तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
मैथिल शाखा
१२००–१६००
[ ४६ ]
सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ
१ | गङ्गेशोपाध्याय | १२०० | मिथि० | नव्य न्याय के प्रवर्तक | तत्त्वचिन्तामणि
२ | वर्द्धमानोपाध्याय | १२५० | ” | गङ्गेशोपाध्याय के शिष्य | १ तत्त्वचिन्तामणि प्रकाश
| | | | | २ न्यायनिबन्ध प्रकाश (न्या.वा.ता.परिशुद्धि की टीका)
| | | | | ३ न्यायपरिशिष्ट प्रकाश (न्या० प० की टीका)
| | | | | ४ प्रमेयनिबन्ध प्रकाश
| | | | | ५ किरणावली प्रकाश
| | | | | ६ न्यायकुसुमाञ्जलि प्रकाश
| | | | | ७ न्यायलीलावती प्रकाश
| | | | | ८ खण्डनखण्ड प्रकाश
३ | पक्षधर मिश्र [ जयदेव ] | १२७५ | ” | हरि मिश्र के शिष्य | १ तत्त्वचिन्तामणि आलोक
| | | | | २ द्रव्यपदार्थ
| | | | | ३ लीलावती विवेक
| | | | | ४ प्रसन्नराघव नाटक
| | | | | ५ चन्द्रालोक
४ | वासुदेव मिश्र | ” | ” | जयदेव मिश्र के शिष्य | १ तत्त्वचिन्तामणिटीका [ पक्षधर के समर्थन में ]
५ | रुचिदत्त मिश्र | ” | ” | ” | १ तत्त्वचिन्तामणि प्रकाश
| | | | | २ न्यायकुसुमाञ्जलि प्रकाश-मकरन्द
४ त० भू०
| सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ |
|---|---|---|---|---|---|
| ६ | भगीरथ [ मेघ ] ठक्कुर | १४०० | मिथि० | १ जलद [ कुसुमाञ्जलि प्रकाश वर्द्धमान की टीका ]<br>२ 'किरणावली प्रकाश प्रकाशिका' [ " ]<br>३ लीलावती प्रकाश व्याख्या [ " ]<br>४ पक्षधर मिश्र के 'आलोक' पर 'दर्पण' टीका | |
| ७ | महेश ठक्कुर | ” | ” | दरभंगा के राजवंश के<br>संस्थापक हैं। इनके शिष्य<br>रघुनन्दन दास राय नैया-<br>यिक की विद्वत्ता से प्रसन्न<br>होकर सम्राट् अकबर ने<br>दरभंगा का प्रान्त उनको<br>भेंट किया था जिसे<br>उन्होंने गुरुदक्षिणा के रूप<br>में महेश ठक्कुर को सम-<br>र्पित कर दिया और इस<br>प्रकार वे दरभंगा के राज-<br>वंश के संस्थापक बने। | |
| ८ | शङ्कर मिश्र | १४५० | ” | १ आत्मतत्त्वविवेक कल्पलता<br>२ आनन्दवर्द्धन [ खण्डनखण्डखाद्य की टीका ]<br>३ तत्त्वचिन्तामणिमयूख<br>४ त्रिसूत्रीनिबन्ध व्याख्या [ उदयन की टीका ]<br>५ भेदरत्नप्रकाश [ शाङ्कर वेदान्त का खण्डन ]<br>६ गौरीदिगम्बरप्रहसन |
[ ५० ]
</div>[ ५१ ]
७ वैशेषिकसूत्रोपस्कार
८ वादिविनोद
९ बौद्धधिकार टीका [ आत्मतत्त्वविवेक की टीका ]
१० अभेदधिकार [ शङ्कर का खण्डन ]
११ न्यायलीलावती कण्ठाभरण
१२ पण्डितविजय
१ अनुमानखण्ड टीका [ त० चि० की टीका ]
२ खण्डनखण्डोद्धार
३ न्यायसूत्रोद्धार
४ शब्दनिर्णय
९ वाचस्पति मिश्र(द्वितीय) १४५० "
१० मिसरू मिश्र १४७१ १ पदार्थचन्द्र
न्यायदीपिकाकार मिसरुक दूसरे हैं।
११ दुर्गादत्त मिश्र १५५० १ न्यायबोधिनी
१२ देवनाथ ठक्कुर १५६२ १ तत्त्वचिन्तामण्यालोक-परिशिष्ट
१३ मधुसूदन ठक्कुर १५७५ १ तत्त्वचिन्तामण्यालोक-कण्टकोद्धार
नवद्वीप शाखा
१६००-१८००
[ ५२ ]
सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ
१ | वासुदेव सार्वभौम | १५५० | नवद्वीप | नवद्वीप के महेश्वर विशा- |
| | | | रद के पुत्र थे । व्याकरण |
| | | | आदि पढ़ने के बाद लग- |
