धर्म
लक्ष्यमात्र में न पाया जाय वह असम्भव दोष कहलाता है। जैसे 'एकशफत्व'
असम्भवदोषग्रस्त होने से गौ का लक्षण नहीं हो सकता है। गौ द्विशफ प्राणी
है अर्थात् उसके खुर बीच से चिरे हुए होने से दो शफ (खुर) होते हैं। ऊंट
का पूरा खुर एक होता है जिससे उसे रेत में चलने में सहायता मिलती है।
इसलिए ऊंट एकशफ एक खुर वाला प्राणी है। परन्तु गौ एकशफ नहीं अपितु
द्विशफ प्राणी है। अतएव यदि कोई एकशफत्व को गौ का लक्षण बनाना चाहे
तो यह लक्षण एक भी गौ में नहीं मिलेगा। लक्ष्यमात्र-सारी गौओं-में अविद्य-
मान होगा। अतएव वह गौ का लक्षण नहीं हो सकता। इस प्रकार १
'अतिव्याप्ति' [ अलक्ष्यवृत्तित्वमतिव्याप्तिः ] २ अव्याप्ति [ लक्ष्यैकदेशावृत्तित्वम-
व्याप्तिः ] और ३ असम्भव [ लक्ष्यमात्रावृत्तित्वमसम्भवः ] इन तीनों दोषों से
रहित धर्म ही लक्षण होता है। ऐसे धर्म को ही असाधारण धर्म या 'लक्ष्यता-
वच्छेदकसमनियत' धर्म भी कहते हैं। इसलिए 'अतिव्याप्त्यादिदोषत्रयरहितो
धर्मो लक्षणम्' या 'लक्ष्यतावच्छेदकसमनियतो धर्मो लक्षणम् ।' अथवा 'असा-
धारणधर्मवचनम् लक्षणम्' यह तीनों ही 'लक्षण' के 'लक्षण' हो सकते हैं।
लक्षण का प्रयोजन--
लक्षण के दो प्रयोजन माने गए हैं एक व्यावृत्ति अर्थात् सजातीय या
विजातीय अन्य पदार्थों से भेद करना और दूसरा व्यवहार को प्रवृत्त करना ।
'व्यावृत्तिर्व्यवहारो वा लक्षणस्य प्रयोजनम्' । गौ का लक्षण करने का अभिप्राय
उसके समानजातीय महिषादि चतुष्पद और उसके असमानजातीय चतुष्पद
भिन्न प्राणी, तथा अचेतन पदार्थों से उसको भिन्न करना ही होता है। इसीको
'समानासमानजातीयव्यवच्छेदो हि लक्षणार्थः' कह कर लक्षणका प्रयोजन बताया
है। यही धर्म या लक्षण गौ व्यवहार का प्रवर्तक होता है। इसलिये व्यवहार
भी लक्षण का प्रयोजन है। इस प्रकार लक्षण के द्विविध प्रयोजन माने गए हैं।
प्रमाणलक्षण--
प्रथम सूत्र में न्याय शास्त्र के प्रतिपाद्य प्रमाणादि षोडश पदार्थों का

प्रमाणलक्षणम् ] प्रमाणनिरूपणम् १३
१-प्रमाणानि
प्रमाणम्
तत्रापि प्रथममुद्दिष्टस्य प्रमाणस्य तावल्लक्षणमुच्यते। प्रमाकरणं
प्रमाणम्। अत्र च प्रमाणं लक्ष्यं, प्रमाकरणं लक्षणम्।
ननु प्रमायाः करणं चेत् प्रमाणं तर्हि तस्य फलं वक्तव्यम्, करणस्य
फलवत्त्वनियमात्। सत्यम्। प्रमैव फलं, साध्यमित्यर्थः। यथा
छिदाकरणस्य परशोश्छिदैव फलम्।
उद्देश अर्थात् नाममात्र से परिगणन कर दिया गया है। अब शेष ग्रन्थ में
उनके लक्षण और परीक्षा करनी हैं। उद्देश सूत्र में सबसे पहिले प्रमाण को
रखा है अतएव उसी क्रम से सबसे पहिले प्रमाण का लक्षण करते हैं। यद्यपि
न्यायसूत्रकार ने प्रमाण सामान्य का लक्षणसूचक कोई सूत्र नहीं लिखा है
परन्तु उनके भाष्यकार वात्स्यायन ने—'प्रमाण शब्द का निर्वचन ही उसका
लक्षण है अतएव सूत्रकार को उसका अलग लक्षण करने आवश्यकता नहीं
है'। इस प्रकार का भाव व्यक्त करते हुए लिखा है—
'उपलब्धिसाधनानि प्रमाणानीति समाख्यानिर्वचनसामर्थ्याद्बोद्धव्यम् ।
प्रमीयते अनेन इति करणार्थाभिधानो हि प्रमाणशब्दः'१ ।
इसका अभिप्राय यह है कि प्र उपसर्ग पूर्वक मा धातु से करण में ल्युट्
प्रत्यय करने से प्रमाण शब्द सिद्ध होता है अतएव प्रमा का करण अर्थात् साधन
प्रमाण कहलाता है। यह प्रमाण का सामान्य लक्षण प्रमाण पद के निर्वचन से
ही निकल आता है। अतएव उपलब्धि अर्थात् ज्ञान अथवा प्रमा के साधन
अर्थात् करण को प्रमाण कहते हैं। यह प्रमाण का सामान्य लक्षण हुआ। इसी
भाष्य के आधार पर तर्कभाषाकार प्रमाण लक्षण का सामान्य लक्षण करते हैं—
उन [ षोडश पदार्थों ] में भी प्रथम उद्दिष्ट [ सबसे पहिले कहे हुए ] प्रमाण
का लक्षण सबसे पहिले कहते हैं। प्रमा का करण प्रमाण है। इस [ लक्षण ]
में प्रमाण यह [ पद ] लक्ष्य [ पद, अर्थात् जिसका लक्षण करना है वह ] है
और प्रमा का करण यह लक्षण [ अंश ] है।
[ प्रश्न ] अच्छा यदि प्रमा का करण [ अर्थात् साधन ] प्रमाण है तो उस
[ साधन रूप प्रमाण ] का फल बतलाना चाहिये [ क्योंकि ] करण [ अर्थात्
साधन ] का फल होना आवश्यक है।
१ न्याय भाष्य १, १, ३।

