तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० तर्कभाषा [ विभागान्तर्भावः
इसका अभिप्राय यह है कि, "पदार्थों का उद्देश [ नाममात्र से कथन ]
न करने पर उनके लक्षण नहीं हो सकते हैं क्योंकि लक्षण का कोई विषय
उपस्थित नहीं है जिसका लक्षण किया जाय । [ अतएव उद्देश करना
आवश्यक है ] यदि पदार्थों के लक्षण न किए जायँ तो [ तत्त्वज्ञान का ] कारण
न होने से तत्त्वज्ञान नहीं होगा । इस लिए पदार्थ बोधन के लिए प्रवृत्त शास्त्र
के उद्देश और लक्षण रूप दोनों प्रकार की प्रवृत्ति आवश्यक है । परन्तु परीक्षा
का कोई नियम नहीं है ।"
“जहाँ लक्षण कर देने पर भी दूसरे मतों के आक्षेप के कारण तत्त्वनिर्णय
नहीं हो पाता है वहाँ परपक्ष के खण्डन के लिये परीक्षा विधि का अवलम्बन
किया जाता है । और जहाँ लक्षण कथन मात्र से ही तत्त्व का निश्चय हो जाता
है वहाँ परीक्षा विधि के व्यर्थ होने से उसका अवलम्बन नहीं किया जाता ।
और जो [भाष्यकार वात्स्यायन] त्रिविध शास्त्र-प्रवृत्ति मानते हैं उनके यहां भी
प्रयोजन आदि की परीक्षा नहीं की गई है । यह क्यों है ? इसलिए कि लक्षणमात्र
से ही उनकी प्रतीति हो जाती है । जब ऐसा है तब अर्थ की प्रतीति के
अनुसार प्रवृत्ति होती है न कि तीन ही प्रकार की यह कहना चाहिए" ।
इस प्रकार न्याय के भाष्यकार वात्स्यायन ने त्रिविध प्रवृत्ति का प्रतिपादन
किया है और वैशेषिक दर्शन के टीकाकार श्रीधराचार्य ने द्विविध प्रवृत्ति का
वर्णन किया है । इसका कारण यह है कि न्याय दर्शन के अधिकांश विषयों
के विवेचन में सूत्रकार ने ही परीक्षा विधि का भी अवलम्बन किया है ।
प्रयोजन आदि के वर्णन में यद्यपि परीक्षा विधि का प्रयोग न्यायसूत्रों में नहीं
मिलता है फिर भी अधिकांश भाग में परीक्षा भी पाई जाती है इसलिए न्याय
के भाष्यकार ने सामान्य रूप से त्रिविध प्रवृत्ति का वर्णन किया है । इसके
विपरीत वैशेषिक दर्शन में सूत्रकार ने परीक्षा विधि का अवलम्बन नहीं किया
है । केवल उद्देश और लक्षण ही अधिकतर किए गए हैं । अतएव वैशेषिक
दर्शन के टीकाकार श्रीधराचार्य ने परीक्षा को छोड़ कर केवल द्विविध शास्त्र
प्रवृत्ति का वर्णन किया है ।
विभाग—
न्याय की इस त्रिविध प्रवृत्ति के अतिरिक्त 'न्यायवार्तिककार' श्री उद्योत-
कराचार्य तथा 'न्यायमञ्जरीकार' जयन्त भट्ट ने शास्त्र-प्रवृत्ति के चतुर्थ प्रकार
'विभाग' का प्रश्न उठाकर और अन्त में उसका उद्देश में ही समावेश दिखा कर
त्रिविध प्रवृत्ति का ही समर्थन किया है । उन्होंने लिखा है :—