| | | | भग २५ वर्ष की अवस्था |
| | | | में मिथिला जाकर पक्ष- |
| | | | धर मिश्र के शिष्य बने । |
| | | | मैथिली पण्डित किसी |
| | | | बाहरी व्यक्ति को अपने |
| | | | ग्रन्थों की प्रतिलिपि नहीं |
| | | | करने देते थे । अत एव |
| | | | वासुदेव सार्वभौम ने |
| | | | समस्त तत्त्वचिन्तामणि |
| | | | और कुसुमाञ्जलि को कण्ठ |
| | | | कर लिया वहाँ से शिक्षा |
| | | | समाप्त कर काशी में |
| | | | वेदान्त का अध्ययन कर |
| | | | १६०० में वे नवद्वीप |
| | | | वापिस लौट आए । और |
२
रघुनाथ शिरोमणि
१६००
”
वहां न्यायकी शिक्षा देना
प्रारम्भ किया। इस प्रकार
वे नव्यन्याय की नवद्वी-
पशाखा के प्रवर्तक हैं।
नवद्वीप में वासुदेव
सार्वभौम से नव्यन्याय
की संपूर्ण शिक्षा प्राप्त
कर मिथिला गए और
पक्षधर मिश्र के शिष्य
बने। एक दिन पक्षधर
मिश्र ने किसी बात पर
इनका अपमान कर दिया
तो रात को छिपकर तल-
वार लेकर उनको मारने
के लिए घर पर पहुँचे।
उस समय पक्षधर मिश्र
अपनी पत्नी से रघुनाथ
की विद्वत्ता की प्रशंसा
कर रहे थे जिसे उन्होंने
बाहर से सुन लिया।
और तलवार फेंक कर
गुरु के चरणों पर गिर
पड़े और क्षमा मांगी।
वे एक आँख से काने थे।
१ तत्त्वचिन्तामणि-दीधिति
२ बौद्धधिक्कार-शिरोमणि
३ पदार्थतत्त्वनिरूपण
४ किरणावली-प्रकाश-दीधिति
५ न्यायलीलावती-प्रकाश-दीधिति
६ अवच्छेदकत्वनिरुक्ति
७ खण्डनखण्डखाद्य-दीधिति
८ आख्यातवाद
९ नञ्वाद
[ ५३ ]
[ ५४ ]
| सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ |
|---|---|---|---|---|---|
| ३ | हरिदास न्यायालङ्कार भट्टाचार्य | १६०० | नवद्वीप | वासुदेव सार्वभौम के शिष्य | १ न्यायकुसुमाञ्जलि-कारिकाव्याख्या |
| २ तत्त्वचिन्तामणि-प्रकाश | |||||
| ३ भाष्यालोक-टिप्पणी | |||||
| ४ | जानकीनाथ शर्मा | ” | १ न्यायसिद्धान्तमञ्जरी | ||
| ५ | कणाद तर्कवागीश | १६१० | १ मणिव्याख्या | ||
| २ भाषारत्न | |||||
| ३ अपशब्ददूषण | |||||
| ६ | रामकृष्ण भट्टाचार्य चक्रवर्ती | १६२५ | १ रघुनाथ शिरोमणि के पुत्र एवं शिष्य | १ गुणशिरोमणिप्रकाश | |
| २ न्यायदीपिका | |||||
| ७ | मथुरानाथ तर्कवागीश | ” | ” | १ तत्त्वचिन्तामणि रहस्य | |
| २ ” आलोकरहस्य | |||||
| ३ दीधितिरहस्य | |||||
| ४ सिद्धान्त रहस्य | |||||
| ५ किरणावलीप्रकाशरहस्य | |||||
| ६ न्यायलीलावतीप्रकाशरहस्य | |||||
| ७ ” ” दीधितिरहस्य | |||||
| ८ बौद्ध धिकाररहस्य | |||||
| ९ आदिक्रियाविवेक | |||||
| १० आयुर्वेदभावना | |||||
| ८ | कृष्णदास सार्वभौम भट्टाचार्य | ” | १ तत्त्वचिन्तामणि-दीधितिप्रसारिणी | ||
| २ अनुमानालोक-प्रसारिणी |
मयूख ३ न्यायादर्श या न्यायसारावली ४ शब्दशक्तिप्रकाशिका ५ तर्कामृत ६ पदार्थतत्त्वनिर्णय ७ न्यायलीलावतीदीधितिव्याख्याThese are at y ≈ 560 to 730! And then:१ त० चि० दीधितिपरीक्षा २ किरणावलीप्रकाशविवृतिपरीक्षा ३ पदार्थखण्डनव्याख्या ४ भावविलास [ राजस्तुति का काव्य ] ५ भ्रमरदूत`
These are at y ≈ 740 to 880!
YES! YES! YES!
Row 9 is at the TOP!
Row 10 is BELOW Row 9!
Row 11 is BELOW Row 10!
Row 12 is BELOW Row 11!