१४ तर्कभाषा [ प्रमालक्षणम्
प्रमा
का पुनः प्रमा, यस्याः करणं प्रमाणम् ।
उच्यते । यथार्थानुभवः प्रमा । यथार्थ इत्ययथार्थानां संशय-विपर्यय-
तर्कज्ञानानां निरासः । अनुभव इति स्मृतेर्निरासः ।
ज्ञातविषयं ज्ञानं स्मृतिः । अनुभवो नाम स्मृतिव्यतिरिक्तं ज्ञानम् ।
[ उत्तर ] ठीक है [ अर्थात् करण का फल अवश्य होता है । इसलिये ]
प्रमा ही [ प्रमाणरूप करण या साधन का ] फल अर्थात् साध्य है । [ जिसका
साधन होता है वही उसका फल होता है .प्रमा का करण या साधन प्रमाण है
तो उसका फल प्रमा ही होगी ] जैसे छेदन [ काटने ] के करण फरसे का फल
छेदन ही होता है । [ इसी प्रकार यहां प्रमा के करण अर्थात् प्रमाण का फल
प्रमा ही समझना चाहिए ]
इस प्रकार प्रमाण का सामान्य लक्षण हुआ । परन्तु इस लक्षण में प्रमा
और करण दो शब्द आए जब तक उनकी व्याख्या न हो तब तक यह लक्षण
स्पष्ट नहीं होता । अतएव आगे प्रमा का लक्षण करते हैं ।
[ प्रश्न ] फिर प्रमा क्या है जिसका करण प्रमाण [ कहा जाता ] है ।
[ उत्तर ] कहते हैं । यथार्थ अनुभव [ का नाम ] प्रमा है । यथार्थ पद से
अयथार्थ [ ज्ञान रूप ] संशय, विपर्यय, और तर्क ज्ञान का निराकरण किया
[ जिससे संशय-विपर्यय और तर्क ज्ञान में प्रमा का लक्षण न चला जाय ] ।
अनुभव इस [ पद ] से स्मृति का निराकरण किया [ अर्थात् अनुभव पद इस
लिए रखा कि स्मृति में प्रमा का लक्षण अतिव्याप्त न हो जाय ] ।
[ ज्ञान के दो भेद हैं एक अनुभव और दूसरा स्मृति । उनमें से ] ज्ञात
विषयक ज्ञान को स्मृति कहते हैं और स्मृति से भिन्न ज्ञान को अनुभव कहते हैं ।
पदकृत्य—
'प्रमाकरणं प्रमाणम्' यह प्रमाण का सामान्य लक्षण किया था । उसके
स्पष्टीकरण के लिए 'प्रमा' का लक्षण करना आवश्यक है अतएव 'यथार्थानुभवः
प्रमा' यह 'प्रमा' का लक्षण किया है । इस लक्षण में भी 'प्रमा' यह पद लक्ष्य
अंश है और 'यथार्थानुभवः' इतना लक्षण अंश है । लक्षण अंश में यथार्थ
और अनुभव इन दो पदों का समावेश है । लक्षण में ये दोनों पद विशेष
अभिप्राय से रखे गए हैं । ऊपर अतिव्याप्ति आदि लक्षण के दोषों का वर्णन
किया है । इन पदों के रखने का प्रयोजन अतिव्याप्ति दोष का निराकरण करना

