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तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

सांख्ये चाक्षुष प्रक्रिया ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ६५
इन्द्रियेण सहा१र्थस्य सम्बन्धः कुत्र जायते ।
अक्षदेशेऽर्थदेशे वा व्यवस्था चात्र भिद्यते ॥
चक्षुषो गमनं केचिदर्थदेशे तु मन्वते ।
इन्द्रियान्तरदेशे च सम्बद्धं विषयान्तरम् ॥
प्रकाशस्य तु रश्मीनां प्रतिषेपात् पदार्थतः ।
चक्षुषि भाष्यकृद्योगं विज्ञानं मनुते तथो२ ॥
चाक्षुषप्रत्यक्ष के विषय में सांख्यादि की प्रक्रिया—
सांख्य, योग तथा वेदान्त दर्शन की प्रत्यक्षादि ज्ञान की प्रक्रिया न्याय की
प्रक्रिया से कुछ भिन्न है। उन तीनों दर्शनों ने अन्तःकरण अथवा मन को
‘वस्तु प्राप्य प्रकाशकारी माना है जब कि न्याय वैशेषिक तथा बौद्ध आदि
दर्शन मन को ‘वस्तु प्राप्य प्रकाशकारी’ नहीं मानते हैं। सांख्य आदि की
इस प्रक्रिया का आशय यह है कि उनके मत में इन्द्रिय प्रणालिका द्वारा
चित्त अथवा मन का बाह्य घट पट आदि वस्तुओं के साथ सम्बन्ध होता है।
और उस सम्बन्ध के होने से चित्त अर्थाकार में परिणत हो जाता है। चित्त
की इस अर्थाकार परिणति को वह ‘चित्तवृत्ति’ या ‘बुद्धिवृत्ति’ कहते हैं।
उनके मत में अन्तःकरण एक तैजस द्रव्य के समान है। जिस प्रकार नाली
के द्वारा जल खेत की क्यारियों में पहुँचकर चौकोर षट्कोण आदि जिस
आकार की क्यारी उसे मिलती है उसी आकार में परिणत हो जाता
है, उसी प्रकार इन्द्रिय प्रणालिका द्वारा अन्तःकरण भी अर्थाकार में
परिणत हो जाता है । अन्तःकरण की इस अर्थाकार परिणति
का नाम ‘चित्तवृत्ति’ है। और इस ‘वृत्ति’ में पुरुष या चैतन्य आत्मा का
प्रतिबिम्ब होने से अथवा चैतन्य आत्मा में ‘बुद्धिवृत्ति’ का प्रतिबिम्ब होने से
पुरुष या आत्मा को उस अर्थ का बोध होता है। इस बोध को सांख्य में
‘पौरुषेय बोध’ कहा है। उसके मत में ‘बुद्धिवृत्ति’ ‘प्रमाण’ है और उससे होने
वाला ‘पौरुषेय बोध’ फल या ‘प्रमा’ कहलाता है। जब कभी ‘बुद्धिवृत्ति’ के
लिये ‘प्रमा’ शब्द का प्रयोग होता है उस समय ‘इन्द्रिय’ को ‘प्रमाण’ कहा
जायगा। परन्तु अधिकांश में ‘बुद्धिवृत्ति’ को प्रमाण और ‘पौरुषेय बोध’ को
‘प्रमा’ कहा जाता है। ‘योगदर्शन’ के ‘व्यासभाष्य’ में इस प्रक्रिया का वर्णन
करते हुये लिखा है—
ईन्द्रियप्रणालिकया चित्तस्य बाह्यवस्तूपरागात् तद्विषया सामान्यविशेषा-
१ दर्शन मीमांसा ४। २ योगदर्शन व्या० भा० १,७ ।
५ त० भा०

६६ तर्कभाषा [ प्रत्यक्षे पाश्चात्यमतम्
त्मनोऽर्थस्य विशेषावधारणप्रधाना वृत्तिः प्रत्यक्षं प्रमाणम् । फलमविशिष्टः पौरुषे-
यश्चित्तवृत्तिबोधः' ।
वाचस्पति मिश्र तथा विज्ञानभिक्षु का मतभेद—
बुद्धिवृत्ति का पुरुष अथवा आत्मा के साथ सम्बन्ध किस प्रकार होता है
इस विषय में सांख्य के आचार्यों में दो प्रकार के मत हैं। 'वाचस्पति मिश्र' के
मत से 'बुद्धिवृत्ति' में पुरुष का प्रतिबिम्ब होता है और सांख्य सूत्रों के 'सांख्य-
प्रवचन भाष्य' के लेखक श्री विज्ञान भिक्षु ने पुरुष में चित्तवृत्ति का प्रतिबिम्ब
माना है। वाचस्पति मिश्र ने सांख्यतत्त्वकौमुदी [पाँचवीं कारिका की व्याख्या]
में प्रत्यक्ष का निरूपण करते हुए लिखा है।
'सोऽयं बुद्धितत्त्ववर्तिना ज्ञानसुखादिना तत्प्रतिबिम्बितस्तच्छायापत्त्याज्ञा-
नसुखादिमानिव भवति' ।
'तत्प्रतिबिम्बितः' पद से वाचस्पति मिश्र ने अन्तःकरण अथवा बुद्धिवृत्ति में
पुरुष के प्रतिबिम्ब का निर्देश

प्रत्यक्षे बौद्धमतम् ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ६७
पर विशेष बल दिया है। शेलिंग ने जब प्रत्यक्ष, अनुभव अथवा प्रतिभान
[ इण्ट्यूशन ] के प्राधान्य का प्रतिपादन किया तब हीगेल आदि विद्वान्
उससे विरक्त हो गए ।
हाँ वर्गसां अवश्य प्रत्यक्ष को महत्त्व देने वाले प्रसिद्ध दार्शनिक हैं। उन्होंने
बुद्धिवाद की कड़ी आलोचना भी की है। वर्गसां के अनुसार ज्ञान दो प्रकार का
होता है—एक बौद्धिक और दूसरा अपरोक्ष अनुभवमूलक अथवा प्रत्यक्ष ।
वर्गसां अपरोक्ष ज्ञान को आन्तरिक ज्ञान मानते हैं जिसमें हम वस्तु के भीतर तक
प्रविष्ट होकर उसका ज्ञान प्राप्त करते हैं । उनकी दृष्टि में बौद्धिक ज्ञान केवल
वस्तु का बाहरी ज्ञानमात्र है जिसमें हम केवल वस्तु के चारों ओर घूमते रहते हैं
उसके आन्तरिक रहस्य को नहीं जान पाते हैं। वर्गसां का कहना है कि बुद्धि कभी
पदार्थों के आन्तरिक रहस्य को नहीं जान सकती है वह तो अनुभव या प्रत्यक्ष
से ही प्राप्त होता है । परन्तु वर्गसां के इस 'प्रतिभानवाद' के विरुद्ध बर्ट्रांड रसेल
आदि आधुनिक विद्वान् फिर बुद्धिवाद का समर्थन कर रहे हैं ।
योरोपीय दर्शन में प्रत्यक्ष या अनुभव की उपेक्षा कर बुद्धिवाद को प्राधान्य
दिया गया है। जैसा कि सर्वपल्ली श्री राधाकृष्णन् १ ने लिखा है कि योरोपीय
दर्शन का झुकाव सदैव बुद्धिवाद की ओर रहा है। भारतीय दर्शन में प्रत्यक्ष की
प्रधानता और पाश्चात्त्य दर्शन में प्रत्यक्ष की उपेक्षा का जो यह भेद है उसका
मुख्य कारण यह है कि भारत में दर्शन और जीवन-उद्देश्य आत्मसाक्षात्कार है
जो अनुभव रूप है। और पाश्चात्य दर्शन का उद्देश्य विश्व की व्याख्या द्वारा
केवल बुद्धि को सन्तुष्ट करना मात्र है ।
प्रत्यक्ष के विषय में बौद्धमत—
ऊपर प्रत्यक्ष के सविकल्पक और निर्विकल्पक दो भेद किए गए हैं। उनके
विषय में तीन प्रकार के मत हैं, यह हम दिखला चुके हैं। जिसमें से बौद्ध लोग
केवल निर्विकल्पक को ही प्रमाण मानते हैं सविकल्पक को नहीं और नैयायिक
सविकल्पक तथा निर्विकल्पक दोनों को प्रमाण मानते हैं । बौद्ध लोग जो केवल
निर्विकल्पक को ही प्रमाण मानते हैं सविकल्प को नहीं इसका कारण यह है
कि उनके मत में निर्विकल्पक तो 'स्वलक्षण' विषयक अर्थात् 'वस्तु मात्र' विषयक
होने से वस्तुमात्र से जन्य है, अतः 'अर्थज' है । इसलिए 'अर्थज' होने से उसको
प्रमाण माना जा सकता है। परन्तु सविकल्पक ज्ञान तो नामजात्यादि योजना
सहित होता है। उसमें जाति का भी भान होता है । इसलिए 'जाति' को भी
१. An Idealist View of life P. P. 129-33.