And in each row:
The row runs from LEFT to RIGHT:
Left: ९
Next: गुणानन्द विद्यावागीश
Next: १६२५
Next: The works!
And at the very top:
Above Row 9 (or in the margin above):
There is [ ५५ ]!
WAIT! Look at [ ५५ ]:
Is it at the top or right?
It's at x ≈ 450, y ≈ 95!
Wait, y ≈ 95 is ABOVE Row 9!
[ ५६ ]
| सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ |
|---|---|---|---|---|---|
| १३ | जयराम न्यायपञ्चानन | १७०० | ६ वृन्दावनविनोद काव्य<br>१ त० चि० दी० गूढार्थविद्योतन<br>२ त० चि० आलोकविवेक<br>३ न्यायसिद्धान्तमाला<br>४ शब्दार्थमाला<br>५ गुणदीधितिविवृत्ति<br>६ न्यायकुसुमाञ्जलिकािरकाव्याख्या<br>७ पदार्थमणिमाला<br>८ काव्यप्रकाश तिलक | ||
| १४ | गौरीकान्त सार्वभौम | १७२५ | १ भावार्थदीपिका [ तर्कभाषा की टीका ]<br>२ सद्युक्तिमुक्तावली<br>३ आनन्दलहरीवटी<br>४ विद्वन्मुखमण्डन विटीका | ||
| १५ | भवानन्द सिद्धान्तवागीश | १६२५ | १ त० चि० दी० प्रकाशिका<br>२ प्रत्यक्षालोकसारमञ्जरी<br>३ तत्त्वचिन्तामणिटीका<br>४ कारकविवेचन | ||
| १६ | हरिराम तर्कवागीश | ” | १ त० चि० टीका विचार |
[ ५७ ]
१७ विश्वनाथसिद्धान्तपञ्चानन १६३४ १ अलङ्कारपरिष्कार
२ नञ्वादटीका
३ न्यायसूत्रवृत्ति
४ सुबर्थतत्त्वालोक या कारकचक्र
५ पदार्थतत्त्वालोक
६ न्यायतन्त्रबोधिनी
७ भाषापरिच्छेद
८ पिङ्गलप्रकाश
९ सुबोधिनी [ शब्दशक्ति प्र० की टीका ]
१८ रामभद्र सिद्धान्त वागीश १६६० १ न्यायसंक्षेप
१९ गोविन्द न्यायवागीश १६५० २ पदार्थखण्डनव्याख्या
३ समासवाद
२० रघुदेव न्यायालंकार " १ त० चि० गूढार्थदीपिका
२ नतीननिर्माण
३ दीधितिटीका
४ न्या० कुसु० कारिकाव्याख्या
५ द्रव्यसारसंग्रह
६ पदार्थखण्डनव्याख्या
२१ गदाधर भट्टाचार्य " १ त० चि० दीधितिप्रकाशिका
२ " व्याख्या
३ " आलोकटीका
४ मुक्तावलीटीका
५ रत्नकोषवादरहस्य
६ अनुमानचिन्तामणिदीधितिटीका
[ ५८ ]
| सं० | नाम | काल | स्थान | विशेष | ग्रन्थ |
|---|---|---|---|---|---|
| ७ आख्यातवाद | |||||
| ८ कारकवाद | |||||
| ९ नञ्वाद | |||||
| १० प्रामाण्यवाददीधितिटीका | |||||
| ११ शब्दप्रामाण्यवादरहस्य | |||||
| १२ बुद्धिवाद | |||||
| १३ मुक्तिवाद | |||||
| १४ विधिवाद | |||||
| १५ विषयतावाद | |||||
| १६ व्युत्पत्तिवाद | |||||
| १७ शक्तिवाद | |||||
| १८ स्मृतिसंस्कारवाद | |||||
| २२ | नृसिंह पञ्चानन | १६७५ | १ न्यायसिद्धान्तमञ्जरीभूषा | ||
| २३ | रामदेव चिरञ्जीव | १७०० | १ विद्वदामोदतरङ्गिणी | ||
| २ काव्यबिलास | |||||
| ३ माधवचम्पू | |||||
| ४ वृत्तरत्नावली | |||||
| २४ | रामरुद्र तर्कवागीश | ” | १ त० चि० दीधिति टीका | ||
| २ व्याप्तिवादव्याख्या | |||||
| ३ कारकनिर्णयटीका | |||||
| ४ दिनकरीप्रकाशतरङ्गिणी |
[ ५६ ]
२५ श्रीकृष्ण न्यायालङ्कार १६५० ५ तत्त्वसंग्रहदीपिका-टिप्पणी
६ सिद्धान्तमुक्तावली-टीका
२६ जयराम तर्कालङ्कार १७०० १ भावदीपिका [ न्यायसिद्धान्तमञ्जरी की टीका ]
१ शक्तिवाद-टीका
१ वादपरिच्छेद
२ व्याख्याव्यूह
३ चित्तरूप
४ अधिकरणचन्द्रिका
२७ रुद्रराम १७५० ५ वैशेषिकशास्त्रीय-पदार्थनिरूपण
२८ कृष्णकान्त विद्यावागीश १७८० १ न्यायरत्नावली