अप्रमालक्षणम् ] प्रमाणनिरूपणम् १५
ही है। किस पद के रखने का क्या प्रयोजन है इसके जानने का सीधा मार्ग
यह है कि उस पद को लक्षण से हटा दिया जाय और तब उसका क्या प्रभाव
होता है इसको देखा जाय तब उस पद के रखने की उपयोगिता प्रतीत हो
जायेगी। जैसे यहाँ यदि यथार्थ पद को हटा दिया जाय तो 'अनुभवः प्रमा'
केवल इतना लक्षण रह जाता है। इस लक्षण के होने पर शुक्ति को रजत रूप
में ग्रहण करने वाला 'भ्रम' या 'विपर्यय' ज्ञान भी अनुभव रूप होने से 'प्रमा'
कहलाने लगेगा। अथवा अँधेरे में किसी ऊँचे से पेड़ के ठूंठ को खड़ा देख
कर 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' यह 'संशयात्मक' ज्ञान भी अनुभव रूप होने से 'प्रमा'
कहलाने लगेगा। इसी प्रकार तर्क ज्ञान में भी प्रमा का लक्षण चला जायगा।
परन्तु संशय, विपर्यय और तर्क ज्ञान यथार्थ ज्ञान नहीं है। उनको 'प्रमा'
नहीं कहा जाता है। यदि 'अनुभवः प्रमा' इस लक्षण के साथ 'यथार्थ' पद
जोड़ दिया जाय तो 'अयथार्थ' ज्ञान रूप 'संशय' 'विपर्यय' और 'तर्क' ज्ञान
में प्रमा के लक्षण की अतिव्याप्ति के निराकरण के लिए 'यथार्थ' पद का सन्नि-
वेश 'प्रमा' के लक्षणों में किया गया है।
इसी प्रकार स्मृति को भी प्रमा नहीं मानते हैं। अतएव स्मृति में प्रमा
के लक्षण की अतिव्याप्ति के निवारण के लिए अनुभव पद का निवेश इस
लक्षण में किया गया है। लक्षणों में आए हुए पदों के इस प्रकार प्रयोजन-
प्रदर्शन को 'पदकृत्य' कहते हैं। और इस प्रकार 'पदकृत्य' अर्थात् प्रत्येक पद
के रखे जाने के प्रयोजन बताते हुए की गई व्याख्या को सपदकृत्य व्याख्या
कहते हैं, 'सपदकृत्यं व्याख्यायताम्' कहने से इसी प्रकार पदकृत्य-सहित
व्याख्या कराना ही अभिप्रेत होता है।
अप्रमा लक्षण—
जो पदार्थ जैसा है उसको उसी रूप में ग्रहण करना यथार्थ ज्ञान अथवा
'प्रमा' कहलाता है। उससे भिन्न रूप में ग्रहण करना अयथार्थ ज्ञान या
अप्रमा कहलाता है। इस अयथार्थ ज्ञानके संशय, विपर्यय और तर्कज्ञान ये तीन
भेद यहाँ प्रदर्शित किए हैं। योगदर्शनमें 'विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्'१
अर्थात् अतद्रूप में प्रतिष्ठित मिथ्या ज्ञान को विपर्यय कहते हैं यह विपर्यय
का लक्षण किया है। जैसे शुक्ति को पड़ी देखकर कभी-कभी उसके 'चाकचिक्य'
अर्थात् चमक आदि के कारण उसको रजत समझ लिया जाता है। ऐसी दशा में
१. योग, १,८

१६ तर्कभाषा [ तर्कस्याप्रमात्वम्
में शुक्ति में जो रजत का ज्ञान होता है वह अतद्रूप अर्थात् अरजत रूप शुक्ति
में प्रतिष्ठित होता है। अतएव अतद्रूप में प्रतिष्ठित होने के कारण उसको
मिथ्या ज्ञान अथवा विपर्यय कहते हैं और वह अयथार्थ ज्ञान होता है।
नैयायिकों ने इसी अतद्रूपप्रतिष्ठ अर्थ का बोधन करने के लिये ‘तद्भाववति
तत्प्रकारकं ज्ञानमप्रमा’ कहा है। जिसका अर्थ यह है कि ‘तदभाववति अर्थात्
रजतत्वाभाववति’ जिसमें रजतत्व का अभाव हो उस शुक्ति आदि में तत्प्रकारक
अर्थात् रजतत्वविशेषणक ज्ञान को अप्रमा कहते हैं। ‘तत्प्रकारकम्’ में प्रकार शब्द
का अर्थ विशेषण होता है। ‘तद्भाववति अर्थात् रजतत्वाभाववति शुक्तिकादौ’
रजतत्व से रहित शुक्तिका आदि में ‘तत्प्रकारकम्’ अर्थात् रजतत्वप्रकारकम्’
जिसमें रजतत्व विशेषण रूप से प्रतीत हो अर्थात् ‘इदं रजतम्’ यह ज्ञान
मिथ्या ज्ञान, विपर्यय, अप्रमा या भ्रम कहा जाता है।
संशय और तर्क का अप्रमात्व—
इस विपर्यय के अतिरिक्त संशय और तर्क ज्ञान को भी ग्रन्थकार ने
अयथार्थ ज्ञान कहा है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक पदार्थ का एक निश्चित
स्वरूप होता है। उस निश्चित रूप से जो उस पदार्थ का ग्रहण है वह तो उस
का यथार्थ ज्ञान ‘तद्वति तत्प्रकारकं ज्ञानं यथार्थोऽनुभवः’ है। परन्तु संशय में
पदार्थ का निश्चयात्मक रूप से ग्रहण नहीं होता है। अतएव अनिश्चयात्मक
संशय ज्ञान भी ‘तदभाववति तत्प्रकारकम्’ होने से अयथार्थ ज्ञान ही है।
तर्कज्ञान को भी ग्रन्थकार ने अयथार्थ ज्ञान के अन्तर्गत माना है। इसका
कारण यह है कि तर्क भी निश्चय से पूर्व की अनिश्चयावस्था का नाम है।
तर्क का लक्षण न्याय सूत्र में ‘अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थ-
मूहस्तर्कः’" १ ।
इस प्रकार किया गया है। इसके भाष्य में भाष्यकार ने लिखा है कि—
‘कथं पुनरयं तत्त्वज्ञानार्थः, न तत्त्वज्ञानमेवेति । अनवधारणात् । अनुजाना-
त्ययमेकतरं धर्मं कारणोपपत्त्या न त्ववधारयति, न व्यवस्यति, न निश्चिनोति
एवमेवेदमिति’ २,
अर्थात् तर्क केवल एक पक्ष का समर्थन मात्र करता है उसका निश्चय नहीं
करता है कि यह पदार्थ ऐसा ही है। अतएव अनवधारणात्मक या अनिश्चयात्मक
१ न्याय सूत्र १, १, ४० । २ वात्स्यायन भाष्य १, १, ४० ।