६८तर्कभाषा[ प्रत्यक्षे बौद्धमतम्

उसका कारण मानना होगा। परन्तु बौद्धमत में 'जाति' कोई भावभूत पदार्थ नहीं
है। इसलिए उससे उत्पन्न होने वाला सविकल्पक ज्ञान 'अर्थज' नहीं है। इसलिए
'अर्थज' न होने से उसको प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता है ।
बौद्ध 'जाति' को भावभूत पदार्थ नहीं मानते हैं इसका कारण यह है कि
नैयायिकों की अभिमत 'जाति' नित्य पदार्थ है। 'नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वम्'
यह जाति का लक्षण नैयायिक मानते हैं । अर्थात् उनकी 'जाति' अथवा 'सामान्य'
नित्य पदार्थ है। परन्तु बौद्धदर्शन का प्रथम सिद्धान्त 'क्षणभङ्गवाद' है। बौद्धों
के मत में सब कुछ क्षणिक है। संसार में कोई भी नित्य पदार्थ नहीं है। अतएव
नैयायिक जिस नित्य 'जाति' को मानना चाहता है क्षणभङ्गवादी बौद्ध के लिए
उसका मानना सम्भव ही नहीं है। फलतः बौद्ध जाति को पदार्थ नहीं मानते ।
इसीलिए 'सामान्य' विषयक सविकल्पक को भी 'अर्थज' न होने से वह प्रमाण
नहीं मानते हैं !
अब यह प्रश्न हो सकता है कि जब बौद्ध 'जाति' या 'सामान्य' को नहीं
मानते हैं तब 'जाति' का काम वह कैसे निकालते हैं । न्यायसिद्धान्त में 'जाति'
का कार्य 'अनुगत प्रतीति' कराना है । 'अनुवृत्ति प्रत्ययहेतुः सामान्यम्'१
अनुवृत्ति प्रत्यय अर्थात् अनुगत प्रतीति अर्थात् एकाकार प्रतीति का जो कारण
है उसको 'सामान्य' कहते हैं। दश घट व्यक्ति उपस्थित है। उन सब में 'अयं
घटः' 'अयं घटः' इस प्रकार की एकाकार प्रतीति होती है । इस एकाकार
प्रतीति का कारण उनमें रहने वाला 'घटत्व सामान्य' है । सब घटों में घटत्व
नाम का एक साधारण धर्म रहता है। इसी के कारण सब घटों में 'अयं घटः'
'अयं घटः' इस प्रकार की एकाकार प्रतीति होती है । इसी अनुगतप्रतीति के
हेतुको 'सामान्य' या 'जाति' कहते हैं ।
इस प्रकार 'जाति' या 'सामान्य' का कार्य 'अनुवृत्ति प्रत्यय' अर्थात् एकाकार,
प्रतीति को उत्पन्न करना है ! जब बौद्ध लोग 'सामान्य' को भाव पदार्थ नहीं मानते हैं
तब उनके मत में इस एकाकार प्रतीति की उत्पत्ति कैसे होती है। इस प्रश्न के समाधान
के लिए बौद्ध दार्शनिक 'अपोह' की कल्पना करते हैं। उनके 'अपोह' शब्द का अर्थ
'अतद्व्यावृत्ति' अर्थात् 'तद्भिन्न, भिन्नत्व' है । तत् शब्द से घट आदि का
ग्रहण करना चाहिए। अतद् माने अघट अर्थात् घट भिन्न सम्पूर्ण जगत्, उससे
भिन्न फिर घट ही होगा। इसलिए प्रत्येक घट, अतद्व्यावृत्त या तद्भिन्न से
भिन्न है। इसी कारण घट कहलाता है। इस प्रकार प्रत्येक घट में 'अतद्व्यावृत्ति
या' तद्भिन्नभिन्नत्व' जिसे 'अपोह' भी कहते हैं होने के कारण ही एकाकार प्रतीति
१. तर्कभाषा सा ० पृ० ।

प्रत्यक्ष बौद्धमतम् ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ६६
ननु निर्विकल्पकं परमार्थतः स्वलक्षणविषयं भवतु प्रत्यक्षम् । सवि-
कल्पकं तु शब्दलिङ्गवदनुगताकारावगाहित्वात् सामान्यविषयं कथं
प्रत्यक्षमर्थजस्यैव प्रत्यक्षत्वात् । अर्थस्य च परमार्थतः सत एव तज्जनक-
त्वात् । स्वलक्षणन्तु परमार्थतः सत्, न तु सामान्यम् । तस्य प्रमाणनिरस्त-
विधिभावस्य अन्यव्यावृत्त्यात्मनस्तुच्छत्वात् ।
होती है । अतएव सामान्य का कार्य 'अपोह' या 'अतद्व्यावृत्ति' से निकल
सकता है । यह बौद्ध मत है ।
बौद्धों के इस 'अपोह' और न्याय, वैशेषिक के 'सामान्य' या 'जाति' पदार्थ
में अन्तर यह है कि बौद्धों का 'अपोह' 'अतद्व्यावृत्ति' रूप, अभावरूप है
और न्याय का 'सामान्य' भाव रूप । बौद्धों का कहना कि उस अभाव रूप
'अपोह' से ही जब 'अनुवृत्ति प्रत्ययहेतु' रूप 'सामान्य' का कार्य हो सकता
है तो 'सामान्य' को एक अलग पदार्थ मानने की आवश्यकता नहीं है ।
इस प्रकार बौद्ध मत में जाति का मानना न केवल अनावश्यक ही है
अपितु युक्तिसङ्गत भी नहीं है । घट के उत्पन्न होने से पहिले घट के निर्माण
स्थल पर घटत्व 'जाति' नहीं थी । कहीं से आती हुई भी नहीं दीखती ।
फिर घट के बन जाने पर वह घट में कहां से आ जाती है। घट के नष्ट होने
पर वह नष्ट भी नहीं होती और दिखाई भी नहीं देती फिर वह उस समय
कहां चली जाती है। इत्यादि अनेक दोष 'जाति' के मानने में आ जाते हैं
इसलिए भी 'जाति' या 'सामान्य' कोई भावभूत पदार्थ सिद्ध नहीं हो सकता
है । इसलिए उसका मानना उचित नहीं है । और 'अनुवृत्ति प्रत्यय' अर्थात्
एकाकार प्रतीति का कारण भावभूत सामान्य या जाति पदार्थ नहीं अपितु
'अतद्व्यावृत्ति' रूप 'अपोह' या अन्योन्याभाव रूप 'तद्भिन्न भिन्नत्व' ही
है । इसलिए सामान्य के अर्थ न होने से सामान्य विषयक सविकल्पक ज्ञान
भी 'अर्थज' नहीं है, अतः उसको प्रत्यक्ष नहीं कह सकते हैं । यह बौद्धों का
पूर्वपक्ष है जिसको ग्रन्थकार आगे प्रस्तुत करते हैं—
[ प्रश्न ] निर्विकल्पक वस्तुतः स्वलक्षण अर्थात् वस्तु मात्र विषयक
[ और उससे उत्पन्न ] होने से भले ही प्रत्यक्ष हो [ जाय ] परन्तु सविकल्पक तो
शब्द और अनुमान के समान अनुगत आकार [ सामान्य ] का ग्राहक होने से
सामान्य विषयक होने से कैसे प्रत्यक्ष [ कहलाने योग्य ] होगा 'अर्थज' के ही
प्रत्यक्ष होने और वास्तव में विद्यमान अर्थ के ही उस [ प्रत्यक्ष ] के जनक होने
से [ सामान्य विषयक सविकल्पक ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता है । ] स्वलक्षण

७० तर्कभाषा [ प्रत्यक्षे बौद्धमतम्
मैवम्। सामान्यस्यापि वस्तुभूतत्वात् ।
तदेवं व्याख्यातं प्रत्यक्षम् ।
[ अर्थात् वस्तुमात्र ] तो परमार्थतः सत् है किन्तु सामान्य [ परमार्थ सत् ] नहीं ।
उसकी विधि रूपता [ भाव रूपता ] का प्रमाणों से खण्डन हो जाने से और
अतद्व्यावृत्ति रूप [ अभाव रूप ] तुच्छ होने से । [ सामान्य विषयक सविकल्पक
ज्ञान को अर्थज न होने से प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता है । ]
यह बौद्ध का पूर्वपक्ष हुआ, इसका उत्तर बहुत संक्षेप में अगली एक पंक्ति
में यह दिया है कि सामान्य भी भावभूत पदार्थ है । इसका अभिप्राय यह है कि
घटादि में जो अनुगत प्रतीति होती है इसका उपपादन करना आवश्यक है ।
इसके उपपादन करने के लिये बौद्ध जो 'अतद्व्यावृत्ति' रूप 'अपोह' का
अवलम्बन करते हैं वह बड़ा वक्रमार्ग है । साधारणतः दश घट व्यक्तियों को
देखने पर देखने वाले के मन में उनकी समानता ही प्रतीति होती है ।
'अतद्व्यावृत्ति' या अघटभिन्नत्व प्रतीत नहीं होता । अतएव इस एकाकार
प्रतीति का कारण भावभूत सामान्य को ही मानना चाहिए, 'अपोह' को नहीं ।
हमने अपनी दर्शनमीमांसा में इस विषय को इस प्रकार लिखा है—
वस्तुमात्रावगाहि यत् प्रत्यक्षं निर्विकल्पकम् ।
तत्तु बौद्धमते सिद्धं सविकल्पं न सम्मतम् ॥
सामान्यं तुच्छरूपत्वादर्थो नैव यतो भवेत् ।
तद्विषयमतो ज्ञेयं सविकल्पं न चार्थजम् ॥
न चैकाकारबुद्ध्यापि सामान्यं संप्रसिद्ध्यति ।
यतोऽनुवृत्तिबुद्धिः सा त्वपोहादेव जायते ॥
भावभूतो न चापोहोऽतद्व्यावृत्तिरूपतः ।
तच्च तद्भिन्नभिन्नत्वमभावरूपतो मतम् ॥
अत्र तद्भिन्नभिन्नत्वेऽनुवृत्तिबुद्धिहेतुता ।
या मता सातिवक्रत्वाद् वस्तुतो नोपयुज्यते ॥
भावभूतमतो ज्ञेयं सामान्यं तत्र कारणम्
अर्थवत्वादतो नूनं प्रत्यक्षं सविकल्पकम् ॥
[ उत्तर ] सामान्य के भी वस्तुभूत होने से यह ठीक नहीं है ।
इस प्रकार प्रत्यक्ष की व्याख्या हो गई ।
१ दर्शनमीमांसा ४ ।