२ दायभाग टीका
३ गोपाळलीलामृत
४ चैतन्यचन्द्रामृत
५ कामिनीकामकौतुक
६ उपमानचिन्तामणि-टीका
७ शब्दशक्तिप्रकाशिका-टीका
२९ राजचूडामणि मखी १६३० १ तत्त्वचिन्तामणिदर्पण
३० धमेरा आध्वरीण १६५० १ ,, प्रकाश-टीका
३१ गोपीनाथ मौनी " १ शब्दालोक
तर्कभाषाकार केशवमिश्र
बौद्ध, ब्राह्मण तथा जैन तीनों सम्प्रदायों के अपने अपने मत के अनुसार
'तर्कभाषा' इस एक ही नाम से अलग-अलग ग्रन्थ हैं। इनमें से बौद्ध 'तर्कभाषा'
के लेखक मोक्षाकर गुप्त [११००] हैं। यह मोक्षाकर की 'तर्कभाषा' तीनों में
सबसे प्राचीन है। इसमें बौद्धन्याय के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है।
ऊपर हमने न्याय साहित्य का जो विवरण दिया है उसमें 'तर्कभाषा' नामक
तीन ग्रन्थों का उल्लेख किया गया है। दूसरी जैन 'तर्कभाषा' के लेखक
जैन विद्वान् श्री यशोविजय [१६८८ ई०] हैं। इसमें जैनन्याय के सिद्धान्तों
का विवेचन किया गया है। और तीसरी 'तर्कभाषा' के लेखक श्री केशवमिश्र
[१२७५ ई०] हैं। इसमें ब्राह्मणों के न्यायसिद्धान्तों का मुख्य रूप से और उसके
साथ ही वैशेषिक सिद्धान्तों का संक्षेप रूप से सम्मिलित विवेचन किया
गया है। केशवमिश्र की यह 'तर्कभाषा' बौद्ध विद्वान् मोक्षाकर गुप्त की
'तर्कभाषा' के १७५ वर्ष बाद और यशोविजय की जैन 'तर्कभाषा' से लगभग
चार सौ वर्ष पूर्व लिखी गई थी। यह प्रस्तुत हिन्दी व्याख्या उसी केशव-
मिश्र विरचित 'तर्कभाषा' की हिन्दी व्याख्या है। केशवमिश्र की यह 'तर्कभाषा'
न्याय के उन प्रकरण ग्रन्थों में से है जिन में मुख्य रूप से न्याय के सिद्धान्तों
का प्रतिपादन करते हुए आनुषङ्गिक रूप से वैशेषिक दर्शन के सिद्धान्तों का भी
समावेश कर लिया गया है।
खेद की बात है कि अन्य ग्रन्थकारों के समान 'तर्कभाषा' के लेखक केशवमिश्र
ने भी स्वयं अपना परिचय देने का कोई प्रयत्न नहीं किया है। इसलिए उनका
देश-काल आदि सब ही कुछ अन्धकार में है। उनका जो कुछ थोड़ा सा परिचय
प्राप्त होता है वह उनके शिष्य 'गोवर्धन मिश्र' के द्वारा हमको प्राप्त होता है।
'गोवर्धन मिश्र' ने अपने गुरु श्री केशवमिश्र की इस 'तर्कभाषा' पर 'तर्कभाषा-
प्रकाश' नामक एक टीका लिखी है। इस टीका के प्रारम्भ में एक श्लोक
लिखा है जिस से यह विदित होता है कि 'तर्कभाषा' के निर्माता केशवमिश्र
टीकाकार 'गोवर्धनमिश्र' के गुरु हैं। वह श्लोक जो इस गुरुशिष्य-सम्बन्ध को
बतलाता है इस प्रकार है—
विजयश्रीतनूजन्मा गोवर्धन इति श्रुतः।
तर्कानुभाषां तनुते विविच्य गुरुनिर्मिताम् ॥
इस में 'गोवर्धनमिश्र' ने अपना परिचय देते हुए 'तर्कभाषा' को अपने गुरु
की बनाई हुई बतलाया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि 'केशवमिश्र' 'गोवर्धन
मिश्र के गुरु थे। इसके आगे 'गोवर्धन मिश्र' ने एक श्लोक और लिखा है जिसमें
[ ६१ ]
उन्होंने अपने गुरु श्री केशवमिश्र का परिचय देने का प्रयत्न किया है। वह
श्लोक निम्न प्रकार है—
श्रीविश्वनाथानुज-पद्मनाभानुजो गरीयान् बलभद्रजन्मा ।
तनोति तर्कानधिगत्य सर्वान् श्रीपद्मनाभाद्विदुषो विनोदम् ॥
'गोवर्धन मिश्र' ने इस श्लोक में 'केशवमिश्र' का जो परिचय दिया है
उसके अनुसार उनके पिता का नाम 'बलभद्र' था। उनके दो बड़े भाई क्रमशः