ज्ञानभेदाः ] प्रमाणनिरूपणम् १७
होने से तर्क को यथार्थ ज्ञान नहीं कह सकते हैं। हाँ उससे तत्त्वज्ञान में
सहायता मिलती है इसलिए सूत्रकार ने तर्क को ‘तत्त्वज्ञानार्थः’ तत्त्वज्ञान के
लिए ऐसा कहा है तत्त्वज्ञान ही नहीं कहा है। इस प्रकार भाष्यकार के
अनुसार तर्क भी अनवधारणात्मक, अनिश्चयात्मक ज्ञान है अतएव वह यथार्थ
ज्ञान के अन्तर्गत नहीं है। संशय और तर्क दोनों ज्ञान अनवधारणात्मक हैं
परन्तु संशय अनुमान का प्रवर्तक होने से परम्परया और तर्क तत्त्वज्ञान में
साक्षादुपयोगी है इसलिए संशय और तर्क एक नहीं हैं। इस प्रकार प्रमा का
लक्षण करते समय संशय विपर्यय और तर्क ज्ञान में प्रमा लक्षण की अतिव्याप्ति
वारण के लिए लक्षण में यथार्थ पद का निवेश किया गया है।
ज्ञान के भेद—
ज्ञान के भी 'अनुभव' तथा 'स्मृति' भेद से दो भेद माने गये हैं। उनमें
से ज्ञात विषयक ज्ञान को 'स्मृति' कहते हैं, और उससे भिन्न अर्थात् अज्ञात
विषयक ज्ञान को 'अनुभव' कहते हैं। ज्ञात विषयक ज्ञान भी दो प्रकार का होता
है जिनमें एक को 'स्मृति' और दूसरे को 'प्रत्यभिज्ञा' कहते हैं। किसी वस्तु को
जब हम देखते या किसी प्रकार से जानते हैं तब उस ज्ञान से हमारे आत्मा में एक
संस्कार उत्पन्न हो जाता है। वस्तु का ज्ञान तो स्थिर नहीं रहता है परन्तु वह
'संस्कार' बराबर बना रहता है। और कालान्तर में जब किसी कारण से वह
संस्कार उद्बुद्ध हो जाता है तब बिना बाह्य इन्द्रिय आदि की सहायता के उस
पदार्थ का पुनः ज्ञान होने लगता है। इसी ज्ञान को 'स्मृति' कहते हैं। स्मृति
सदा 'ज्ञात विषय' की ही होती है। इसलिए ‘ज्ञातविषयं ज्ञानं स्मृतिः’ यह स्मृति
का लक्षण है। स्मृति का कारण सदा संस्कार का उद्बोध ही होता है इसलिए
'संस्कारजन्यं ज्ञानं स्मृतिः' यह भी स्मृति का दूसरा लक्षण हो सकता है। स्मृति
को पैदा करने वाले संस्कार के उद्बोधक सादृश्यादि हैं। यथा ‘सादृश्यादृष्टचिन्ताद्याः
स्मृतिबीजस्य बोधकः’१। सादृश्य, अदृष्ट और चिन्ता आदि स्मृति के बीज
अर्थात् संस्कार के उद्बोधक हैं। जिस पदार्थ को हम पहिले देख चुके हैं उनके
सदृश पदार्थ को देखने पर उसकी स्मृति हो आती है कि ऐसा पदार्थ या व्यक्ति
हमने वहाँ देखा था। यहाँ सादृश्य संस्कार का उद्बोधक होता है। कभी किसी
बात को भूल जाने पर सोचने से उसका स्मरण हो आता है यहाँ चिन्ता या
सोचना संस्कार का उद्बोधक और स्मृति का जनक है। और कभी अदृष्ट वश
१ तर्कभाषा संस्कार प्रकरण।
२ त० भा०

१८ तर्कभाषा [ स्मृतप्रत्यभिज्ञे
विना सादृश्यदर्शन या चिन्ता के भी संस्कार का उद्बोध और स्मृति की उत्पत्ति
हो जाती है। जैसा कि महाकवि और प्रकाण्ड दार्शनिक श्रीहर्ष ने लिखा है—
'अदृष्टमप्यर्थमहदृवैभवात्करोति सुसिर्जनदर्शनातिथिम्” १ ।
स्मृति और प्रत्यभिज्ञा—
ज्ञान का एक भेद और भी है जिसको 'प्रत्यभिज्ञा' कहते हैं। प्रत्यभिज्ञा
का लक्षण 'तत्तेदन्तावगाहिनी प्रतीतिः प्रत्यभिज्ञा' यह किया गया है। अर्थात्
'तत्ता, और 'इदन्ता' दोनों को अवगाहन करने वाली प्रतीति 'प्रत्यभिज्ञा'
कहलाती है। तत्ता का अर्थ तद्देश और तत्काल सम्बन्ध अर्थात् पूर्वदेश और
पूर्वकाल सम्बन्ध है। और 'इदन्ता' का अर्थ एतद्देश और एतत्कालसम्बन्ध है।
जिसमें पूर्वदेश पूर्वकाल और वर्तमान देश वर्तमान काल दोनों की प्रतीति हो
उस प्रतीति को प्रत्यभिज्ञा कहते हैं। जैसे 'सोऽयं देवदत्तः' यह प्रत्यभिज्ञा का
उदाहरण है। यह वही देवदत्त है जिसे हमने काशी में देखा था। इसमें 'सः'
पद 'तत्ता' अर्थात् पूर्वदेश पूर्वकाल सम्बन्ध का द्योतक और 'अय' पद 'इदन्ता'
अर्थात् एतद्देश एतत्काल सम्बन्ध अर्थात् वर्तमान देश और काल के सम्बन्ध
का बोधक है अर्थात् '

