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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 330 में से

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पृष्ठ 72

प्रधान आधार बना कर न्याय के पदार्थों का गौण रूप से विवेचन किया गया
है । न्याय में प्रमाणादि सोलह पदार्थों का वर्णन है और वैशेषिक में द्रव्यादि
छः पदार्थों का । न्यायप्रधान प्रकरण ग्रन्थों में न्याय के प्रमाणादि सोलह
पदार्थों का मुख्य रूप से प्रतिपादन किया गया है । उनमें से प्रमेय नामक
द्वितीय पदार्थ के अन्तर्गत 'अर्थ' नामक प्रमेय में वैशेषिक में प्रतिपादित
द्रव्यादि छः पदार्थों का अन्तर्भाव करके उनका वर्णन किया है । तर्कभाषा में
इसी पद्धति का अवलम्बन किया है । अतएव वह न्यायप्रधान प्रकरण ग्रन्थ
है । इसके विपरीत 'तर्कसंग्रह' 'न्यायमुक्तावली' आदि में वैशेषिक के द्रव्यादि
पदार्थों का मुख्य रूप से वर्णन किया गया है । और उसमें गुण नामक द्वितीय
पदार्थ के अन्तर्गत 'बुद्धि' नामक पदार्थ में न्याय के प्रमाणादि पदार्थों का
अन्तर्भाव करके वर्णन किया गया है । अतएव वह वैशेषिकप्रधान प्रकरण ग्रन्थ
है । हमने अपनी 'दर्शनमीमांसा' में इस विषय का प्रतिपादन इस प्रकार
किया है :—
“ग्रन्थाश्च प्रकरणाख्या नव्याः सन्ति तथाविधाः ।
न्यायकाणादयोस्तत्त्वं यत्रैकत्रैव वर्ण्यते ॥
क्वचित् पदार्था न्यायस्य, क्वचिद् वैशेषिकस्य च ।
वर्णिता मुख्यतस्तेषु तथान्तर्भाविताः परे ॥
षट्पदार्थान् कणादस्यैवान्तर्भाव्य प्रमेयके ।
न्यायस्यार्थान् समालम्ब्य वर्णनं चैषु दृश्यते ॥
वरदराजस्तार्किकरक्षां चक्रे तथाविधाम् ।
कृता केशवमिश्रेण तर्कभाषा च तद्विधा ॥
न्यायात् प्रमाणमादाय षट्पदार्थान् कणादतः ।
अन्नंभट्टेन संगृह्य रचितस्तर्कसंग्रहः ।
न्यायलीलावतीं चैव चकार वल्लभस्तथा ।
तर्कालङ्कारः कृतवान् जगदीशस्तर्कामृतम् ॥
अथ भाषापरिच्छेदं न्यायमुक्तावलीं तथा ।
न्यायपञ्चाननश्चक्रे विश्वनाथाभिधः सुधीः ॥
लौगक्षिभास्करेणाथ रचिता तर्ककौमुदी ।
प्रकरणग्रन्थश्रेण्यामस्यामायाति च ध्रुवम्” ॥

१ दर्शनमीमांसा अ० ३ ।