सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

६ तर्कभाषा [ प्रकरणग्रन्थाः
समझने चाहिये। हमने अपने 'दर्शनमीमांसा' नामक ग्रन्थ में इस भेद का
निरूपण इस प्रकार किया है :—
“द्वैधं दर्शनसाहित्यं नूतनप्रत्नभेदतः ।
प्रत्नं सूत्रक्रमापेक्षि, तदुपेक्ष्य च नूतनम् ॥
सूत्रवार्तिकभाष्यादि, क्वचित्टीकापरम्परा ।
प्रत्नं दर्शनसाहित्यं नूतनं च तथेतरत् ॥
सूत्रक्रमं परित्यज्य स्वतन्त्रैर्विबुधैस्ततः ।
ग्रन्था येऽत्र कृतास्ते तु साहित्ये नूतने मताः ॥
नूतनप्रत्नभेदोऽयं न कालापेक्षिको मतः ।
अङ्गीकृतोऽसौ सर्वत्र भङ्गीभेदात्तु केवलम्”१ ॥
इस लक्षण के अनुसार तर्कभाषा नवीन शैली का अवलम्बन करके लिखी
गई है अतएव उसकी गणना 'नव्यन्याय' के साहित्य में की जानी चाहिए।
दो प्रकार के 'प्रकरण' ग्रन्थ—
नव्य शैली में सभी शास्त्रों में कुछ इस प्रकार के ग्रन्थ पाए जाते हैं जो
उस-उस शास्त्र के केवल एक देश का प्रतिपादन करते हैं, अर्थात् शास्त्र के
सम्पूर्ण विषय का प्रतिपादन नहीं करते हैं। ऐसे ग्रन्थों को 'प्रकरण ग्रन्थ' कहा
जाता है। प्रकरण ग्रन्थ का लक्षण इस प्रकार किया गया है :—
शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम् ।
आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चितः२ ॥
तर्कभाषा में न्याय के मुख्य मुख्य पदार्थों का प्रतिपादन किया है उनके
समस्त विषयों का पूर्ण रूप से वर्णन नहीं किया गया है अतएव इसको न्याय
का 'प्रकरण ग्रन्थ' कहना ही उचित है। तर्कभाषा के अतिरिक्त अन्नंभट्ट का
'तर्कसंग्रह' विश्वनाथ की 'न्यायमुक्तावली' जगदीश तर्कालङ्कार का 'तर्कामृत',
लौगाक्षि भास्कर की 'तर्ककौमुदी' आदि अन्य अनेक प्रकरण ग्रन्थ भी न्याय
में लिखे गए हैं। इन प्रकरण ग्रन्थों में प्रायः न्याय और वैशेषिक दोनों दर्शनों
के पदार्थों का सम्मिलित रूप से वर्णन किया गया है। परन्तु उनमें से कुछ
ग्रन्थों में न्याय को प्रधान और वैशेषिक को गौण और दूसरों में वैशेषिक को
१ दर्शनमीमांसा, अ० १। २ पाराशर उपपुराण अ० २८, २१ ।