करणलक्षणम् ] प्रमाणनिरूपणम् १६
करणम्
किं पुनः करणम् ? साधकतमं करणम् । अतिशयितं साधकं साधकतमं
प्रकृष्टं कारणमित्यर्थः ।
कारणम्
ननु साधकं कारणमिति पर्यायस्तदेव न ज्ञायते किन्तत्कारणमिति ।
उच्यते । यस्य कार्यात् पूर्वभावो नियतोऽनन्यथासिद्धश्च तत्कारणम् ।
यथा तन्तुवेमादिकं पटस्य कारणम् ।
हैं । और इस यथार्थ अनुभव के 'करण' को 'प्रमाण' कहते हैं । इस, यथार्थानु-
भवरूप प्रमा की उत्पत्ति ही प्रमाणरूप करण का साध्य या फल है । यह
बात यहाँ तक कही । प्रमाण के 'प्रमा करणम् प्रमाणं' इस लक्षण में 'प्रमा'
पद आया है उसकी व्याख्या यहाँ तक हो गई, अब लक्षण का दूसरा पद
'करण' रह जाता है । इसलिये आगे 'करण' और उसके प्रसङ्ग से 'कारण'
की व्याख्या करते हैं ।
[ प्रश्न ] फिर करण किसको कहते हैं ?
[ उत्तर ] साधकतम को करण कहते हैं । अतिशयित साधक अर्थात्
सर्वोत्कृष्ट कारण [ साधकतम होने से करण कहलाता है । ]
[ प्रश्न ] साधक और कारण तो पर्याय वाचक हैं । यही नहीं मालूम है
कि वह कारण क्या है । [ अर्थात् कारण किसको कहते हैं यही जब तक न
मालूम हो तब तक साधकतम अर्थात् प्रकृष्ट कारणरूप करण का ज्ञान नहीं हो
सकता है । अतएव कारण का लक्षण बतलाने की आवश्यकता है । ]
[ उत्तर ] बताते हैं । जिसकी कार्य [ अर्थात् उत्पन्न होने वाले घटादि
पदार्थ ] से पहिले सत्ता निश्चित हो और जो अन्यथासिद्ध न हो उसको कारण
कहते हैं । जैसे तन्तु और वेमा [ अर्थात् कपड़ा बुनने का साधनरूप दण्ड
विशेष ] आदि पट के कारण हैं ।
यह कारण का सामान्य लक्षण किया । इस कारण के लक्षण में 'नियत:'
और 'अनन्यथासिद्धश्च' ये दो विशेषण पद विशेष महत्त्व के हैं । इनको इस
लक्षण में रखने का क्या प्रयोजन है इसके जानने का प्रकार यह है कि उनमें
से एक एक पद को हटा देने से क्या हानि होती है यह देखा जाय । इस प्रकार
के विचार को 'पदकृत्य' कहते हैं । कारण के 'यस्य कार्यात् पूर्वभावो नियतः'
इस लक्षण में यदि 'नियत:' पद न रखा जाय और 'यस्य कार्यात् पूर्वभावः'

१० तर्कभाषा [ कारणलक्षणम्
यद्यपि पटोत्पत्तौ दैवादागतस्य रासभादेः पूर्वभावो विद्यते, तथापि
नासौ नियतः।

केवल इतना लक्षण रखा जाय तो कुम्हार जब घड़ा बनाता है उस समय जो
वस्तुएँ उपस्थित हों वे सभी घट के प्रति कारण कहलाने लगेंगी। जैसे यदि
कोई देखने वाला पुरुष अथवा गर्दभ आदि कोई अन्य प्राणी वहाँ उपस्थित हो
गया है तो घटोत्पत्ति के पूर्व उसकी भी सत्ता होने से उसमें कारण का लक्षण
चला जायगा। अतएव उसके वारण करने के लिए 'नियत:' पद रखा है।
दैवात् आये हुए रासभ [ गदहा ] आदि की पूर्वसत्ता तो है परन्तु वह नियत
नहीं है। अर्थात् जब जब घड़ा बने तब तब रासभ आदि अवश्य उपस्थित
हों यह आवश्यक नहीं है। इसलिए रासभ आदि में कारण का लक्षण नहीं
जायगा। और तन्तु वेमा आदि का पूर्व भाव नियत है अर्थात् जब पट की
उत्पत्ति होगी उसके पूर्व तन्तु वेमादिक की उपस्थिति अवश्य होगी। इसलिए
नियत पूर्व भावी होने से तन्तु वेमादिक पट के कारण कहलाते हैं। परन्तु
रासभादि 'पूर्व भावी' होते हुए भी 'नियत पूर्वभावी' न होने से कारण नहीं
कहलाते हैं। यही बात आगे कहते हैं।

