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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 330 में से

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पृष्ठ 74

शास्त्रप्रवृत्तिभेदाः ] उपोद्धातः ६
लक्षणमुपपद्यते न वेति विचारः परीक्षा। तेनैते लक्षणपरीक्षे प्रमाणादीनां
तत्त्वज्ञानार्थे कर्त्तव्ये ।
गौ के अतिरिक्त अन्य किसी प्राणी के नहीं होती। अतएव यह गौ का असाधारण
धर्म या लक्षण है।] ३ जिसका लक्षण किया गया है वह उसका ठीक लक्षण
है या नहीं इस विचार का नाम परीक्षा है। इसलिए [ उद्देश के प्रथम सूत्र में
ही हो जाने के बाद अब शेष ग्रन्थ में ] प्रमाणादि के तत्त्वज्ञान के लिए
[ उनकी ] यह लक्षण और परीक्षा करनी चाहिए ।
शास्त्र-प्रवृत्ति के भेद—
यहाँ ग्रन्थकार ने 'त्रिविधा चास्य शास्त्रस्य प्रवृत्तिः—उद्देशो लक्षणं परीक्षा
चेति' इस वात्स्यायन भाष्य को उद्धृत करते हुए न्याय शास्त्र की त्रिविध प्रवृत्ति
का वर्णन किया है। इस त्रिविध प्रवृत्ति का प्रतिपादन सर्वप्रथम भाष्यकार
वात्स्यायन ने ही किया है। और वह मुख्यतः न्याय शास्त्र में ही लागू होता
है। अन्य सब शास्त्रों में लागू नहीं होता। न्याय के 'समान-तंत्र' कहलाने
वाले वैशेषिक में भी त्रिविध नहीं अपितु परीक्षा को छोड़ कर केवल उद्देश और
लक्षण रूप द्विविध प्रवृत्ति का ही वर्णन है। और कहीं कहीं अत्यन्त श्रद्धाप्रधान
[बौद्ध-जैनादिकों के धर्मसंग्रह आदि] ग्रन्थों में केवल उद्देश रूप एकविध प्रवृत्ति
भी पाई जाती है। द्विविध प्रवृत्ति का वर्णन करते हुए वैशेषिक दर्शन के
प्रशस्तपाद भाष्य पर 'कन्दली' टीका के लेखक श्रीधराचार्य लिखते हैं—
“अनुद्दिष्टेषु पदार्थेषु न तेषां लक्षणानि प्रवर्त्तन्ते निर्विषयत्वात् । अलक्षितेषु
च तत्त्वप्रतीत्यभावः कारणाभावात् । अतः पदार्थव्युत्पादनाय प्रवृत्तस्य शास्त्रस्यो-
भयथा प्रवृत्तिः । उद्देशो लक्षणं च । परीक्षायास्तु न नियमः ।
यत्राभिहिते लक्षणे प्रवादान्तरव्याक्षेपात् तत्त्वनिश्चयो न भवति तत्र परप-
क्षव्युदासार्थं परीक्षाविधिरधिक्रियते । यत्र तु लक्षणाभिधानसामर्थ्यादेव तत्त्व-
निश्चयः स्यात् तत्रायं व्यर्थो नार्थ्यते । योऽपि त्रिविधां शास्त्रस्य प्रवृत्तिमित्छति
तस्यापि प्रयोजनादीनां नास्ति परीक्षा । तत् कस्य हेतोर्लक्षणमात्रादेव ते प्रती-
यन्त इति । एवं चेदर्थप्रतीत्यनुरोधात् शास्त्रस्य प्रवृत्तिर्न त्रिविधैव । नामधेयेन
पदार्थानामभिधानमुद्देशः । उद्दिष्टस्य स्वपरजातीयव्यावर्त्तको धर्मो लक्षणम् ।
लक्षितस्य यथालक्षणं विचारः परीक्षा'” ।
१ 'न्यायकन्दली' पृष्ठ २६ ।