'विश्वनाथ' तथा 'पद्मनाभ' नाम के थे। 'केशवमिश्र' ने अपने बड़े भाई
'पद्मनाभ' से तर्कशास्त्र का अध्ययन कर के 'स्वान्तःसुखाय' इस 'तर्कभाषा'
की रचना की है।
केशवमिश्र के बड़े भाई 'पद्मनाभमिश्र' स्वयं एक बड़े अच्छे नैयायिक
विद्वान् थे। उन्होंने वैशेषिक दर्शन के 'प्रशस्तपाद भाष्य' पर श्री उदयनाचार्य
विरचित 'किरणावली' नामक टीका पर 'किरणावलीप्रकाश' नामक व्याख्या
ग्रन्थ, तथा 'कणादरहस्यमुक्ताहार' नामक एक अन्य ग्रन्थ की रचना की है।
'किरणावली' पर नव्यन्याय के प्रवर्तक 'गंगेशोपाध्याय' के शिष्य 'श्री
वर्धमानोपाध्याय' [ १२५० ई० ] ने भी 'किरणावली-प्रकाश' नाम से ही एक
टीका लिखी है। परन्तु 'पद्मनाभ मिश्र' अपने 'किरणावली-प्रकाश' में 'वर्धमान'
के 'किरणावली-प्रकाश' की अपेक्षा कुछ विशेषता बतलाते हैं। उन्होंने लिखा
है कि 'वर्धमान' ने जिन अर्थों का स्पर्श भी नहीं किया है इस प्रकार के बिल्कुल
नवीन और अपने गुरु द्वारा उपदिष्ट अर्थों का हम अपने इस 'किरणावली-
प्रकाश' में वर्णन कर रहे हैं। उनका श्लोक इस प्रकार है—
उपदिष्टा गुरुचरणैरस्पृष्टा वर्धमानेन ।
किरणावल्यामर्थास्तन्यन्ते पद्मनाभेन ॥
अर्थात् अपने गुरु जी द्वारा बतलाये गए ऐसे अर्थों का जिनको कि 'किरणा-
वली-प्रकाश' नामक टीका के लेखक 'वर्धमानोपाध्याय' ने अपने ग्रन्थ में छुआ भी
नहीं है उनको हम अर्थात् इस नवीन 'किरणावली-प्रकाश' के लेखक 'पद्मनाभ
मिश्र' अपने इस ग्रन्थ में लिख रहे हैं।
इस श्लोक से प्रतीत होता है कि 'पद्मनाभमिश्र' जो कि केशवमिश्र के बड़े
भाई हैं वर्धमानोपाध्याय [ १२५० ई० ] के लगभग समकालीन किन्तु कुछ बाद
के हैं। इसलिए 'पद्मनाभमिश्र' और उनके छोटे भाई केशवमिश्र दोनों का समय
१२७५ ई० के लगभग निश्चित किया गया है।
'वर्धमानोपाध्याय' नव्यन्याय की 'मैथिल शाखा' के पण्डित थे इसलिए
'पद्मनाभ मिश्र' तथा 'केशव मिश्र' को भी प्रायः मैथिल ही माना जाता है। इस
प्रकार तर्कभाषाकार केशवमिश्र १२७५ ई० के लगभग मिथिला में उत्पन्न हुए थे।
[ ६२ ]
उनके पिता का नाम 'बलभद्र मिश्र' और दो बड़े भाइयों के नाम क्रमशः
'विश्वनाथ मिश्र' तथा 'पद्मनाभ मिश्र' थे। इनके शिष्य 'गोवर्धनमिश्र' थे जिन्होंने
इनकी 'तर्कभाषा' पर 'तर्कभाषाप्रकाश' नामक व्याख्या लिखी है। इतना ही
इनका परिचय इनके शिष्य 'गोवर्धन मिश्र' के द्वारा प्राप्त होता है।
तर्कभाषा की प्राचीन टीकाएँ—
केशव मिश्र की 'तर्कभाषा' में बहुत संक्षेप में और बहुत सुन्दर रूप से न्याय
के पदार्थों का प्रतिपादन किया गया है इसलिए इस पुस्तक ने विद्वानों में
अच्छा आदर पाया है। इसी कारण इस ग्रन्थ के ऊपर थोड़े से समय में ही
प्रायः चौदह टीका लिखी गई हैं। उनके नाम निम्न प्रकार हैं—
१ श्री गोवर्धनमिश्र कृत [ १३०० ] तर्कभाषा-प्रकाशिका ।
२ श्री गोपीनाथ कृत उज्ज्वला टीका।
३ श्री रोमबिल्व वेंकटबुद्ध कृत तर्कभाषा-भाव टीका ।
४ श्री रामलिंग कृत न्यायसंग्रह टीका ।
५ श्री माधवदेव कृत सारमञ्जरी ।
६ श्री भास्कर भट्ट कृत परिभाषादर्पण ।
७ श्री बालचन्द्र कृत तर्कभाषाप्रकाशिका ।
८ श्री चिन्नभट्ट कृत [ १३९० ] तर्कभाषाप्रकाशिका ।
९ श्री गणेशदीक्षित कृत तत्त्वप्रबोधिनी ।