यद्यपि पट की उत्पत्ति [ के समय ] में दैवात् आए हुए रासभ [ गदहा ]
आदि का पूर्वभाव [ हो सकता ] है, फिर भी वह निश्चित् नहीं है। [ अर्थात्
जब जब कपड़ा बने तब तब रासभ की उपस्थिति अवश्य हो यह बात अनिवार्य
नहीं है। इसलिए रासभादि में कारण का लक्षण अतिव्याप्त नहीं होता ]

तन्तु तो पट का कारण है ही। तब जहाँ तन्तु रहेगा वहाँ उसका रूप
भी रहेगा। इसलिए जैसे तन्तु पट के प्रति कारण है। इसी प्रकार नियत
पूर्व भावी होने से तन्तुरूप भी पट के प्रति कारण हो सकता है, यह शङ्का
उत्पन्न होती है। उसका समाधान यह किया है कि तन्तुरूप पट के प्रति नहीं
अपितु पट के रूप के प्रति कारण है, पट के प्रति तो वह 'अन्यथासिद्ध' होने से
कारण नहीं है। क्योंकि कारण के लक्षण में 'अनन्यथासिद्ध' विशेषण भी रखा
गया है। उसका अभिप्राय यह है कि जो नियत पूर्वभावी होने पर 'अन्य-
थासिद्ध' न हो उसको कारण कहते हैं। तन्तुरूप पटरूप के प्रति, तो कारण
है परन्तु पट के प्रति कारण नहीं है। क्योंकि पटरूप के उत्पादन में ही तन्तु
रूप का उपयोग समाप्त हो जाता है। अतः पट के प्रति वह 'अन्यथासिद्ध'
होने से कारण नहीं है। यही आगे कहते हैं—

अनुमान प्रमाण, व्याप्ति, उपमान एवं शब्द प्रमाण निरूपण

कारणलक्षणम् ] प्रमाणनिरूपणम् २१
तन्तुरूपस्य तु नियतः पूर्वभावोऽस्त्येव किन्त्वन्यथासिद्धः पटरूपज-
ननोपक्षीणत्वात्, पटं प्रत्यपि कारणत्वे कल्पनागौरवप्रसङ्गात् ।
तेनानन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वं कारणत्वम् । अनन्यथासिद्धनियत-
पश्चाद्भावित्वं कार्यत्वम् ।
तन्तुरूप का नियत पूर्वभाव तो है ही, किन्तु वह अन्यथासिद्ध [ होने से पट
के प्रति कारण नहीं हो सकता ] है । पट के रूप के उत्पादन में ही उसकी
[ शक्ति या उपयोगिता की ] समाप्ति हो जाती है । [ इसलिए ] पट के प्रति भी
( तन्तु रूप के ) कारणत्व [ मानने ] में कल्पना गौरव होने लगेगा । [ इसलिए
तन्तुरूप पटरूप के प्रति कारण नहीं है ]
इसलिए 'अन्यथासिद्ध नियत पूर्वभावित्व' [ यह ] कारणत्व [ अर्थात्
कारण का लक्षण ] है । और 'अनन्यथासिद्ध नियतपश्चाद्भावित्व' [ ही ] कार्यत्व
[ अर्थात् कार्य का लक्षण ] है ।
कारण के इस लक्षण में 'अनन्यथासिद्ध' पद विशेष महत्त्व का है ।
इसलिए उसको विशेष रूप से समझ लेना उपयोगी होगा । श्री विश्वनाथ ने
न्याय मुक्तावली में पाँच प्रकार के अन्यथासिद्ध प्रतिपादित किए हैं—
येन१ सह पूर्वभावः कारणमादाय वा यस्य ।
अन्यं प्रति पूर्वभावे ज्ञाते यत्पूर्वभावविज्ञानम् ॥
जनकं प्रति पूर्ववृत्तितामपरिज्ञाय न यस्य गृह्यते ।
अतिरिक्तमथापि यद्भवेन्नियतावश्यकपूर्वभाविनः ॥
एते पञ्चान्यथासिद्धा दण्डत्वादिकमादिमम् ।
घटादौ दण्डरूपादि द्वितीयमपि दर्शितम् ॥
तृतीयन्तु भवेद्व्योम, कुलालजनकोऽपरः ।
पञ्चमो रासभादिः स्यादेतेष्वावश्यकस्त्वसौ ॥
१ 'येन सह पूर्वभावो' जिस धर्म के सहित कारण का कार्य के प्रति पूर्वभाव
गृहीत होता है वह धर्म कार्य के प्रति अन्यथासिद्ध होता है । यह प्रथम
अन्यथासिद्ध का लक्षण है । जैसे—दण्ड घट का कारण है । उसकी कारणता
दण्डत्व धर्म विशिष्ट दण्ड में गृहीत होती है । अतएव दण्डत्व के साथ
पूर्वभाव गृहीत होने से दण्डत्व घट के प्रति प्रथम प्रकार का अन्यथासिद्ध है।
२ 'कारणमादाय वा यस्य' यह द्वितीय अन्यथासिद्ध का लक्षण है । इसका
अभिप्राय यह है कि जिसका कार्य के साथ स्वतन्त्र रूप से अन्वय व्यतिरेक न
१ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली १९, २२ ।

