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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 330 में से

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पृष्ठ 134

प्रत्यक्ष बौद्धमतम् ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ६६
ननु निर्विकल्पकं परमार्थतः स्वलक्षणविषयं भवतु प्रत्यक्षम् । सवि-
कल्पकं तु शब्दलिङ्गवदनुगताकारावगाहित्वात् सामान्यविषयं कथं
प्रत्यक्षमर्थजस्यैव प्रत्यक्षत्वात् । अर्थस्य च परमार्थतः सत एव तज्जनक-
त्वात् । स्वलक्षणन्तु परमार्थतः सत्, न तु सामान्यम् । तस्य प्रमाणनिरस्त-
विधिभावस्य अन्यव्यावृत्त्यात्मनस्तुच्छत्वात् ।
होती है । अतएव सामान्य का कार्य 'अपोह' या 'अतद्व्यावृत्ति' से निकल
सकता है । यह बौद्ध मत है ।
बौद्धों के इस 'अपोह' और न्याय, वैशेषिक के 'सामान्य' या 'जाति' पदार्थ
में अन्तर यह है कि बौद्धों का 'अपोह' 'अतद्व्यावृत्ति' रूप, अभावरूप है
और न्याय का 'सामान्य' भाव रूप । बौद्धों का कहना कि उस अभाव रूप
'अपोह' से ही जब 'अनुवृत्ति प्रत्ययहेतु' रूप 'सामान्य' का कार्य हो सकता
है तो 'सामान्य' को एक अलग पदार्थ मानने की आवश्यकता नहीं है ।
इस प्रकार बौद्ध मत में जाति का मानना न केवल अनावश्यक ही है
अपितु युक्तिसङ्गत भी नहीं है । घट के उत्पन्न होने से पहिले घट के निर्माण
स्थल पर घटत्व 'जाति' नहीं थी । कहीं से आती हुई भी नहीं दीखती ।
फिर घट के बन जाने पर वह घट में कहां से आ जाती है। घट के नष्ट होने
पर वह नष्ट भी नहीं होती और दिखाई भी नहीं देती फिर वह उस समय
कहां चली जाती है। इत्यादि अनेक दोष 'जाति' के मानने में आ जाते हैं
इसलिए भी 'जाति' या 'सामान्य' कोई भावभूत पदार्थ सिद्ध नहीं हो सकता
है । इसलिए उसका मानना उचित नहीं है । और 'अनुवृत्ति प्रत्यय' अर्थात्
एकाकार प्रतीति का कारण भावभूत सामान्य या जाति पदार्थ नहीं अपितु
'अतद्व्यावृत्ति' रूप 'अपोह' या अन्योन्याभाव रूप 'तद्भिन्न भिन्नत्व' ही
है । इसलिए सामान्य के अर्थ न होने से सामान्य विषयक सविकल्पक ज्ञान
भी 'अर्थज' नहीं है, अतः उसको प्रत्यक्ष नहीं कह सकते हैं । यह बौद्धों का
पूर्वपक्ष है जिसको ग्रन्थकार आगे प्रस्तुत करते हैं—
[ प्रश्न ] निर्विकल्पक वस्तुतः स्वलक्षण अर्थात् वस्तु मात्र विषयक
[ और उससे उत्पन्न ] होने से भले ही प्रत्यक्ष हो [ जाय ] परन्तु सविकल्पक तो
शब्द और अनुमान के समान अनुगत आकार [ सामान्य ] का ग्राहक होने से
सामान्य विषयक होने से कैसे प्रत्यक्ष [ कहलाने योग्य ] होगा 'अर्थज' के ही
प्रत्यक्ष होने और वास्तव में विद्यमान अर्थ के ही उस [ प्रत्यक्ष ] के जनक होने
से [ सामान्य विषयक सविकल्पक ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता है । ] स्वलक्षण