अनुमानम् ] अनुमाननिरूपणम् ७१
अनुमानम्
लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम् । येन हि अनुमीयते तदनुमानम् । लिङ्गपरा-
मर्शेन चानुमीयतेऽतो लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम् । तच्च धूमादिज्ञानमनुमितिं
अनुमानम् ।
प्रत्यक्ष के बाद दूसरा स्थान 'अनुमान' प्रमाण का है । अनुमान
शब्द का अर्थ 'मितेन लिङ्गेन अर्थस्य अनु पश्चान्मानमनुमानम्'¹ इस
प्रकार वात्स्यायन भाष्य में किया गया है । अर्थात् प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञात
लिङ्ग द्वारा अर्थ के अनु अर्थात् पीछे से उत्पन्न होने वाले ज्ञान को
अनुमान कहते हैं । यह तो अनुमान शब्द की निरुक्ति या व्युत्पत्ति हुई और
उससे वस्तुतः अनुमान प्रमाण के फल 'अनुमिति' का ज्ञान होता है ।
परन्तु अनुमान प्रमाण का लक्षण 'लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम्' अर्थात् 'लिङ्ग' के
'परामर्श' को 'अनुमान' कहते हैं यह किया गया है । इस लक्षण में 'लिङ्ग'
और 'मरामर्श' दो शब्द हैं । इनके स्पष्टीकरण के बिना लक्षण स्पष्ट नहीं हो
सकता है । अतएव 'लिङ्ग' और 'परामर्श' इन दोनों का अर्थ स्पष्ट करना
चाहिए । लिङ्ग' का लक्षण है 'व्याप्तिबलेन अर्थगमकं लिङ्गम्' । अर्थात् व्याप्ति
बल से जो अर्थ का बोधक है उसको लिङ्ग कहते हैं । इस लक्षण में फिर एक
'व्याप्ति' शब्द नया आ गया है। अतः उसकालक्षण करना आवश्यक हो गया ।
व्याप्ति का अर्थ है 'साहचर्य नियम' । 'यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्निः' जहां जहां धुंआ
होता है वहां वहां अग्नि होती है इस साहचर्य नियम को व्याप्ति कहते हैं । इस
व्याप्ति के बल से जो अर्थ का बोधक हो उसको 'लिङ्ग' कहते हैं । जैसे धूम
वह्नि का लिङ्ग है । पर्वतादि पर धूम को देख कर जहां जहां धुंआ होता है
वहां वहां वह्नि होती है इस साहचर्य नियम या व्याप्ति के आधार पर अप्रत्यक्ष
वह्नि का ज्ञान होता है। इसलिए धूम वह्नि का लिङ्ग कहलाता है। लिङ्ग शब्द की
निरुक्ति या व्युत्पत्ति 'लीनम् अप्रत्यक्षं अर्थं गमयति इति लिङ्गम्' यह की गई है।
इस प्रकार 'लिङ्ग' का लक्षण हो जाने के बाद दूसरा शब्द 'परामर्श' रह
जाता है । परामर्श के अर्थ दो प्रकार से किए जाते हैं। 'लिङ्गस्य तृतीयं ज्ञानं
परामर्शः' या 'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं परामर्शः' । अर्थात् लिङ्ग के तृतीय
ज्ञान को 'परामर्श' कहते हैं अथवा 'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञान' को 'परामर्श'
कहते हैं । इसका उपपादन आगे करेंगे ।
लिङ्गपरामर्श को अनुमान कहते हैं । जिस से अनुमिति [ अनु पश्चान्मितिः,
प्रमितिः ] हो उसको अनुमान कहते हैं । और लिङ्ग के परामर्श से अनुमिति होती
१ न्यायदर्शन वात्स्यायन भाष्य १, १, ३ ।

७२ तर्कभाषा [ उपाधिलक्षणम्

प्रति करणत्वात् । अग्न्यादिज्ञानमनुमितिः । तत्करणं धूमादिज्ञानम् ।
किं पुनर्लिङ्गं कश्च तस्य परामर्शः ?
उच्यते । व्याप्तिबलेनार्थगमकं लिङ्गम् । यथा धूमोऽग्नेर्लिङ्गम् । तथाहि
यत्र धूमस्तत्राग्निरिति साहचर्यनियमो व्याप्तिः। तस्यां गृहीतायामेव व्याप्तौ
धूमोऽग्निं गमयति । अतो व्याप्तिबलेनाग्न्यनुमापकत्वाद् धूमोऽग्नेर्लिङ्गम् ।
तस्य तृतीयं ज्ञानं परामर्शः । तथाहि प्रथमं तावन्महानसादौ भूयो
भूयो धूमं पश्यन् वह्निं पश्यति । तेन भूयो दर्शनेन धूमाग्न्योः स्वाभाविकं
सम्बन्धमवधारयति, यत्र धूमस्तत्राग्निरिति ।
है इसलिए लिङ्गपरामर्श को अनुमान कहते हैं । और वह [लिङ्गपरामर्श]
धूमादि ज्ञान [रूप] है अनुमिति प्रति करण होने से । अग्नि आदि का ज्ञान अनु-
मिति है । उसका करण धूमादि ज्ञान है । [अतः धूमादि ज्ञान अग्नि आदि ज्ञान
का करण होने से अनुमान है ]
[प्रश्न] फिर लिङ्ग' किस को कहते हैं और उसका 'परामर्श' क्या है ?
[उत्तर] कहते हैं । व्याप्ति के बल से [जो] अर्थ का बोधक [हो वह]
'लिङ्ग' [कहलाता] है। जैसे धूम अग्नि का लिङ्ग है। क्योंकि, जहां धूम होता
है वहां अग्नि होती है इस साहचर्य नियम को व्याप्ति कहते हैं । उस व्याप्ति के
ग्रहण होने पर ही धूम अग्नि का ज्ञापक होता है इसलिए व्याप्ति के बल से अग्नि
का अनुमापक होने से धूम अग्नि का लिङ्ग होता है ?
उस [धूमरूप लिङ्ग] का तृतीय ज्ञान 'परामर्श' कहलाता है। जैसे पहिले
रसोई घर आदि में बार बार धूम को देख कर वह्नि को देखता है। [अर्थात्
धूम और वह्नि का भूयः अनेक बार सहचार दर्शन होता है ] उस 'भूयः सहचार
दर्शन' से धूम और अग्नि के स्वाभाविक सम्बन्ध [व्याप्ति] को निश्चय करता है
कि जहां जहां धूम होता है वहां अग्नि होती है [इस प्रकार की धूम और वह्नि
की व्याप्ति का निश्चय करता है।]
जितने बार के दर्शन से इस स्वाभाविक सम्बन्ध या 'व्याप्ति' का निश्चय होता
है । वह सब मिल कर धूम का 'प्रथम दर्शन' कहा जायगा । 'व्याप्ति' ग्रहण के
बाद जो पर्वतादि में धूम का दर्शन होता है उसको द्वितीय दर्शन समझना चाहिए।
उस द्वितीय दर्शन से पूर्वगृहीत धूम और अग्नि की व्याप्ति का स्मरण हो आता
है । इस 'व्याप्ति स्मृति' के बाद 'वह्निव्याप्य धूमवांश्चायं पर्वतः' इस प्रकार का
ज्ञान होता है इसी को 'तृतीय ज्ञान' कहते हैं। यही अनुमिति के प्रति करण
होने से 'अनुमान' कहा जाता है। इसी 'तृतीय ज्ञान' के बाद 'तस्मात् पर्वतो
वह्निमान्' इसलिए पर्वत वह्नि युक्त है यह अनुमिति हो जाती है । इसलिए