१० श्री कौण्डिन्यदीक्षित कृत तर्कभाषाप्रकाशिका ।
११ श्री केशवभट्ट कृत तर्कदीपिका ।
१२ श्री गौरीकण्ठ सार्वभौम कृत तर्कभाषा-प्रकाशिका ।
१३ श्री नागेशभट्ट कृत [ १७१० ] युक्तिमुक्तावली टीका ।
१४ श्री विश्वकर्मा कृत न्यायप्रदीप ।
'तर्कभाषा' जैसी छोटी सी पुस्तक पर इतनी अधिक टीकाओं का लिखा
जाना उसकी लोकप्रियता और प्रौढ़ता का प्रमाण है। यह छोटा सा ग्रन्थ
भारतीय दर्शन का प्रवेश-द्वार है इसलिए सभी कलाकारों ने उसे अपनी-
अपनी व्याख्याओं द्वारा अलंकृत करने का यत्न किया है। जिस प्रकार विगत
७०० वर्षों से यह ग्रन्थ विद्वानों में आदर प्राप्त करता आ रहा है उसी प्रकार
आशा है इस नवयुग में भी इस नवीन व्याख्या से विभूषित यह ग्रन्थ विशेष
रूप से प्रचार और विद्वज्जनों द्वारा आदर प्राप्त करेगा ।
दीपावली २०१० विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि
तर्कभाषा
‘तर्करहस्यदीपिका’ विभूषिता
इस पृष्ठ पर कोई मुद्रित पाठ (printed text) उपलब्ध नहीं है। यह एक रिक्त पृष्ठ (blank page/verso) है, जिस पर केवल विपरीत पृष्ठ (recto) का बहुत धुंधला और उलटा (mirror-image) प्रतिबिम्ब/शो-थ्रू (bleed-through) दिखाई दे रहा है। अतः यहाँ लिप्यंतरण योग्य कोई मूल पाठ्य सामग्री नहीं है।
श्रीकेशवमिश्रप्रणीता
तर्कभाषा
उपोद्घातः
अथ श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिविरचिता
‘तर्करहस्यदीपिकाख्या’ हिन्दीव्याख्या ।
यस्य भूमिः प्रमान्तरिक्षमुतोदरम् ।
दिवं यश्चक्रे मूर्धानं, तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नमः ॥
नमो विश्वात्मभूताय पूताय परमात्मने ।
सच्चिदानन्दरूपाय तर्कतत्त्वावभासिने ॥
समुद्गता पूता निगमनगतस्तर्कसरिता,
तता या तन्त्रे तैः सुगतजिनविप्रैस्त्रिपथगा ।
तदस्या धाराणां परिचयकृते सम्यगधुना,
वयं व्याख्याव्याजात्तरिमभिनवां सन्तनुमहे ॥
अनुबन्धचतुष्टय—
मनुष्य एक मननशील प्राणी है । वह सदा विचारपूर्वक कार्य करता है,
‘मत्वा कर्माणि सीव्यति’² इसी से मनुष्य कहलाता है । अतएव मनुष्य उसी
कर्म में प्रवृत्त होता है जिसमें उसे ‘इष्टसाधनता’ और ‘कृतिसाध्यता’ का ज्ञान
हो । ‘इदं मदिष्टसाधनम्’ यह कार्य मेरा इष्टसाधन है, इससे मेरे प्रयोजन की
सिद्धि होगी, और ‘इदं मत्कृतिसाध्यम्’ यह कार्य मेरे प्रयत्न से साध्य है, मैं इस
कार्य को कर सकता हूँ ऐसा जान कर ही मनुष्य किसी काम में प्रवृत्त होता है ।
इस ज्ञान में ‘इदं’ पद से १ ‘विषय’, ‘मत्’ पद से २ ‘अधिकारी’, ‘इष्ट’ पद से
३ ‘प्रयोजन’ और ‘साधनम्’ या ‘साध्यम्’ पद से ४ ‘सम्बन्ध’ इन चारों का ज्ञान
आ जाता है । इसलिए ‘विषय’ ‘अधिकारी’, ‘सम्बन्ध’ और ‘प्रयोजन’ इन
१ अथर्ववेद १०,७,३२। २ निरुक्त ३,१,७।
२ तर्कभाषा [ शास्त्रप्रयोजनम्
बालोऽपि यो न्यायनये प्रवेशम्,-अल्पेन वाञ्छत्यलसः श्रुतेन ।
संक्षिप्तयुक्त्यन्विततर्कभाषा, प्रकाश्यते तस्य कृते मयैषा ॥
चारों को 'अनुबन्धचतुष्टय' कहा जाता है। 'प्रवृत्तिप्रयोजकज्ञानविषयत्व-
मनुबन्धत्वम्', प्रवृत्ति कराने वाले अर्थात् 'इदं मदिष्टसाधनम्' आदि ज्ञान के
विषय जो; १ विषय, २ अधिकारी, ३ प्रयोजन और ४ सम्बन्ध हैं; वे चारों
'अनुबन्धचतुष्टय' कहलाते हैं। और उनका ज्ञान ही मनुष्य को किसी भी
