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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 330 में से

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पृष्ठ 148

केवलव्यतिरेकी हेतुः ] अनुमाननिरूपणम् ८३
कश्चिद्धेतुः केवलव्यतिरेकी । तद्यथा, सात्मकत्वे साध्ये प्राणादिमत्त्वं
हेतुः । यथा जीवच्छरीरं सात्मकं प्राणादिमत्त्वात् । यत् सात्मकं न भवति
तन् प्राणादिमन्न भवति । यथा घटः । न चेदं जीवच्छरीरं तथा तस्मान्न
तथेति । अत्र हि जीवच्छरीरस्य सात्मकत्वं साध्यं, प्राणादिमत्त्वं हेतुः ।
स च केवलव्यतिरेकी, अन्वयव्याप्तेरभावात् । तथाहि यत् प्राणादिमत्
कृतकत्व हेतु दोनों प्रकार की व्याप्ति में उदाहरण मिल जाने से 'अन्वय व्यतिरेकी'
हेतु कहलाता है ]
ऊपर अन्वयव्याप्ति तथा व्यतिरेकव्याप्ति इस प्रकार दो प्रकार की व्याप्ति दिखाई
गई है । इस दो प्रकार की व्याप्ति से 'केवलान्वयी' और 'केवलव्यतिरेकी' तथा
उन दोनों के मेल से तीसरा 'अन्वयव्यतिरेकी' यह तीन प्रकार के हेतु माने गए
हैं । जिसमें अन्वयव्याप्ति तथा व्यतिरेकव्याप्ति दोनों के उदाहरण मिल जावें वह
हेतु अन्वयव्यतिरेकी हेतु कहलाता है । जैसे धूमवत्त्व और कृतकत्व यह दोनों हेतु
अन्वयव्यतिरेकी हेतु हैं यह ऊपर दिखाया जा चुका है । जिस हेतु का अन्वयव्याप्ति
में उदाहरण न मिल सके और केवल व्यतिरेकव्याप्ति में उदाहरण मिले उसको
केवल व्यतिरेकी हेतु कहते हैं । जैसे 'जीवच्छरीरं सात्मकं प्राणादिमत्त्वात्' । इस
अनुमान में प्राणादिमत्त्व हेतु है और सात्मकत्व साध्य है । इन दोनों की अन्वय-
व्याप्ति इस प्रकार बनेगी । 'यत्र यत्र प्राणादिमत्त्वं तत्र तत्र सात्मकत्वम्' । इस
व्याप्ति का उदाहरण कोई जीवित शरीर ही होगा । परन्तु जीवित शरीर सब पक्ष
कोटि के अन्तर्गत हैं । इसलिए अन्वयव्याप्ति में उदाहरण मिलना सम्भव नहीं
है । तब व्यतिरेकव्याप्ति इस प्रकार बनेगी । 'यत्र यत्र सात्मकत्वाभावस्तत्र तत्र
प्राणादिमत्त्वाभावः । इस व्याप्ति में घट-पट आदि सहस्रों उदाहरण मिल सकते
हैं । इसलिए इस अनुमान में केवल व्यतिरेक व्याप्ति में ही उदाहरण सम्भव
होने से यह प्राणादिमत्त्व हेतु 'केवल व्यतिरेकी' हेतु है । यही बात आगे कहते हैं ।
कोई हेतु केवल व्यतिरेकी [ ही होती ] है । जैसे सात्मकत्व के साध्य होने में
प्राणादिमत्त्व हेतु [ केवल व्यतिरेकी हेतु है ] जैसे जीवित शरीर सात्मक है प्राणा-
दियुक्त होने से [इस अनुमानमें] जो सात्मक नहीं होता वह प्राणादि युक्त नहीं होता
[यह व्यतिरेक व्याप्ति हुई इसमें उदाहरण] जैसे घट । और यह जीवित शरीर वैसा
[अर्थात् प्राणादिमत्त्वाभाववत्] नहीं है इसलिये वैसा [अर्थात् सात्मकत्वाभाववत्]
नहीं है [ अर्थात् सात्मक है ] यहाँ [ इस अनुमान में ] जीवित शरीर का सात्म-
कत्व साध्य है और प्राणादिमत्त्व हेतु है, और वह [ हेतु ] अन्वयव्याप्ति [ में
उदाहरण ] के अभाव होने से केवल व्यतिरेकी है । क्योंकि जो प्राणादिमत् है