उपाधिलक्षणम् ] अनुमाननिरूपणम् ७३
'वह्निव्याप्यधूमवांश्चायं पर्वतः' यह तृतीय ज्ञान ही वह्नि ज्ञान के प्रति 'करण'
है और इसी को 'अनुमान' कहते हैं ।
इस तृतीय ज्ञान के दो अंश हैं एक अंश 'व्याप्ति' को सूचित करता है
और दूसरा 'पक्ष धर्मता' को । 'वह्निव्याप्य' इतने अंश से व्याप्ति सूचित होती
है और 'धूमवांश्च पर्वतः' इस अंश से धूम का पर्वत रूप पक्ष में अस्तित्व
प्रतीत होता है । इसको 'पक्षधर्मता' ज्ञान कहते हैं । इस प्रकार अनुमान के
मुख्य दो अंश होते हैं, एक 'व्याप्ति' और दूसरा 'पक्षधर्मता' । 'वह्निव्याप्यधू-
मवांश्च पर्वतः' इस तृतीय ज्ञान में यह दोनों अंश प्रतीत होते हैं । इसलिए
इस 'तृतीय ज्ञान' को 'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञान' भी कह सकते हैं । इसलिए
'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं परामर्शः' 'और लिङ्गस्य तृतीयं ज्ञानं परामर्शः'
यह दोनों ही 'परामर्श' के लक्षण कहे जाते हैं । 'लिङ्गपरामर्शो अनुमानम्'
'लिङ्गस्य तृतीयं ज्ञानं परामर्शः' । लिङ्ग का 'तृतीय ज्ञान' अथवा 'व्याप्तिविशिष्ट-
पक्षधर्मताज्ञान' रूप 'परामर्श' ही 'अनुमान' कहलाता है । इसमें से धूम और
वह्नि के जितने बार के 'सहचारदर्शन' से 'व्याप्ति' का निश्चय होता है, वह सब
मिलकर प्रथम ज्ञान कहलाता है, इस प्रकार प्रथम ज्ञान तो यहाँ दिखा दिया
है और द्वितीय, तृतीय ज्ञान का वर्णन आगे चल कर करेंगे ।
'व्याप्ति' का ग्रहण 'भूयः सहचार दर्शन' से होता है और 'व्याप्ति' 'स्वाभाविक
सम्बन्ध' होता है ये दो बातें प्रतिपादित की हैं । इस पर यह शङ्का करते हैं कि
सर्वत्र 'भूयः सहचार दर्शन' से 'स्वाभाविक सम्बन्ध' का निश्चय नहीं होता है ।
जैसे 'जहाँ-जहाँ धूम है वहाँ-वहाँ वह्नि है' यह तो स्वाभाविक सम्बन्ध है, और
व्याप्ति ठीक है। परन्तु इसको यदि उलटा करके यों कहा जाय कि 'यत्र यत्र वह्नि-
स्तत्र तत्र धूमः' 'जहाँ-जहाँ वह्नि है वहाँ-वहाँ धूम है' तो इनका भूयः सहचार
दर्शन होने पर भी यह 'स्वाभाविक सम्बन्ध' या 'व्याप्ति' नहीं होगा। क्योंकि यदि
लोहे के एक गोले को गर्म कर दिया जाय तो उसमें अग्नि तो होती है परन्तु धूम
नहीं होता । इसलिए 'यत्र यत्र वह्निस्तत्र तत्र धूमः' यह स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं
अपितु 'औपाधिक' सम्बन्ध कहलाता है। इसमें 'आर्द्र इन्धन संयोग' 'उपाधि' है।
'उपाधि' का लक्षण है 'साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वमुपाधिः' ।
जो धर्म साध्य का व्यापक हो और साधन का अव्यापक हो उसको 'उपाधि'
कहते हैं । जैसे यदि कोई यह अनुमान बनावे कि 'अयोगोलकं धूमवत् वह्नेः'
लोहे का गोला वह्नियुक्त होने से धूमवान् है तो इस अनुमान में धूम 'साध्य' है,
वह्नि 'साधन' है, और 'आर्द्वेन्धनसंयोग' को यहाँ उपाधि कहा है । यह

७४ तर्कभाषा [ उपाधिलक्षणम्
'आर्द्रेन्धन संयोग' रूप धर्म, साध्य जो धूम है, उसका व्यापक है । अर्थात्
जहाँ-जहाँ धूम होता है वहाँ-वहाँ आर्द्रेन्धन संयोग अवश्य होता है । यह
'साध्यव्यापकत्व' हुआ । इसके विपरीत 'आर्द्रेन्धन संयोग' साधनभूत धर्म वह्नि
का व्यापक नहीं है । अर्थात् जहाँ-जहाँ वह्नि हो वहाँ-वहाँ 'आर्द्रेन्धन संयोग' का
होना आवश्यक नहीं है । जैसे इसी अयोगोलक ( लोहे के गोले ) में अग्नि तो
है परन्तु 'आर्द्रेन्धन संयोग' नहीं है । यह 'साधनाव्यापकत्व' हुआ । इस प्रकार
'आर्द्रेन्धन संयोग' में 'साध्यव्यापकत्व' और 'साधनाव्यापकत्व' दोनों अंश घट
जाने से उसमें 'उपाधि' का पूरा लक्षण घट जाता है । इसलिए यह हेतु
'सोपाधिक' है । अर्थात् 'यत्र यत्र वह्निस्तत्र तत्र धूमः' यह सम्बन्ध स्वाभाविक
नहीं औपाधिक है ।
'औपाधिक सम्बन्ध' का दूसरा उदाहरण यह है कि कोई 'मैत्री' नामक स्त्री
व्यक्ति है । उसके पाँच पुत्र हैं, जिनमें से चार को हमने देखा है और वह सब
श्याम वर्ण के हैं। पाँचवें पुत्र को हमने नहीं देखा है किन्तु वह गौर वर्ण का
है। परन्तु जिसने मैत्री के चार पुत्रों में श्यामत्व देखा है वह उस 'भूयः सहचार दर्शन'
के आधार पर 'मैत्रीतनयत्व' और 'श्यामत्व' का 'स्वाभाविक सम्बन्ध' अथवा
व्याप्ति मान कर उस न देखे हुए पाँचवें पुत्र में भी श्यामत्व का अनुमान 'सः
श्यामः मैत्रीतनयत्वात् परिदृश्यमानमैत्रीतनयस्तोमवत्' इस प्रकार कर सकता
है। यहाँ 'मैत्रीतनयत्वात्' हेतु 'श्यामत्व' की सिद्धि के लिए दिया गया है ।
परन्तु यह हेतु 'सोपाधिक' है । इस में 'शाक-पाक जन्यत्व' रूप 'उपाधि'
विद्यमान है । अर्थात् 'श्यामत्व' का प्रयोजक 'मैत्रीतनयत्व' नहीं अपितु 'शाक-
पाक-जन्यत्व' है । इस प्रयोजक को ही उपाधि कहते हैं । उपाधि का लक्षण
'साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वम्' है । वह 'शाक-पाक-जन्यत्व' में पूर्ण
रूप से घट जाता है । यहाँ साध्य श्यामत्व और साधन मैत्रीतनयत्व है ।
'शाकपाकजन्यत्वं' साध्य रूप श्यामत्व का व्यापक है । यत्र यत्र श्यामत्वं तत्र
तत्र शाकपाकजन्यत्वं' यह साध्यव्यापकत्व हुआ ।
'शाक-पाक-जन्यत्व' का अभिप्राय यह है कि बालक के गौर और श्याम
वर्ण पर गर्भ काल में किए गए माता के आहार का प्रभाव पड़ता है । यदि माता
दुग्ध, दधि आदि पदार्थों का अधिक सेवन करती है तो बालक गौर वर्ण का होता
है । इसके विपरीत यदि गर्भ काल में माता हरे शाक आदि का अधिक सेवन
करती है तो बालक का वर्ण श्याम होता है । अर्थात् श्यामत्व का प्रयोजक या
कारण 'मैत्रीतनयत्व' नहीं अपितु 'शाकपाकजन्यत्व' है । जहाँ-जहाँ 'शाक-पाक-
जन्यत्व' होता है वहाँ-वहाँ श्यामत्व अवश्य होता है यह साध्य-व्यापकत्व हुआ ।

उपाधि निरूपणम् ] अनुमाननिरूपणम् ७५
यद्यपि यत्र यत्र मैत्रीतनयत्वं तत्र तत्र श्यामत्वमपीति भूयो दर्शनं
समानमवगम्यते, तथापि मैत्रीतनयत्वश्यामत्वयोर्न स्वाभाविकः सम्बन्धः
किन्तूपाधिक एव । शाकाद्यन्नपरिणामस्योपाधेर्विद्यमानत्वात् ।
तथा हि श्यामत्वे मैत्रीतनयत्वं न प्रयोजकं किन्तु शाकाद्यन्नपरिणति-
भेद एव प्रयोजकः । प्रयोजकश्चोपाधिरित्युच्यते ।
न च धूमाग्न्योः सम्बन्धे कश्चिदुपाधिरस्ति । अस्ति चेत्, यो-
परन्तु जहां जहां मैत्रीतनयत्व होता है वहां वहां 'शाक-पाक-जन्यत्व' अवश्य
हो यह आवश्यक नहीं है । माता गर्भ-काल में शाकादि के स्थान पर दुग्ध
आदि का सेवन करे यह भी हो सकता है । ऐसी दशा में 'यत्र यत्र मैत्रीतनयत्वं
तत्र तत्र शाक-पाक-जन्यत्वं' यह आवश्यक न होने से साधनाव्यापकत्व हुआ ।
इस प्रकार 'शाक-पाक-जन्यत्व' रूप 'उपाधि' के वर्तमान होने से 'मैत्री तन-
यत्व' और श्यामत्व का स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं है अपितु औपाधिक सम्बन्ध है।
इससे यह सिद्ध हुआ कि यद्यपि 'भूयः सहचार दर्शन' से स्वाभाविक
सम्बन्ध अथवा व्याप्ति का निश्चय होता है परन्तु जहां एक भी स्थल में उनके
सहचार का अभाव अथवा व्यभिचार का ग्रहण हो जाता है वहां वह 'भूयः
सहचार दर्शन' भी व्यर्थ हो जाता है और वह उनके स्वाभाविक सम्बन्ध का बोध
नहीं करा सकता है । इसलिए केवल 'भूयः सहचार दर्शन' ही व्याप्ति ग्राहक
नहीं है अपितु उसके साथ व्यभिचार का अदर्शन होना भी आवश्यक है ।
अर्थात् 'व्यभिचारादर्शनसहकृत भूयः सहचार दर्शन' व्याप्ति का ग्राहक होता
है । भूयः सहचार दर्शन होते हुए मैत्रीतनयत्व और श्यामत्व का उपाधि स्थल
में व्यभिचार दर्शन हो जाने से व्याप्ति सिद्ध नहीं हो सकती । अतः उनका
स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं है । यही आगे कहते हैं ।
यद्यपि जहां जहां मैत्रीतनयत्व है वहां वहां श्यामत्व भी है इस प्रकार [मैत्री-
तनयत्व और श्यामत्व का भूयःसहचार मैत्री के चार पुत्रों में, धूम और वह्नि के
भूयः सहचार दर्शन के समान] भूयो दर्शन समान रूप से प्रतीत होता है । फिर
भी मैत्रीतनयत्व और श्यामत्व का स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं है अपितु औपाधिक
[ सम्बन्ध ] ही है । शाकादि अन्न परिणाम रूप उपाधि के विद्यमान होने से ।
क्योंकि श्यामत्व का प्रयोजक मैत्रीतनयत्व नहीं है किन्तु शाकादि अन्न परिणाम
ही [ श्यामत्व में ] प्रयोजक है । प्रयोजक को ही उपाधि कहते हैं ।
[ प्रकृत में ] धूम और अग्नि के सम्बन्ध में कोई उपाधि नहीं है । [ इसलिए
उनका सम्बन्ध स्वाभाविक सम्बन्ध अथवा व्याप्ति है । यदि यह कहो कि धूम और
अग्नि के सम्बन्ध में भी कोई उपाधि है तो प्रश्न यह होगा कि ] यदि [ धूम और