कार्य में प्रवृत्त कराता है। इसलिए किसी ग्रन्थ के अध्ययन में भी मनुष्य तब
ही प्रवृत्त होता है जब उसे उसके विषय आदि का ज्ञान हो। अतएव ग्रन्थ में
अधिकारी पाठकों की अभिरुचि और प्रवृत्ति हो सके इसके लिए ग्रन्थ के
आरम्भ में ही उसके विषय, प्रयोजन आदि का उल्लेख कर देना आवश्यक है।
इसीलिए प्राचीन संस्कृत साहित्य में सर्वत्र ग्रन्थारम्भ में 'अनुबन्धचतुष्टय' के
निरूपण करने की परम्परा रही है। जैसा कि कहा भी है--
'सिद्धार्थं सिद्धसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते ।
शास्त्रादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः'१ ॥
अर्थात् विषय, सम्बन्ध आदि का ज्ञान होने पर ही अधिकारी श्रोता
व्यक्ति किसी शास्त्र या ग्रन्थ आदि के श्रवण या अध्ययन आदि में प्रवृत्त होता
है। इसलिए ग्रन्थ के आरम्भ में विषय, सम्बन्ध, अधिकारी, प्रयोजन आदि
का प्रतिपादन कर देना चाहिए ।
इसी मर्यादा का अनुगमन करते हुए इस तर्कभाषा ग्रन्थ के रचयिता श्री
'केशवमिश्र' ने अपने ग्रन्थनिर्माण का प्रयोजन बतलाते हुए ग्रन्थ का प्रारम्भ
इस प्रकार किया है—
जो आलसी [ कठिन परिश्रम न कर सकने वाला ] बालक [ ग्रहणधारण-
पटुर्बालो न तु स्तनन्धयः, अर्थात् जो इस विषय को ग्रहण और धारण कर सके
ऐसा बालक दुधमुँहा बच्चा नहीं ] भी थोड़े से श्रवण [ अध्ययन अथवा गुरुमुख से
श्रवण ] से न्याय [ शास्त्र ] के सिद्धान्तों में प्रवेश [ उनका परिचय प्राप्त करना ]
चाहता है उसके लिए संक्षिप्त युक्तियों से अन्वित यह तर्कभाषा [ ग्रन्थ ] मैं
[ केशव मिश्र ] प्रकाशित कर रहा हूँ ।
१ मीमांसाश्लोकवार्तिकम् १,१७ ।
नामकरणम् ] उपोद्घातः ३
न्याय के सिद्धान्तों का सरलतापूर्वक परिज्ञान कराना इस ग्रन्थ का प्रयोजन
है। न्याय के प्रतिपाद्य प्रमाणादि षोडश पदार्थ इसके विषय हैं। न्याय-सिद्धान्त
का परिज्ञान प्राप्त करने वाला जिज्ञासु इसका अधिकारी है। और ग्रन्थ का
विषय के साथ प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव तथा अधिकारी के साथ बोध्यबोधकभाव
सम्बन्ध है। इस प्रकार इस श्लोक में 'अनुबन्धचतुष्टय' की सूचना हुई ।
नामकरण—
लेखक ने अपने ग्रन्थ का नाम 'तर्कभाषा' रखा है। यों तो न्यायसूत्रकार ने
अपने षोडश पदार्थों में 'तर्क' नामक एक पदार्थ माना है और उसका लक्षण
'अविज्ञाततत्त्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः'१ इस प्रकार किया है।
परन्तु तर्कभाषा के टीकाकारों ने 'तर्क्यन्ते प्रतिपाद्यन्ते, इति तर्काः प्रमाणादयः
षोडश पदार्थाः' । इस प्रकार तर्क शब्द की व्युत्पत्ति की है और उसका अर्थ
प्रमाणादि षोडश पदार्थ किया है। तर्कभाषा के अतिरिक्त श्री अन्नंभट्ट के
'तर्कसंग्रह', श्री जगदीश तर्कालङ्कार के 'तर्कामृत' आदि अन्य ग्रन्थों के टीका-
कारों ने भी 'तर्क' शब्द की इसी प्रकार की व्युत्पत्ति की है। अतएव इस
व्युत्पत्ति के आधार पर 'तर्क्यन्ते प्रतिपाद्यन्ते, इति तर्काः प्रमाणादयः षोडश
पदार्थास्ते भाष्यन्तेऽनया इति तर्कभाषा'। अर्थात् प्रमाणादि षोडश पदार्थों की
व्याख्या करने वाली पुस्तक होने के कारण इसका नाम 'तर्कभाषा' रखा गया
है और वह सार्थक या अन्वर्थ संज्ञा है।
