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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 330 में से

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पृष्ठ 137

७२ तर्कभाषा [ उपाधिलक्षणम्

प्रति करणत्वात् । अग्न्यादिज्ञानमनुमितिः । तत्करणं धूमादिज्ञानम् ।
किं पुनर्लिङ्गं कश्च तस्य परामर्शः ?
उच्यते । व्याप्तिबलेनार्थगमकं लिङ्गम् । यथा धूमोऽग्नेर्लिङ्गम् । तथाहि
यत्र धूमस्तत्राग्निरिति साहचर्यनियमो व्याप्तिः। तस्यां गृहीतायामेव व्याप्तौ
धूमोऽग्निं गमयति । अतो व्याप्तिबलेनाग्न्यनुमापकत्वाद् धूमोऽग्नेर्लिङ्गम् ।
तस्य तृतीयं ज्ञानं परामर्शः । तथाहि प्रथमं तावन्महानसादौ भूयो
भूयो धूमं पश्यन् वह्निं पश्यति । तेन भूयो दर्शनेन धूमाग्न्योः स्वाभाविकं
सम्बन्धमवधारयति, यत्र धूमस्तत्राग्निरिति ।
है इसलिए लिङ्गपरामर्श को अनुमान कहते हैं । और वह [लिङ्गपरामर्श]
धूमादि ज्ञान [रूप] है अनुमिति प्रति करण होने से । अग्नि आदि का ज्ञान अनु-
मिति है । उसका करण धूमादि ज्ञान है । [अतः धूमादि ज्ञान अग्नि आदि ज्ञान
का करण होने से अनुमान है ]
[प्रश्न] फिर लिङ्ग' किस को कहते हैं और उसका 'परामर्श' क्या है ?
[उत्तर] कहते हैं । व्याप्ति के बल से [जो] अर्थ का बोधक [हो वह]
'लिङ्ग' [कहलाता] है। जैसे धूम अग्नि का लिङ्ग है। क्योंकि, जहां धूम होता
है वहां अग्नि होती है इस साहचर्य नियम को व्याप्ति कहते हैं । उस व्याप्ति के
ग्रहण होने पर ही धूम अग्नि का ज्ञापक होता है इसलिए व्याप्ति के बल से अग्नि
का अनुमापक होने से धूम अग्नि का लिङ्ग होता है ?
उस [धूमरूप लिङ्ग] का तृतीय ज्ञान 'परामर्श' कहलाता है। जैसे पहिले
रसोई घर आदि में बार बार धूम को देख कर वह्नि को देखता है। [अर्थात्
धूम और वह्नि का भूयः अनेक बार सहचार दर्शन होता है ] उस 'भूयः सहचार
दर्शन' से धूम और अग्नि के स्वाभाविक सम्बन्ध [व्याप्ति] को निश्चय करता है
कि जहां जहां धूम होता है वहां अग्नि होती है [इस प्रकार की धूम और वह्नि
की व्याप्ति का निश्चय करता है।]
जितने बार के दर्शन से इस स्वाभाविक सम्बन्ध या 'व्याप्ति' का निश्चय होता
है । वह सब मिल कर धूम का 'प्रथम दर्शन' कहा जायगा । 'व्याप्ति' ग्रहण के
बाद जो पर्वतादि में धूम का दर्शन होता है उसको द्वितीय दर्शन समझना चाहिए।
उस द्वितीय दर्शन से पूर्वगृहीत धूम और अग्नि की व्याप्ति का स्मरण हो आता
है । इस 'व्याप्ति स्मृति' के बाद 'वह्निव्याप्य धूमवांश्चायं पर्वतः' इस प्रकार का
ज्ञान होता है इसी को 'तृतीय ज्ञान' कहते हैं। यही अनुमिति के प्रति करण
होने से 'अनुमान' कहा जाता है। इसी 'तृतीय ज्ञान' के बाद 'तस्मात् पर्वतो
वह्निमान्' इसलिए पर्वत वह्नि युक्त है यह अनुमिति हो जाती है । इसलिए