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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 330 में से

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पृष्ठ 149

८४ तर्कभाषा [ केवलव्यतिरेकी हेतुः
तत् सात्मकं यथा अमुक इति दृष्टान्तो नास्ति। जीवच्छरीरं सर्वं
पक्ष एव।
लक्षणमपि केवलव्यतिरेकी हेतुः। यथा पृथिवीलक्षणं गन्धवत्त्वम्।
विवादपदं पृथिवीति व्यवहर्तव्यं, गन्धवत्त्वात्। यन्न पृथिवीति व्यवह्रियते
तन्न गन्धवत् यथापः।
प्रमाणलक्षणं वा। यथा प्रमाकरणत्वम्। तथाहि, प्रत्यक्षादिकं प्रमाण-
मिति व्यवहर्तव्यं प्रमाकरणत्वात्। यत्प्रमाणमिति न व्यवह्रियते तन्न
प्रमाकरणं यथा प्रत्यक्षाभासादि। न पुनस्तथेदं, तस्मान्न तथेति। न
पुनरत्र यत्प्रमाकरणं तत्प्रमाणमिति व्यवहर्तव्यं यथाऽमुक इत्यन्वयदृष्टा-
न्तोऽस्ति, प्रमाणमात्रस्य पक्षीकृतत्वात्।
वह सात्मक है जैसे अमुक इस प्रकार का [ अन्वय [ व्याप्ति का ] दृष्टान्त नहीं
मिलता ] है। [ क्योंकि उदाहरण बन सकने योग्य ] सारे जीवित शरीर पक्ष
[ कोटि में ] ही [ अन्तर्भूत ] हैं।
[ इसी प्रकार ] लक्षण भी [ जब हेतु रूप में प्रयुक्त होते हैं तब वह ] केवल
व्यतिरेकी हेतु होते हैं। जैसे पृथिवी का लक्षण गन्धवत्त्व [ गन्धवती पृथिवी यह
पृथिवी का लक्षण है। उसको हेतु बना कर जब किसी विवादग्रस्त पदार्थ को
पृथिवी सिद्ध करने के लिए ] विवादास्पद [ वस्तु ] को पृथिवी यह [ कह कर ]
व्यवहार करना चाहिये गन्धवत् होने से। जहां पृथिवी यह व्यवहार नहीं होता
है वह गन्धवत् नहीं होता है [ यह व्यतिरेक व्याप्ति हुई और उसमें उदाहरण है ]
जैसे जल। [ परन्तु इसकी अन्वय व्याप्ति 'यत्र यत्र गन्धवत्त्वं तत्र तत्र पृथिवीति
व्यवहारः' में कोई पार्थिव पदार्थ ही उदाहरण हो सकता है। परन्तु पार्थिव
पदार्थ तो सब के सब पक्ष कोटि में हैं अतः अन्वय-व्याप्ति में कोई उदाहरण न
मिलने से और व्यतिरेक व्याप्ति में उदाहरण मिल जाने से यह हेतु केवल
व्यतिरेकी हेतु ही है ]
अथवा प्रमाण का लक्षण जैसे प्रमाकरणत्व [ भी हेतु रूप में प्रयुक्त होने पर
केवल व्यतिरेकी हेतु ही होगा ] जैसे प्रमा का करण होने से प्रत्यक्षादि में प्रमाण
यह व्यवहार करना चाहिए। जिसमें प्रमाण यह व्यवहार नहीं होता है वह प्रमा का
करण नहीं होता है [ यह व्यतिरेक व्याप्ति हुई और उसमें उदाहरण है ] जैसे
प्रत्यक्षाभास आदि। यह [ विवादास्पद प्रत्यक्षादि ] वैसा [ अर्थात् प्रमाण
व्यवहाराभाव युक्त अतएव प्रमाकरणत्वाभाव युक्त ] नहीं है इसलिए वैसा [ प्रमाण
व्यवहाराभाव योग्य ] नहीं है [ अर्थात् प्रमाण व्यवहार योग्य है ] परन्तु यहाँ जो