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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 330 में से

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पृष्ठ 139

७४ तर्कभाषा [ उपाधिलक्षणम्
'आर्द्रेन्धन संयोग' रूप धर्म, साध्य जो धूम है, उसका व्यापक है । अर्थात्
जहाँ-जहाँ धूम होता है वहाँ-वहाँ आर्द्रेन्धन संयोग अवश्य होता है । यह
'साध्यव्यापकत्व' हुआ । इसके विपरीत 'आर्द्रेन्धन संयोग' साधनभूत धर्म वह्नि
का व्यापक नहीं है । अर्थात् जहाँ-जहाँ वह्नि हो वहाँ-वहाँ 'आर्द्रेन्धन संयोग' का
होना आवश्यक नहीं है । जैसे इसी अयोगोलक ( लोहे के गोले ) में अग्नि तो
है परन्तु 'आर्द्रेन्धन संयोग' नहीं है । यह 'साधनाव्यापकत्व' हुआ । इस प्रकार
'आर्द्रेन्धन संयोग' में 'साध्यव्यापकत्व' और 'साधनाव्यापकत्व' दोनों अंश घट
जाने से उसमें 'उपाधि' का पूरा लक्षण घट जाता है । इसलिए यह हेतु
'सोपाधिक' है । अर्थात् 'यत्र यत्र वह्निस्तत्र तत्र धूमः' यह सम्बन्ध स्वाभाविक
नहीं औपाधिक है ।
'औपाधिक सम्बन्ध' का दूसरा उदाहरण यह है कि कोई 'मैत्री' नामक स्त्री
व्यक्ति है । उसके पाँच पुत्र हैं, जिनमें से चार को हमने देखा है और वह सब
श्याम वर्ण के हैं। पाँचवें पुत्र को हमने नहीं देखा है किन्तु वह गौर वर्ण का
है। परन्तु जिसने मैत्री के चार पुत्रों में श्यामत्व देखा है वह उस 'भूयः सहचार दर्शन'
के आधार पर 'मैत्रीतनयत्व' और 'श्यामत्व' का 'स्वाभाविक सम्बन्ध' अथवा
व्याप्ति मान कर उस न देखे हुए पाँचवें पुत्र में भी श्यामत्व का अनुमान 'सः
श्यामः मैत्रीतनयत्वात् परिदृश्यमानमैत्रीतनयस्तोमवत्' इस प्रकार कर सकता
है। यहाँ 'मैत्रीतनयत्वात्' हेतु 'श्यामत्व' की सिद्धि के लिए दिया गया है ।
परन्तु यह हेतु 'सोपाधिक' है । इस में 'शाक-पाक जन्यत्व' रूप 'उपाधि'
विद्यमान है । अर्थात् 'श्यामत्व' का प्रयोजक 'मैत्रीतनयत्व' नहीं अपितु 'शाक-
पाक-जन्यत्व' है । इस प्रयोजक को ही उपाधि कहते हैं । उपाधि का लक्षण
'साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वम्' है । वह 'शाक-पाक-जन्यत्व' में पूर्ण
रूप से घट जाता है । यहाँ साध्य श्यामत्व और साधन मैत्रीतनयत्व है ।
'शाकपाकजन्यत्वं' साध्य रूप श्यामत्व का व्यापक है । यत्र यत्र श्यामत्वं तत्र
तत्र शाकपाकजन्यत्वं' यह साध्यव्यापकत्व हुआ ।
'शाक-पाक-जन्यत्व' का अभिप्राय यह है कि बालक के गौर और श्याम
वर्ण पर गर्भ काल में किए गए माता के आहार का प्रभाव पड़ता है । यदि माता
दुग्ध, दधि आदि पदार्थों का अधिक सेवन करती है तो बालक गौर वर्ण का होता
है । इसके विपरीत यदि गर्भ काल में माता हरे शाक आदि का अधिक सेवन
करती है तो बालक का वर्ण श्याम होता है । अर्थात् श्यामत्व का प्रयोजक या
कारण 'मैत्रीतनयत्व' नहीं अपितु 'शाकपाकजन्यत्व' है । जहाँ-जहाँ 'शाक-पाक-
जन्यत्व' होता है वहाँ-वहाँ श्यामत्व अवश्य होता है यह साध्य-व्यापकत्व हुआ ।