तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनव्यप्रत्नभेदः ] उपोद्घातः ५
व्याकरण और प्राचीन व्याकरण, नवीन वेदान्त और प्राचीन वेदान्त आदि
शब्दों का प्रयोग बहुधा होता है परन्तु इस नव्य और प्राचीन का भेद किस
आधार पर किया जाय यह कहीं निर्दिष्ट नहीं किया गया है। इसलिए बहुधा
लोग कालक्रम को ही इस नवीनता और प्राचीनता का भेदक मानते हैं।
अर्थात् जो अधिक प्राचीन समय में लिखा गया वह प्राचीन और जो अपेक्षाकृत
बाद में या आजकल लिखा गया उसको नवीन कहते हैं। परन्तु यह व्यवस्था
ठीक नहीं है। क्योंकि इसमें काल की कोई ऐसी सीमा निर्धारित नहीं की जा
सकती है कि अमुक संवत् के पूर्व का लिखा साहित्य प्राचीन समझा जावे
और उसके बाद का लिखा साहित्य नवीन समझा जावे। हमारे मत में नवीन
और प्राचीन का यह भेद कालकृत नहीं अपितु प्रकारकृत है। इन सभी शास्त्रों
में जिनमें नवीन और प्राचीन का व्यवहार होता है दो प्रकार की रचनाएँ पाई
जाती हैं। न्याय, वेदान्त अथवा व्याकरण आदि शास्त्रों के आदि ग्रन्थों का
निर्माण सूत्ररूप में हुआ था। न्याय दर्शन के मूल आधार अक्षपाद गौतम
के न्यायसूत्र हैं। वेदान्त दर्शन का मूल आधार बादरायण व्यासकृत वेदान्तसूत्र
हैं। इसी प्रकार व्याकरण का मूल आधार पाणिनिकृत अष्टाध्यायी के सूत्र हैं।
इस प्रकार इन सब के मूल ग्रन्थ सूत्ररूप में हैं। आगे इन विषयों पर जो
ग्रन्थ लिखे गए उनमें दो प्रकार की पद्धति का अवलम्बन किया गया है। एक
पद्धति के ग्रन्थकारों ने सूत्रक्रम का अवलम्बन करके उनकी व्याख्या में ही
अपने ग्रन्थ लिखे। जैसे व्याकरण में 'काशिका', 'महाभाष्य' आदि, न्याय में
'वात्स्यायन भाष्य' 'न्याय वार्तिक' आदि, वेदान्त में शङ्कराचार्य, रामानुजाचार्य
आदिकृत भाष्य। ये सब सूत्र क्रम का अनुसरण करके ही लिखे गए हैं।
इस सूत्रक्रमानुसारिणी पद्धति को हम प्राचीन पद्धति कहना चाहते हैं। इन
विषयों में दूसरी पद्धति के ग्रन्थ इस प्रकार के हैं जिनमें सूत्रक्रम का ध्यान न
रख कर उस शास्त्र के विषय को स्वतन्त्र रूप से लिखा गया है। जैसे व्याकरण
में 'सिद्धान्तकौमुदी', न्याय में 'तर्कभाषा' 'मुक्तावली' आदि वेदान्त में अद्वैत-
सिद्धि', 'चित्सुखी' आदि। यह ग्रन्थ यद्यपि मूलग्रन्थों के विषय का ही प्रतिपादन
करते हैं परन्तु उनमें मूलग्रन्थों के सूत्रक्रम का अवलम्बन नहीं किया गया है।
इस पद्धति को नव्यशैली कहना चाहिये। इस दृष्टि से प्राचीनकाल में भी लिखे
गए 'सिद्धान्तकौमुदी' आदि ग्रन्थ नव्य व्याकरण के और आधुनिक काल में भी
सूत्रक्रम के अनुसार लिखे जाने वाले यह ग्रन्थ प्राचीन व्याकरण के अन्तर्गत