७६ तर्कभाषा [ उपाधिनिरूपणम्
ग्योऽयोग्यो वा । अयोग्यस्य शङ्कितुमशक्यत्वात्, योग्यस्य चानुपल-
भ्यमानत्वात् । यत्रोपाधिरस्ति तत्रोपलभ्यते । यथाग्नेर्धूमसम्बन्धे
आर्द्वेन्धनसंयोगः । हिंसात्वस्य चाधर्मसाधनत्वेन सह सम्बन्धे निषिद्ध-
त्वमुपाधिः । मैत्रीतनयत्वस्य च श्यामत्वेन सह सम्बन्धे शाकाद्यन्न-
परिणतिभेदः ।
न चेह धूमस्याग्निसहचर्ये कश्चिदुपाधिरस्ति । यद्यभविष्यत्ततोऽद्रक्ष्यत्,
ततो दर्शनाभावान्नास्ति । इति तर्कसहकारिणानुपलम्भसनाथेन । प्रत्य-
क्षेणैवोपाध्यभावोऽवधार्यते । तथा च उपाध्यभावग्रहणजनितसंस्कारसह-
कृतेन साहचर्यग्राहिणा प्रत्यक्षेणैव धूमाग्न्योर्व्याप्तिरवधार्यते। तेन धूमाग्न्योः
स्वाभाविक एव सम्बन्धो न त्वौपाधिकः । स्वाभाविकश्च सम्बन्धो व्याप्तिः ।
अग्नि के सम्बन्ध में कोई उपाधि ] है तो [ वह उपाधि प्रत्यक्ष होने के ] योग्य है
अथवा अयोग्य । [ यदि प्रत्यक्ष होने के अयोग्य उपाधि है, यह कहना चाहें तो
ठीक नहीं है क्योंकि ] अयोग्य [ है तो उस ] की शङ्का करना भी उचित नहीं
[ जिस उपाधि का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है वह है ही इस में क्या प्रमाण होगा ।
इसलिए उसकी शङ्का भी करना अनुचित है । अर्थात् अयोग्य उपाधि है यह नहीं
कह सकते । ] और [ प्रत्यक्ष के ] योग्य [ उपाधि ] की उपलब्धि नहीं होती ।
[ यत्र यत्र वह्निस्तत्र तत्र धूमः इत्यादि स्थलों में ] जहाँ [ आर्द्वेन्धन संयोग आदि
रूप ] उपाधि है वहाँ उपलब्ध होती है जैसे १ अग्नि के धूम के साथ [ यत्र यत्र
अग्निस्तत्र तत्र धूमः ] इस सम्बन्ध में आर्द्वेन्धन संयोग [ उपाधि है तो वह उप-
लब्ध भी होती है ] और २ हिंसात्व के अधर्म साधनत्व के साथ सम्बन्ध में
निषिद्धत्व उपाधि है और ३ मैत्रीतनयत्व के श्यामत्व के साथ [ यत्र यत्र मैत्री-
तनयत्वं तत्र तत्र श्यामत्वं ] इस सम्बन्ध में शाकादि अन्न परिणाम भेद [ शाक-
पाक-जन्यत्व उपाधि है और उपलब्ध होती है ]
यहाँ धूम के अग्नि के साथ साहचर्य में कोई उपाधि नहीं है । यदि होती तो
दिखाई देती । दिखाई नहीं देती अतः नहीं है । इस प्रकार तर्क सहकृत और
अनुपलब्धियुक्त प्रत्यक्ष से ही उपाधि का अभाव निश्चय होता है । इसलिए उपाधि
के अभाव के ज्ञान से उत्पन्न संस्कार से सहकृत और भूयः सहचार दर्शन जन्य
संस्कार के सहकृत [ धूम तथा अग्नि के ] साहचर्य को ग्रहण कराने वाले प्रत्यक्ष
[प्रमाण] से ही धूम और अग्नि की व्याप्ति गृहीत होती है । इसलिए धूम और अग्नि
का स्वाभाविक सम्बन्ध ही है औपाधिक नहीं । और स्वाभाविक सम्बन्ध [को ही]
व्याप्ति [ कहते ] हैं ।

लिङ्गपरामर्शः ] अनुमाननिरूपणम् ७७
तदनेन न्यायेन धूमाग्न्योर्व्याप्तौ गृह्यमाणायां, महानसे यद्धूमज्ञानं
तत्प्रथमम् । पर्वतादौ पक्षे यद्धूमज्ञानं तद्द्वितीयम् । ततः पूर्वगृहीतां
धूमाग्न्योर्व्याप्तिं स्मृत्वा यत्र धूमस्तत्राग्निरिति तत्रैव पर्वते पुनर्धूमं परा-
मृशति । अस्त्यत्र पर्वते वह्निना व्याप्तो धूम इति । तदिदं धूमज्ञानं तृतीयम् ।
एतच्चावश्यमभ्युपेतव्यम् । अन्यथा यत्र धूमस्तत्राग्निरित्येव स्यात् ।
इह तु कथमग्निना भवितव्यम् । तस्मादिहापि धूमोऽस्ति इति ज्ञानमन्वे-
षितव्यम् । अयमेव लिङ्गपरामर्शः । अनुमिति प्रति करणत्वाच्चानुमानम् ।
तस्मात्, अस्त्यत्र पर्वतेऽग्निरित्यनुमितिज्ञानमुत्पद्यते ।
ननु कथं प्रथमं महानसे यद्धूमज्ञानं तन्नाग्निमनुमापयति ?
इसलिए, इस प्रकार से [ व्यभिचारादर्शन सहकृत भूयः सहचार दर्शन से ]
धूम और अग्नि की व्याप्ति के ग्रहण में महानस [ रसोई घर ] में जो [ जितनी
बार सहचार दर्शन से व्याप्तिग्रह हो, उतनी बार का सम्मिलित ] धूमज्ञान है वह
प्रथम [ ज्ञान है, इस व्याप्तिग्रह के बाद ] पर्वतादि रूप पक्ष [ 'सन्दिग्धसाध्य-
वान् पक्षः' जिस पर्वतादि में साध्य वह्नि संदिग्ध अवस्था में है उसको 'पक्ष' कहते
हैं ] में जो धूम का ज्ञान है वह द्वितीय [ ज्ञान है ], उस [ पर्वतादि में द्वितीय
धूम दर्शन ] से, पूर्व गृहीत धूम और अग्नि की 'जहाँ धूम होता है वहीं वह्नि
होती है इस 'व्याप्ति' को स्मरण कर उसी पर्वत में [ वह्नि व्याप्ति विशिष्ट ] धूम का
फिर [ 'वह्निव्याप्यधूमवांश्चायं पर्वत.' इस रूप में ] परामर्श करता है । इस पर्वत
में वह्नि के साथ व्याप्त धूम है। यह [ वह्नि व्याप्य धूमवांश्चायं पर्वतः इस प्रकार
का ] धूम ज्ञान, तृतीय ज्ञान [ लिङ्ग परामर्श रूप ] है । [ इसी को 'लिङ्गपरामर्श'
तथा 'अनुमान' कहते हैं। उसी से 'पर्वतो वह्निमान्' यह 'अनुमिति' होती है ]
इस [ तृतीय ज्ञान ] को अवश्य मानना होगा । अन्यथा जहां धूम
होगा वहाँ अग्नि होगी यह [ सामान्य ज्ञान ] ही होगा । यहां [ पर्वत रूप स्थल
विशेष में ] अग्नि क्यों होनी चाहिए । इस [ के उपपादन के ] लिए यहाँ [पर्वत में]
भी धूम है इस प्रकार का ज्ञान मानना चाहिए । यही [ पर्वत में व्याप्तिस्मृति के
बाद हुआ धूम का परामर्श ] लिङ्ग का परामर्श [ कहलाता ] है और [ 'तस्मात्
पर्वतो वह्निमान्' इस प्रकार की ] अनुमिति के प्रति करण होने से अनुमान
[ कहलाता ] है । क्योंकि उस [ लिङ्ग परामर्श रूप तृतीय ज्ञान ] से इस पर्वत में
अग्नि है इस प्रकार का अनुमिति रूप ज्ञान उत्पन्न होता है ।
[ प्रश्न ] अनुमिति के लिए तृतीय ज्ञान तक क्यों जाते हैं । महानस में जो
प्रथम [ बार का ] धूमज्ञान ज्ञान है उसी से अग्नि का अनुमान क्यों नहीं हो
जाता है ?