२२ तर्कभाषा [ अन्यथासिद्धाः
हो, अपितु अपने कारण के द्वारा अन्वय व्यतिरेक हो वह अन्यथा सिद्ध
कहाता है। जैसे—घट के प्रति दण्डरूप का स्वतः अन्वय व्यतिरेक नहीं
है अपितु अपने कारण दण्ड के द्वारा अन्वय व्यतिरेक होता है। इसलिए
दण्डरूप घट के प्रति अन्यथासिद्ध है। यह अन्यथासिद्ध का दूसरा भेद हुआ।
३ 'अन्यं प्रति पूर्वभावे ज्ञाते यत्पूर्वभावविज्ञानम्' । यह तृतीय अन्यथासिद्ध
का लक्षण है। इसका अभिप्राय यह है कि किसी अन्य के प्रति पूर्वभाव
ज्ञात होने पर ही जिसका कार्य के प्रति पूर्वभाव गृहीत हो सके वह तृतीय
अन्यथासिद्ध होता है। जैसे—आकाश घट के प्रति अन्यथासिद्ध है। आकाश
प्रत्यक्ष नहीं है। उसकी सिद्धि शब्द के समवायि कारण के रूप में अनुमान
द्वारा ही होती है। इसलिए अन्य अर्थात् शब्द के प्रति पूर्वभाव अर्थात्
कारण के रूप में आकाश में सिद्ध होने पर ही उसकी घट के प्रति पूर्व-
वृत्तिता सम्भव हो सकती है। इसलिए आकाश, घटादि के प्रति तृतीय
प्रकार का अन्यथासिद्ध है।
४ 'जनकं प्रति पूर्ववृत्तित्वमपरिज्ञाय न यस्य गृह्यते' । यह चतुर्थ अन्यथासिद्ध
का लक्षण है। इसका आशय यह है कि कारण का जो कारण है वह
चतुर्थ अन्यथासिद्ध होता है। जनक अर्थात् कारण के प्रति पूर्ववृत्तिता
अर्थात् कारणत्व के बिना जिसकी कार्य के प्रति पूर्ववृत्तिता गृहीत न हो।
अर्थात् जो कारण का कारण है वह चतुर्थ अन्यथासिद्ध कहलाता है। जैसे
कुम्भकार का पिता घट के प्रति अन्यथासिद्ध है।
५ 'अतिरिक्तमथापि यद्भवेन्नियतावेक्षकपूर्वभाविनः' । यह पञ्चम अन्यथासिद्ध
का लक्षण है। इसका भाव यह है कि नियतावश्यक पूर्वभावी से अतिरिक्त
जो कुछ भी है वह सब पञ्चम अन्यथासिद्ध है। जैसे पटोत्पत्ति के प्रति
दैवादागत रासभ । 'अनन्यथासिद्धिनियतपूर्वभावित्वं कारणत्वम्' इस कारण
लक्षण की व्याख्या करते समय नियत पद का प्रयोजन रासभ में अतिव्याप्ति
वारण दिखाया था। वह रासभ पञ्चम प्रकार का अन्यथा सिद्ध कहलाता है।
इस प्रकार 'मुक्तावलीकार ने पाँच प्रकार के' 'अन्यथासिद्ध' दिखलाये हैं।
परन्तु इन सबों में 'पञ्चम' अन्यथासिद्ध ही सबसे मुख्य है। इसी लिये मुक्तावलीकार
ने 'एतेष्वावश्यकस्त्वसौ' लिखकर उसकी महत्ता को सूचित किया है। इसी कारण
तर्कभाषाकार ने इस पञ्चम अन्यथासिद्ध को उसके महत्त्वको ध्यान में रखते हुए,
अन्य 'अन्यथासिद्धों' से अलग विशेषरूप से नियतपद से सूचित किया। अन्यथा
'अनन्यथासिद्धपूर्वभावित्वं कारणत्वम्' इतना ही कारण का लक्षण किया जा सकता

