तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ तर्कभाषा [ पदार्थोद्देशः
'प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्त-अवयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-
वितण्डा-हेत्वाभास-च्छल-जाति-निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः'¹
इति न्यायस्यादिमं सूत्रम् ।
अस्यार्थः । प्रमाणादिषोडशपदार्थानां तत्त्वज्ञानान्मोक्षप्राप्तिर्भवतीति ।
न च प्रमाणादीनां तत्त्वज्ञानं सम्यग्ज्ञानं तावद्भवति यावदेषामुद्देशलक्षण-
परीक्षा न क्रियन्ते । यदाह भाष्यकारः—
'त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिरुद्देशो लक्षणं परीक्षा चेति' ।²
उद्देशस्तु नाममात्रेण वस्तुसङ्कीर्त्तनम् । तच्चास्मिन्नेव सूत्रे कृतम् ।
लक्षणन्त्वसाधारणधर्मवचनम् । यथा गोः सास्नादिमत्त्वम् । लक्षितस्य
इस प्रकार प्रस्तुत तर्कभाषा नव्यन्याय का न्यायप्रधान प्रकरण ग्रन्थ है ।
अतएव ग्रन्थकार ने प्रमाण-प्रमेयादि न्याय के प्रथम सूत्र को उद्धृत करते हुए
अपने ग्रन्थ का प्रारम्भ इस प्रकार किया है :—
१ प्रमाण, २ प्रमेय, ३ संशय, ४ प्रयोजन, ५ दृष्टान्त, ६ सिद्धान्त,
७ अवयव, ८ तर्क, ९ निर्णय, १० वाद, ११ जल्प, १२ वितण्डा, १३ हेत्वाभास,
१४ छल, १५ जाति, १६ निग्रहस्थानोंके तत्त्वज्ञान से निःश्रेयस की प्राप्ति होती है।
यह न्याय [ दर्शन ] का प्रथम सूत्र है ।
इसका अर्थ [ यह है ] प्रमाणादि सोलह पदार्थों के तत्त्वज्ञान से मोक्ष की
प्राप्ति होती है ।
और प्रमाणादि [ सोलह पदार्थों ] का तत्त्वज्ञान [ अर्थात् ] यथार्थज्ञान
तब तक नहीं हो सकता है जब तक इनके १ उद्देश, २ लक्षण और ३ परीक्षा
न किए जायें । जैसा कि [ न्याय दर्शन के ] भाष्यकार [ वात्स्यायन ] ने कहा
है [ कि ] इस [ न्याय ] शास्त्र की तीन प्रकार से प्रवृत्ति होती है । १ उद्देश,
२ लक्षण और ३ परीक्षा ।
उनमें से नाम मात्र से वस्तु का कथन उद्देश [ कहा जाता ] है । और वह
[ उद्देश ] इसी [ प्रमाणप्रमेयादिरूप प्रथम ] सूत्र में कर दिया है । २ असाधारण
धर्म का कथन लक्षण [ कहलाता ] है । जैसे गौ का 'सास्नादिमत्त्व' [ गाय के गले
के नीचे जो खाल लटकती रहती है उसको सास्ना या गलकम्बल कहते हैं । सास्ना
१ गौ० न्या० सू० १-१-१। २ न्या. सू. वा. भा. १-१-२