७८ तर्कभाषा [ तृतीयं ज्ञानम्
सत्यम् । व्याप्तेरगृहीतत्वात् । गृहीतायामेव व्याप्तावनुमित्युदयात् ।
अथ व्याप्तिनिश्चयोत्तरकालं महानस एवाग्निरनुमीयताम् ।
मैवम् । अग्नेर्दृष्टत्वेन सन्देहस्यानुदयात् । सन्दिग्धश्चार्थोऽनुमीयते ।
यथोक्तं भाष्यकृता । 'नानुपलब्धे न निर्णीतेऽर्थे न्यायः प्रवर्तते किन्तु सन्दिग्धे' ।
अथ पर्वतगतमात्रस्य पुंसो यद्धूमज्ञानं, तत् कथं नाग्निमनुमापयति?
अस्ति चात्राग्निसन्देहः । साधकबाधकप्रमाणाभावेन संशयस्य न्याय-
प्राप्तत्वात् ।
सत्यम् । अगृहीतव्याप्तेरिव गृहीतविस्मृतव्याप्तेरपि पुंसोऽनुमानानु-
[ उत्तर ] आपका प्रश्न ठीक है । [ परन्तु ] व्याप्ति का ग्रहण न होने से
[ प्रथम बार के धूमज्ञान से अग्नि का अनुमान नहीं हो सकता है [ क्योंकि ]
व्याप्ति के गृहीत होने पर ही अनुमिति का उदय हो [ सकने ] ने से । प्रथमज्ञान
से अनुमिति नहीं होती ]
[ प्रश्न ] अच्छा तो व्याप्ति के ग्रहण होने के पश्चात् महानस में ही अग्नि का
अनुमान होना चाहिए ।
[ उत्तर ] यह [ कहना भी ] ठीक नहीं है । [ क्योंकि महानस में ] अग्नि
के प्रत्यक्ष होने से सन्देह का उदय न होने से [ व्याप्तिग्रह के बाद महानस में
अग्नि का अनुमान नहीं हो सकता है ] । और सन्दिग्ध अर्थ का ही अनुमान
होता है । जैसा कि [ न्याय दर्शन के ] भाष्यकार [ वात्स्यायन ] ने कहा है
[ कि सर्वथा ] अनुपलब्ध [ अर्थात् अज्ञात ] अर्थ [ के विषय ] में न्याय
[ अर्थात् अनुमान ] की प्रवृत्ति नहीं होती । और न [ सर्वथा ] निर्णीत अर्थ
में न्याय प्रवृत्त होता है किन्तु सन्दिग्ध अर्थ में [ ही न्याय अर्थात् अनुमान की
प्रवृत्ति होती है । ]
[ प्रश्न ] अच्छा [ व्याप्तिग्रह के बाद ] पर्वत में पहुँचे हुए मनुष्य का जो
धूम ज्ञान [ अर्थात् व्याप्ति स्मृति के पूर्व का, द्वितीय ज्ञान ] वह अग्नि का अनुमान
क्यों नहीं कराता ? यहाँ अग्नि का सन्देह तो है । [ क्योंकि अग्नि के ] साधक
अथवा बाधक प्रमाण के अभाव में सन्देह होना उचित ही है ।
[ उत्तर ] [ आपका प्रश्न ] ठीक है । [ परन्तु द्वितीय ज्ञान के समय व्याप्ति
की स्मृति न होने से ] अगृहीत व्याप्तिक पुरुष के समान [ गृहीत होने पर भी
जिसको व्याप्ति विस्मृत हो गई उस ] गृहीत विस्मृत व्याप्तिक पुरुष को भी अनुमान
को उदय न होने से व्याप्ति स्मृति के भी अनुमिति के प्रति हेतु होने से [ व्याप्ति
न्याय दर्शन वात्स्यायन भाष्य १, १, १,

स्वार्थानुमानम् ] अनुमाननिरूपणम् ७६
दयेन व्याप्तिस्मृतेरप्यनुमितिहेतुत्वात् । धूमदर्शनाच्चोद्बुद्धसंस्कारो व्याप्तिं
स्मरति । यो यो धूमवान् स सोऽग्निमान् यथा महानस इति । तेन
धूमदर्शने जाते व्याप्तिस्मृतौ भूतायां यद्धूमज्ञानं तत् तृतीयं 'धूमवांश्चा-
यम्' इति । तदेवाग्निमनुमापयति नान्यत् । तदेवानुमानम् । स एव
लिङ्गपरामर्शः । तेन व्यवस्थितमेत—ल्लिङ्गपरामर्शोऽनुमानमिति ।
तच्चानुमानं द्विविधम् । स्वार्थं परार्थं चेति । स्वार्थं स्वप्रतिपत्तिहेतुः ।
तथा हि स्वयमेव महानसादौ विशिष्टेन प्रत्यक्षेण धूमाग्न्योर्व्याप्तिं गृहीत्वा-
पर्वतसमीपं गतस्तद्गते चाग्नौ सन्दिहानः पर्वतवर्तिनीमविच्छिन्नमूला-
मभ्रंलिहां धूमलेखां पश्यन् धूमदर्शनाच्चोद्बुद्धसंस्कारो व्याप्तिं स्मरति ।
यत्र धूमस्तत्राग्निरिति । ततोऽत्रापि धूमोऽस्तीति प्रतिपद्यते । तस्मादत्र
पर्वतेऽग्निरप्यस्तीति स्वयमेव प्रतिपद्यते । तत्स्वार्थानुमानम् ।
स्मृति के अभाव में अनुमिति नहीं हो सकती है । अतः [ द्वितीय बार के ] धूम
दर्शन से उद्बुद्ध संस्कार [ पुरुष ] 'जो जो धूमवान् होता है वह वह वह्निमान्
होता है' इस रूप में व्याप्ति को स्मरण करता है । इसलिए धूम दर्शन होने के
बाद व्याप्ति स्मृति होने पर जो धूमज्ञान [होता है] वह तृतीय 'धूमवांश्चायं पर्वतः'
यह पर्वत धूमवान् है इस प्रकार का जो ज्ञान होता है वही अग्नि का अनुमान
कराता है । उससे भिन्न [ प्रथम या द्वितीयादि ] अन्य कोई नहीं । उसी [ तृतीय
ज्ञान ] को 'अनुमान' कहते हैं । वही 'लिङ्ग परामर्श' [ लिङ्ग का तृतीय ज्ञान ]
है । इसलिए 'लिङ्गपरामर्शो अनुमानम्' यह लक्षण स्थिर हुआ ।
अनुमान के भेद—
वह अनुमान स्वार्थ [ अनुमान ] और परार्थ [ अनुमान ] इस प्रकार दो
तरह का है । स्वयं अपने ज्ञान का हेतु [ भूत अनुमान ] स्वार्थानुमान
[ कहलाता ] है । जैसे महानस आदि में विशेष प्रत्यक्ष से स्वयं ही धूम और
अग्नि की व्याप्ति को ग्रहण कर के पर्वत के समीप गया हुआ और पर्वतगत अग्नि
के विषय में [ पर्वत में अग्नि है या नहीं इस प्रकार का ] सन्देह करता हुआ पर्वत
पर विद्यमान अविच्छिन्नमूला धूम की रेखा को देख कर, धूम के दर्शन से
[ संस्कार का उद्बोध हो जाने से ] उद्बुद्ध संस्कार [ वाला पुरुष ], जहाँ धूम
होता है वहाँ अग्नि होती है' इस व्याप्ति को स्मरण करता है । उसके बाद यहाँ
[ पर्वत में ] भी धूम है इस प्रकार [ तृतीय बार पर्वत में वह्नि व्याप्य धूम को ]
जानता है । इसलिए इस पर्वत पर अग्नि भी है इस प्रकार स्वयमेव [ पर्वत पर
अग्नि को ] जान लेता है । वही स्वार्थानुमान है ।