लक्षणान्तरखण्डनम् ] प्रमाणनिरूपणम् २३
यत्तु कश्चिदाह कार्यानुकूतान्वयव्यतिरेकि कारणमिति, तदयुक्तम् ।
नित्यविभूनां व्योमादीनां कालतो देशतश्च व्यतिरेकासम्भवेनाकारणत्व-
प्रसङ्गात् ।
था । उस लक्षण में नियत पद के रखने की आवश्यकता न थी । क्योंकि उसका
काम अनन्यथासिद्ध पद से ही पूरा हो जाता । परन्तु उसके इस विशेष महत्त्व
के कारण ही कारण के लक्षण में उसका समावेश किया गया है ।
इस शैली का अवलम्बन भाष्यकार वात्स्यायन ने भी न्यायदर्शन के प्रथम
सूत्र की व्याख्या में किया है । न्याय के षोडश पदार्थों में से संशय दृष्टान्त
आदि पदार्थों का अन्तर्भाव प्रमेय पदार्थ में ही हो सकता है । परन्तु न्यायशास्त्र
की दृष्टि से उनका विशेष महत्त्व होने से सूत्रकार ने उसका पृथक् परिगणन
किया है । भाष्यकार का लेख इस प्रकार है:—
'तत्र संशयादीनां पृथग्वचनमनर्थकं, संशयादयो हि यथासम्भवं प्रमाणेषु
प्रमेयेषु चान्तर्भवन्तो न व्यतिरिच्यन्ते इति ।
'सत्यमेतत्, इमास्तु चतस्रो विद्याः पृथक्प्रस्थानाः प्राणभृतामनुग्रहायोपदि-
श्यन्ते । यासां चतुर्थीयमान्वीक्षिकी न्यायविद्या । तस्याः, पृथक्प्रस्थानाः
संशयादयः पदार्थाः । तेषां पृथग्वचनमन्तरेणाध्यात्मविद्यामात्रमियं स्यात् ,
यथोपनिषदः । तस्मात् संशयादिभिः पदार्थैः पृथक् प्रस्थाप्यते'१
इन पाँच प्रकार के अन्यथासिद्धों में तृतीय अन्यथासिद्ध का उदाहरण
आकाश को बताया है । 'तृतीयन्तु भवेद् व्योम' । परन्तु यह उदाहरण ठीक
नहीं है क्योंकि आकाश को कार्यमात्र के प्रति साधारण कारण माना गया है ।
जैसा कि मूल ग्रन्थ की अगली ही पङ्क्ति में आता है । इसलिए आकाश को
अन्यथासिद्ध का उदाहरण न बनाकर उसका कोई अन्य ही उदाहरण देना
चाहिए था । मुक्तावलीकार का 'तृतीयं तु भवेद् व्योम' लिखकर आकाश को
अन्यथासिद्ध बताना उचित नहीं है, क्योंकि आकाश को अन्यथासिद्ध मान
लेने पर ग्रन्थ की अगली पंक्ति का समन्वय नहीं हो सकेगा ।
और जो किसी ने कहा है कि 'कार्यानुकूतान्वयव्यतिरेकि कारणम्' यह कारण
का लक्षण है वह अयुक्त है । क्योंकि वैसा कहने पर नित्य और विभु आकाश
काल आदि पदार्थों का किसी काल या देश में व्यतिरेक [अभाव] सम्भव न होने
१. न्याय वा० भा० १, १, १ ।

२४ तर्कभाषा [ लक्षणान्तरखण्डनम्
से उनका अकारणत्व प्राप्त होने लगेगा । [अर्थात् 'यदि कार्यानुकृतान्वयव्यतिरेकि
कारणम्' यह कारण का लक्षण किया जायगा तो नित्य और सर्वव्यापक आकाश
आदि पदार्थों का किसी देश या किसी काल में अभाव सम्भव न होने से उनमें
कारण का यह लक्षण नहीं जा सकेगा । इसलिए अव्याप्तिदोष ग्रस्त हो जाने से
यह लक्षण ठीक नहीं है । ]
मीमांसक आदि 'कार्यानुकृतान्वयव्यतिरेकि कारणम्' यह कारण का
लक्षण करते हैं । इस लक्षण का अभिप्राय यह है कि 'कार्येण अनुकृतौ अन्वय-
व्यतिरेकौ यस्य तत्कारणम्' अर्थात् कार्य जिसके अन्वय और व्यतिरेक का
अनुसरण करता है उसको कारण कहते हैं । इसमें अन्वय और व्यतिरेक का
लक्षण 'तत्सत्त्वे तत्सत्ता अन्वयः' और 'तदभावे तदभावो व्यतिरेकः' किया
जाता है । साधारणतः कारणता का निर्णय अन्वयव्यतिरेक से ही होता है ।
जैसे अग्नि दाह के प्रति कारण है यह बात अन्वयव्यतिरेक से ही सिद्ध होती
है । अग्नि और दाह का अन्वयव्यतिरेक इस प्रकार होगा—'अग्निसत्त्वे दाहसत्ता'
अर्थात् अग्नि के होने पर दाह होता है यह अन्वय हुआ और 'अग्न्य-
भावे दाहाभावः' अग्नि के अभाव में दाह का अभाव होता है यह व्यतिरेक
हुआ । इन दोनों के होने से ही अग्निदाह के प्रति कारण सिद्ध होता है ।
इसी आधार पर कुछ लोग 'कार्यानुकृतान्वयव्यतिरेकि कारणम्' यह कारण
का लक्षण करते हैं ।
नैयायिकों का सिद्धान्त पक्ष यह है कि 'कार्यानुकृतान्वयव्यतिरेकि कारणम्'
यह कारण का लक्षण ठीक नहीं है, क्योंकि आकाश काल आदि जो नित्य और
विभु पदार्थ हैं उनमें कारण का यह लक्षण सम्भव न होगा । आकाश, काल
आदि पदार्थ नित्य हैं अतएव किसी काल में उनका अभाव नहीं मिलेगा। और वे
विभु अर्थात् सर्वत्र व्यापक हैं अतएव किसी देश में उनका अभाव नहीं मिलेगा।
इसलिए यद्यपि 'आकाशसत्त्वे घटसत्ता' यह अन्वय तो बन जायगा परन्तु
'आकाशाभावे घटाभावः' यह व्यतिरेक नहीं बन सकेगा । क्योंकि आकाश के
नित्य होने से किसी काल में और विभु होने से किसी देश में उसका अभाव
नहीं मिलेगा । इसी प्रकार 'कालसत्त्वे घटसत्ता' यह अन्वय तो बन जायगा
परन्तु 'कालाभावे घटाभावः' यह व्यतिरेक नहीं मिल सकेगा । इसलिए अन्वय
बन जाने पर भी व्यतिरेक के असम्भव होने से कारण यह लक्षण आकाश
काल आदि नित्य विभु पदार्थों में नहीं घट सकेगा । अतः अव्याप्ति दोषग्रस्त
होने से यह कारण का लक्षण ठीक नहीं है ।