तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ें८२ तर्कभाषा [ परार्थानुमानम्
यत्तु कश्चित् स्वयं धूमादग्निमनुमाय परं बोधयितुं पञ्चावयवमनुमान-
वाक्यं प्रयुङ्क्ते तत् परार्थानुमानम् । तद्यथा पर्वतोऽग्निमान्, धूमवत्वात्,
यो यो धूमवान् स सोऽग्निमान्, यथा महानसः, तथा चायं, तस्मात्तथा, इति।
अनेन वाक्येन प्रतिज्ञादिमता प्रतिपादितात् पञ्चरूपोपपन्नाल्लिङ्गात्
परोऽप्यग्निं प्रतिपद्यते । तेनैतत् परार्थानुमानम् ।
अत्र पर्वतस्याग्निमत्वं साध्यं, धूमवत्वं हेतुः। स चान्वयव्यतिरेकी,
अन्वयेन व्यतिरेकेण च व्याप्तिमत्वात् । तथा हि यत्र यत्र धूमवत्वं तत्रा-
ग्निमत्वं यथा महानसे इत्यन्वयव्याप्तिः । महानसे धूमाग्न्योरन्वयसद्भा-
और जो कोई धूम से स्वयं अग्नि का अनुमान करके [ उसी को ] दूसरे को
बोध कराने के लिए पञ्चावयव अनुमान वाक्य का प्रयोग करता है वह परार्थानु-
मान होता है । जैसे [ अञ्चावयव युक्त अनुमान वाक्य के प्रयोग का उदाहरण
देते हैं ] १. यह पर्वत अग्निमान् है [ यह प्रथम अवयव प्रतिज्ञा है ] २. धूम युक्त
होने से [ यह हेतु रूप दूसरा अवयव है ] ३. जो जो धूमयुक्त होता है वह वह
वह्नि युक्त भी होता है जैसे रसोई घर [यह उदाहरण रूप तीसरा अवयव हुआ]
४. यह [ पर्वत ] भी उसी प्रकार का [ धूम युक्त ] है [ यह चौथा अवयव
उपनय रूप हुआ । इसको 'वह्निव्याप्यधूमवांश्चायं' इस रूप से बोलना चाहिए ।
परन्तु संक्षेप में उसको 'तथा चायं' कह कर भी व्यवहार किया जाता है । इसमें
व्याप्ति और पक्षधर्मता दोनों प्रतीति होती हैं। इसलिए इसको 'व्याप्तिविशिष्टपक्ष-
धर्मताज्ञान' या 'लिङ्गपरामर्श' रूप 'अनुमान' भी कहते हैं। क्योंकि इसके बाद
निगमन रूप पञ्चम अवयव ] इस लिए वैसा [ अर्थात् अग्नियुक्त ] है [ इस
प्रकार का ज्ञान हो जाता है जो अनुमिति रूप है । यह पाँचवां अवयव निगमन
कहलाता है ] ।
[ इस प्रकार ] प्रतिज्ञा आदि [ पाँचों अवयवों ] से युक्त इस [ अनुमान ]
वाक्य द्वारा प्रतिपादित [ १ पक्षसत्त्व, २ सपक्षसत्त्व, ३ विपक्षव्यावृत्तत्व,
४ अबाधितविषयत्व और ५ असत्प्रतिपक्षत्व इन आगे कहे जाने वाले ] पाँच
रूपों से युक्त लिङ्ग [ हेतु ] से, दूसरा [ व्यक्ति ] भी अग्नि को जान लेता है ।
इसलिए यह 'परार्थानुमान' [ दूसरे का बोधक अनुमान ] है ।
यहाँ [ इस अनुमान में ] पर्वत का अग्निमत्व साध्य है धूमवत्व हेतु है ।
और वह [ हेतु ] अन्वय व्यतिरेकी [ हेतु ] है । [ क्योंकि उसकी अन्वय और
व्यतिरेक दोनों प्रकार की व्याप्ति में उदाहरण मिल जाते हैं अतः वह ] अन्वय
तथा व्यतिरेक से व्याप्ति युक्त होने से । जैसे कि जहाँ-जहाँ धूमवत्व [ होता है ]
वहाँ-वहाँ अग्निमत्व [ होता है ] जैसे महानस में । यह अन्वय व्याप्ति हुई ।