८२ तर्कभाषा [ परार्थानुमानम्
यत्तु कश्चित् स्वयं धूमादग्निमनुमाय परं बोधयितुं पञ्चावयवमनुमान-
वाक्यं प्रयुङ्क्ते तत् परार्थानुमानम् । तद्यथा पर्वतोऽग्निमान्, धूमवत्वात्,
यो यो धूमवान् स सोऽग्निमान्, यथा महानसः, तथा चायं, तस्मात्तथा, इति।
अनेन वाक्येन प्रतिज्ञादिमता प्रतिपादितात् पञ्चरूपोपपन्नाल्लिङ्गात्
परोऽप्यग्निं प्रतिपद्यते । तेनैतत् परार्थानुमानम् ।
अत्र पर्वतस्याग्निमत्वं साध्यं, धूमवत्वं हेतुः। स चान्वयव्यतिरेकी,
अन्वयेन व्यतिरेकेण च व्याप्तिमत्वात् । तथा हि यत्र यत्र धूमवत्वं तत्रा-
ग्निमत्वं यथा महानसे इत्यन्वयव्याप्तिः । महानसे धूमाग्न्योरन्वयसद्भा-
और जो कोई धूम से स्वयं अग्नि का अनुमान करके [ उसी को ] दूसरे को
बोध कराने के लिए पञ्चावयव अनुमान वाक्य का प्रयोग करता है वह परार्थानु-
मान होता है । जैसे [ अञ्चावयव युक्त अनुमान वाक्य के प्रयोग का उदाहरण
देते हैं ] १. यह पर्वत अग्निमान् है [ यह प्रथम अवयव प्रतिज्ञा है ] २. धूम युक्त
होने से [ यह हेतु रूप दूसरा अवयव है ] ३. जो जो धूमयुक्त होता है वह वह
वह्नि युक्त भी होता है जैसे रसोई घर [यह उदाहरण रूप तीसरा अवयव हुआ]
४. यह [ पर्वत ] भी उसी प्रकार का [ धूम युक्त ] है [ यह चौथा अवयव
उपनय रूप हुआ । इसको 'वह्निव्याप्यधूमवांश्चायं' इस रूप से बोलना चाहिए ।
परन्तु संक्षेप में उसको 'तथा चायं' कह कर भी व्यवहार किया जाता है । इसमें
व्याप्ति और पक्षधर्मता दोनों प्रतीति होती हैं। इसलिए इसको 'व्याप्तिविशिष्टपक्ष-
धर्मताज्ञान' या 'लिङ्गपरामर्श' रूप 'अनुमान' भी कहते हैं। क्योंकि इसके बाद
निगमन रूप पञ्चम अवयव ] इस लिए वैसा [ अर्थात् अग्नियुक्त ] है [ इस
प्रकार का ज्ञान हो जाता है जो अनुमिति रूप है । यह पाँचवां अवयव निगमन
कहलाता है ] ।
[ इस प्रकार ] प्रतिज्ञा आदि [ पाँचों अवयवों ] से युक्त इस [ अनुमान ]
वाक्य द्वारा प्रतिपादित [ १ पक्षसत्त्व, २ सपक्षसत्त्व, ३ विपक्षव्यावृत्तत्व,
४ अबाधितविषयत्व और ५ असत्प्रतिपक्षत्व इन आगे कहे जाने वाले ] पाँच
रूपों से युक्त लिङ्ग [ हेतु ] से, दूसरा [ व्यक्ति ] भी अग्नि को जान लेता है ।
इसलिए यह 'परार्थानुमान' [ दूसरे का बोधक अनुमान ] है ।
यहाँ [ इस अनुमान में ] पर्वत का अग्निमत्व साध्य है धूमवत्व हेतु है ।
और वह [ हेतु ] अन्वय व्यतिरेकी [ हेतु ] है । [ क्योंकि उसकी अन्वय और
व्यतिरेक दोनों प्रकार की व्याप्ति में उदाहरण मिल जाते हैं अतः वह ] अन्वय
तथा व्यतिरेक से व्याप्ति युक्त होने से । जैसे कि जहाँ-जहाँ धूमवत्व [ होता है ]
वहाँ-वहाँ अग्निमत्व [ होता है ] जैसे महानस में । यह अन्वय व्याप्ति हुई ।

व्याप्तिक्रमः ] ८१
वात् । एवं यत्राग्निर्नास्ति तत्र धूमोऽपि नास्ति यथा महाह्रदे इतीयं व्यति-
रेकव्याप्तिः । महाह्रदे धूमाग्न्योर्व्यतिरेकस्य सद्भावदर्शनात् ।
व्यतिरेकव्याप्तेस्त्वयं क्रमः । अन्वयव्याप्तौ यद्व्याप्यं तदभावोऽत्र
व्यापकः । यच्च व्यापकं तदभावोऽत्र व्याप्य इति । तदुक्तम्—
व्याप्यव्यापकभावो हि भावयोर्यादृगिष्यते ।
तयोरभावयोस्तस्माद् विपरीतः प्रतीयते ॥
अन्वये साधनं व्याप्यं साध्यं व्यापकमिष्यते ।
तदभावोऽन्यथा व्याप्यो व्यापकः साधनात्ययः ॥
व्याप्यस्य वचनं पूर्वं व्यापकस्य ततः परम् ।
एवं परीक्षिता व्याप्तिः स्फुटीभवति तत्त्वतः १ ॥
महानस [ रसोई घर ] में धूम और अग्नि के सद्भाव होने से । इसी प्रकार जहां
अग्नि नहीं होती है वहाँ धूम भी नहीं होता जैसे महाह्रद [ तालाब ] में । यह
व्यतिरेक व्याप्ति हुई । महाह्रद में धूम और अग्नि के व्यतिरेक [ अभाव ] होने
से । [ वहाँ अग्नि के अभाव में धूम का अभाव होने से व्यतिरेक व्याप्ति होती है ।
इस प्रकार अन्वय व्याप्ति में महानस, और व्यतिरेक व्याप्ति में महाह्रद, यह दोनों
उदाहरण बन जाते हैं अतएव धूमवत्त्व हेतु अन्वयव्यतिरेकी हेतु है ]
व्यतिरेक व्याप्ति [ के बनाने ] का तो यह क्रम है । [ कि ] अन्वयव्याप्ति में
जो व्याप्य [ होता है उसका अभाव यहाँ [ व्यतिरेक व्याप्ति में ] व्यापक [ होता
है ] और जो व्यापक होता है उसका अभाव यहाँ व्याप्य होता है । जैसा कि
[ कुमारिल भट्ट ने अपने श्लोकवार्तिक नामक ग्रन्थ में ] कहा है—
भाव अर्थात् सत्पदार्थों [ धूम और अग्नि ] का जैसा व्याप्य व्यापक भाव
[ धूम अर्थात् साधन व्याप्य और साध्य अर्थात् वह्नि व्यापक ] होता है उनके
अभाव [ अर्थात् वह्न्यभाव और धूमाभाव ] का उसके उल्टा [ वह्न्यभाव व्याप्य
और धूमाभाव व्यापक ] होता है ।
अन्वय [ व्याप्ति ] में साधन [ हेतु ] व्याप्य और साध्य व्यापक होता है ।
उससे भिन्न [ व्यतिरेक व्याप्ति ] में साध्याभाव व्याप्य और साधनाभाव व्यापक
होता है ।
[ व्याप्ति के बोलते समय ] व्याप्य को पहिले [ यत्र यत्र के साथ ] और
व्यापक को उसके बाद [ तत्र तत्र के साथ ] बोलना चाहिए । इस प्रकार भली
प्रकार से परीक्षित हुई व्याप्ति तत्त्वतः स्पष्ट हो जाती है ।
१. श्लोकवार्तिकम् १२१-१२३ ।
६ त० भा०

८२ तर्कभाषा [ अन्वयव्यतिरेकी हेतुः
तदेवं धूमवत्त्वे हेतावन्वयेन व्यतिरेकेण च व्याप्तिरस्ति । यत्तु वाक्ये
केवलमन्वयव्याप्तेरेव प्रदर्शनं तदेकेनापि चरितार्थत्वात् । तत्राप्यन्वय-
स्यावक्रत्वात् प्रदर्शनम् । ऋजुमार्गेण सिद्धयतोऽर्थस्य वक्रेण साधना-
योगात् । न तु व्यतिरेकव्याप्तेरभावात् ।
तदेवं धूमवत्त्वं हेतुरन्वयव्यतिरेकी । एवमन्येऽप्यनित्यत्वाद्यौ साध्ये
कृतकत्वादयो हेतवोऽन्वयव्यतिरेकिणो द्रष्टव्याः । यथा शब्दोऽनित्यः
कृतकत्वादूघटवत् । यत्र कृतकत्वं तत्रानित्यत्वम् । यत्रानित्यत्वाभावस्तत्र
कृतकत्वाभावो यथा गगने ।
इस प्रकार धूमत्व हेतु में अन्वय और व्यतिरेक [ दोनों प्रकार की व्याप्ति में
उदाहरण मिल जाने से दोनों प्रकार ] से व्याप्ति है । [ परन्तु पर्वतो वह्निमान्,
धूमवत्त्वात्, यो यो धूमवान् सोऽग्निमान् यथा महानसः, इत्यादि अनुमान वाक्य
में ] जो केवल अन्वय व्याप्ति का ही प्रदर्शन किया गया है वह एक [ ही प्रकार
की व्याप्ति प्रदर्शन ] से भी काम चल सकता है [ इसलिए किया गया है । ]
उसमें भी [ व्यतिरेक व्याप्ति की अपेक्षा ] अन्वय [ व्याप्ति ] के सरल होने से
[ केवल अन्वय व्याप्ति का ] प्रदर्शन किया गया है । सरल मार्ग से सिद्ध होने वाले
अर्थ को वक्र मार्ग से साधन अयुक्त होने से [ केवल अन्वय व्याप्ति का प्रदर्शन
किया गया है ] न कि व्यतिरेक व्याप्ति के अभाव के कारण [ केवल अन्वय
व्याप्ति का प्रदर्शन किया गया है । ]
इस प्रकार [ अन्वय व्याप्ति में महानस और व्यतिरेक व्याप्ति में महाह्रद
दोनों प्रकार के उदाहरण मिल जाने से ] धूमवत्त्व हेतु अन्वयव्यतिरेकी [हेतु] है।
इसी प्रकार अनित्यत्वादि की सिद्धि में [ प्रयुक्त ] कृतकत्वादि अन्य हेतु भी अन्वय
व्यतिरेकी [ हेतु ही ] समझने चाहिए । जैसे कृतक [ जन्य ] होने से शब्द घट के
समान अनित्य है। जहाँ कृतकत्व [ अर्थात् जन्यत्व ] रहता है वहाँ अनित्यत्व
[भी] रहता है । [ यह अन्वय व्याप्ति हुई और उसका उदाहरण घट है । क्योंकि
घट में कृतकत्व और अनित्यत्व दोनों पाए जाते हैं ] जहाँ अनित्यत्व का अभाव
होता है वहाँ कृतकत्व का [भी] अभाव होता है। जैसे आकाश में [यह व्यतिरेक
व्याप्ति हुई । अन्वय व्याप्ति 'यत् कृतकं तदनित्यम्' में कृतकत्व हेतु व्याप्य है इस
लिए उसका प्रयोग पहिले किया जाता है । व्यतिरेक व्याप्ति बनाने का जो क्रम
अभी दिखाया है उसके अनुसार व्यतिरेकव्याप्ति बनाते समय उन दोनों के साथ
अभाव पद जुड़ जाता है । और उनका 'व्याप्यव्यापकभाव' बदल कर उल्टा हो
जाता है । इसलिए 'यत्र यत्र अनित्यत्वाभावः तत्र तत्र कृतकत्वाभावः' यह व्यतिरेक
व्याप्ति बनती है । और उसका उदाहरण आकाश मिल जाता है । इसलिए यह