न्यायसूत्रकार ने 'कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः' यह जो तर्क का
लक्षण किया है उसके अनुसार किसी तत्त्व के निर्णय के लिए कारणों और
युक्तियों से ऊह अर्थात् अनुसन्धान का नाम तर्क है। आत्मा आदि विशेष
विवादग्रस्त विषयों में तत्त्व निर्णय के लिए न्याय दर्शन ने विशेष रूप से
युक्तियों और कारणों से ऊहापोह की है, और यही उसका प्रधान विषय रहा है
इसलिए न्यायशास्त्र का नाम ही 'तर्क' अथवा 'तर्कशास्त्र' हो गया है। इसी
प्रसङ्ग से न्याय में अनुमान, उस में प्रयुक्त होने वाले शुद्ध हेतुओं, तथा अशुद्ध
हेतुरूप हेत्वाभास, आदि की विशेष विवेचना की गई है। और तत्त्व-निर्णय
के लिए होने वाली कथाओं के 'वाद', 'जल्प', वितण्डा' आदि भेद कर के
उनके नियम और 'निग्रहस्थान' आदि का विशेष वर्णन किया गया है। इस-
१ न्यायसूत्र १,१,४०।
४ तर्कभाषा [ पाश्चात्त्यतर्कार्थाः
लिए कारणों के ऊहापोहात्मक तर्क से विशेष रूप से सम्बद्ध होने के कारण
यह न्यायशास्त्र अनेक स्थलों में तर्क अथवा तर्कशास्त्र नाम से व्यवहृत हुआ है
वह उचित ही है। इसीलिए उस न्यायशास्त्र के सिद्धान्तों का परिचय देने
वाले इस ग्रंथ का 'तर्कभाषा' नाम रखा गया है वह अन्वर्थ और उचित ही है।
पाश्चात्त्यतर्क—
पाश्चात्त्य दर्शनों में न्यायशास्त्र अथवा तर्कशास्त्र के लिए 'लाजिक' शब्द
का प्रयोग होता है। यह लाजिक शब्द यूनानी भाषा की मूल 'लोगस' धातु
से बना है। इस लोगस धातु का अर्थ विचार तथा वाणी दोनों हैं। इसलिए
विचार तथा वाणी से सम्बन्ध रखने वाली अर्थात् वाणी द्वारा विचारों को
अभिव्यक्त करने की शैली तथा नियमों का निर्धारण करने वाली विद्या का
नाम लाजिक अथवा तर्कशास्त्र है। हमारे यहाँ न्याय शास्त्र के आदि प्रवर्तक
महर्षि 'अक्षपाद गौतम' माने जाते हैं। इसी प्रकार पश्चिमी तर्कशास्त्र के प्रवर्तक
यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक 'अरस्तू' माने जाते हैं। ये अरस्तू महोदय सुप्रसिद्ध
यूनानी सम्राट् सिकन्दर, जिसने ईसा से ३२७ वर्ष पूर्व भारत पर आक्रमण
किया था, के गुरु थे। उनके तर्कशास्त्र में और अपने न्यायशास्त्र में अनेक
भेद होते हुए कुछ समानताएं भी पाई जाती हैं। जैसे वैशेषिक दर्शन के द्रव्य,
गुण, कर्म आदि सात पदार्थों के स्थान पर अरस्तू ने १ द्रव्य [ सब्स्टैन्स ],
२ गुण [ क्वालिटी ], ३ कर्म [ एक्शन ], ४ समवाय [ रिलेशन ], ५ परिमाण
[ क्वान्टिटी ], ६ काल [ टाइम ], ७ देश [ स्पेस ], ८ क्रियाभाव या नैष्कर्म्य
[ पैशन ], ९ अधिकारसम्बन्ध [ पजैश्रन ] और १० स्थिति [ सिचुएशन ]
रूप दस पदार्थों को माना है, जिन्हें कैटागरीज़ [ Categories ] कहते हैं ।
मीमांसकों के समान उन्होंने अनुमान के प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण अथवा
उदाहरण, उपनय और निगमन ये तीन ही अवयव माने हैं ।
नवीन तथा प्राचीन शैली का भेद—
न्याय, वेदान्त, व्याकरण आदि शास्त्रों में नव्य तथा प्राचीन नाम से दो
प्रकार का साहित्य पाया जाता है। नव्य न्याय और प्राचीन न्याय, नव्य,
- Substance, 2. Quality, 3. Action, 4. Relation,
- Quantity, 6. Time, 7. Space, 8. Passion, 9. Possession,
- Situation.