केवलव्यतिरेकी हेतुः ] अनुमाननिरूपणम् ८३
कश्चिद्धेतुः केवलव्यतिरेकी । तद्यथा, सात्मकत्वे साध्ये प्राणादिमत्त्वं
हेतुः । यथा जीवच्छरीरं सात्मकं प्राणादिमत्त्वात् । यत् सात्मकं न भवति
तन् प्राणादिमन्न भवति । यथा घटः । न चेदं जीवच्छरीरं तथा तस्मान्न
तथेति । अत्र हि जीवच्छरीरस्य सात्मकत्वं साध्यं, प्राणादिमत्त्वं हेतुः ।
स च केवलव्यतिरेकी, अन्वयव्याप्तेरभावात् । तथाहि यत् प्राणादिमत्
कृतकत्व हेतु दोनों प्रकार की व्याप्ति में उदाहरण मिल जाने से 'अन्वय व्यतिरेकी'
हेतु कहलाता है ]
ऊपर अन्वयव्याप्ति तथा व्यतिरेकव्याप्ति इस प्रकार दो प्रकार की व्याप्ति दिखाई
गई है । इस दो प्रकार की व्याप्ति से 'केवलान्वयी' और 'केवलव्यतिरेकी' तथा
उन दोनों के मेल से तीसरा 'अन्वयव्यतिरेकी' यह तीन प्रकार के हेतु माने गए
हैं । जिसमें अन्वयव्याप्ति तथा व्यतिरेकव्याप्ति दोनों के उदाहरण मिल जावें वह
हेतु अन्वयव्यतिरेकी हेतु कहलाता है । जैसे धूमवत्त्व और कृतकत्व यह दोनों हेतु
अन्वयव्यतिरेकी हेतु हैं यह ऊपर दिखाया जा चुका है । जिस हेतु का अन्वयव्याप्ति
में उदाहरण न मिल सके और केवल व्यतिरेकव्याप्ति में उदाहरण मिले उसको
केवल व्यतिरेकी हेतु कहते हैं । जैसे 'जीवच्छरीरं सात्मकं प्राणादिमत्त्वात्' । इस
अनुमान में प्राणादिमत्त्व हेतु है और सात्मकत्व साध्य है । इन दोनों की अन्वय-
व्याप्ति इस प्रकार बनेगी । 'यत्र यत्र प्राणादिमत्त्वं तत्र तत्र सात्मकत्वम्' । इस
व्याप्ति का उदाहरण कोई जीवित शरीर ही होगा । परन्तु जीवित शरीर सब पक्ष
कोटि के अन्तर्गत हैं । इसलिए अन्वयव्याप्ति में उदाहरण मिलना सम्भव नहीं
है । तब व्यतिरेकव्याप्ति इस प्रकार बनेगी । 'यत्र यत्र सात्मकत्वाभावस्तत्र तत्र
प्राणादिमत्त्वाभावः । इस व्याप्ति में घट-पट आदि सहस्रों उदाहरण मिल सकते
हैं । इसलिए इस अनुमान में केवल व्यतिरेक व्याप्ति में ही उदाहरण सम्भव
होने से यह प्राणादिमत्त्व हेतु 'केवल व्यतिरेकी' हेतु है । यही बात आगे कहते हैं ।
कोई हेतु केवल व्यतिरेकी [ ही होती ] है । जैसे सात्मकत्व के साध्य होने में
प्राणादिमत्त्व हेतु [ केवल व्यतिरेकी हेतु है ] जैसे जीवित शरीर सात्मक है प्राणा-
दियुक्त होने से [इस अनुमानमें] जो सात्मक नहीं होता वह प्राणादि युक्त नहीं होता
[यह व्यतिरेक व्याप्ति हुई इसमें उदाहरण] जैसे घट । और यह जीवित शरीर वैसा
[अर्थात् प्राणादिमत्त्वाभाववत्] नहीं है इसलिये वैसा [अर्थात् सात्मकत्वाभाववत्]
नहीं है [ अर्थात् सात्मक है ] यहाँ [ इस अनुमान में ] जीवित शरीर का सात्म-
कत्व साध्य है और प्राणादिमत्त्व हेतु है, और वह [ हेतु ] अन्वयव्याप्ति [ में
उदाहरण ] के अभाव होने से केवल व्यतिरेकी है । क्योंकि जो प्राणादिमत् है

८४ तर्कभाषा [ केवलव्यतिरेकी हेतुः
तत् सात्मकं यथा अमुक इति दृष्टान्तो नास्ति। जीवच्छरीरं सर्वं
पक्ष एव।
लक्षणमपि केवलव्यतिरेकी हेतुः। यथा पृथिवीलक्षणं गन्धवत्त्वम्।
विवादपदं पृथिवीति व्यवहर्तव्यं, गन्धवत्त्वात्। यन्न पृथिवीति व्यवह्रियते
तन्न गन्धवत् यथापः।
प्रमाणलक्षणं वा। यथा प्रमाकरणत्वम्। तथाहि, प्रत्यक्षादिकं प्रमाण-
मिति व्यवहर्तव्यं प्रमाकरणत्वात्। यत्प्रमाणमिति न व्यवह्रियते तन्न
प्रमाकरणं यथा प्रत्यक्षाभासादि। न पुनस्तथेदं, तस्मान्न तथेति। न
पुनरत्र यत्प्रमाकरणं तत्प्रमाणमिति व्यवहर्तव्यं यथाऽमुक इत्यन्वयदृष्टा-
न्तोऽस्ति, प्रमाणमात्रस्य पक्षीकृतत्वात्।
वह सात्मक है जैसे अमुक इस प्रकार का [ अन्वय [ व्याप्ति का ] दृष्टान्त नहीं
मिलता ] है। [ क्योंकि उदाहरण बन सकने योग्य ] सारे जीवित शरीर पक्ष
[ कोटि में ] ही [ अन्तर्भूत ] हैं।
[ इसी प्रकार ] लक्षण भी [ जब हेतु रूप में प्रयुक्त होते हैं तब वह ] केवल
व्यतिरेकी हेतु होते हैं। जैसे पृथिवी का लक्षण गन्धवत्त्व [ गन्धवती पृथिवी यह
पृथिवी का लक्षण है। उसको हेतु बना कर जब किसी विवादग्रस्त पदार्थ को
पृथिवी सिद्ध करने के लिए ] विवादास्पद [ वस्तु ] को पृथिवी यह [ कह कर ]
व्यवहार करना चाहिये गन्धवत् होने से। जहां पृथिवी यह व्यवहार नहीं होता
है वह गन्धवत् नहीं होता है [ यह व्यतिरेक व्याप्ति हुई और उसमें उदाहरण है ]
जैसे जल। [ परन्तु इसकी अन्वय व्याप्ति 'यत्र यत्र गन्धवत्त्वं तत्र तत्र पृथिवीति
व्यवहारः' में कोई पार्थिव पदार्थ ही उदाहरण हो सकता है। परन्तु पार्थिव
पदार्थ तो सब के सब पक्ष कोटि में हैं अतः अन्वय-व्याप्ति में कोई उदाहरण न
मिलने से और व्यतिरेक व्याप्ति में उदाहरण मिल जाने से यह हेतु केवल
व्यतिरेकी हेतु ही है ]
अथवा प्रमाण का लक्षण जैसे प्रमाकरणत्व [ भी हेतु रूप में प्रयुक्त होने पर
केवल व्यतिरेकी हेतु ही होगा ] जैसे प्रमा का करण होने से प्रत्यक्षादि में प्रमाण
यह व्यवहार करना चाहिए। जिसमें प्रमाण यह व्यवहार नहीं होता है वह प्रमा का
करण नहीं होता है [ यह व्यतिरेक व्याप्ति हुई और उसमें उदाहरण है ] जैसे
प्रत्यक्षाभास आदि। यह [ विवादास्पद प्रत्यक्षादि ] वैसा [ अर्थात् प्रमाण
व्यवहाराभाव युक्त अतएव प्रमाकरणत्वाभाव युक्त ] नहीं है इसलिए वैसा [ प्रमाण
व्यवहाराभाव योग्य ] नहीं है [ अर्थात् प्रमाण व्यवहार योग्य है ] परन्तु यहाँ जो