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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 330 में से

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पृष्ठ 135

७० तर्कभाषा [ प्रत्यक्षे बौद्धमतम्
मैवम्। सामान्यस्यापि वस्तुभूतत्वात् ।
तदेवं व्याख्यातं प्रत्यक्षम् ।
[ अर्थात् वस्तुमात्र ] तो परमार्थतः सत् है किन्तु सामान्य [ परमार्थ सत् ] नहीं ।
उसकी विधि रूपता [ भाव रूपता ] का प्रमाणों से खण्डन हो जाने से और
अतद्व्यावृत्ति रूप [ अभाव रूप ] तुच्छ होने से । [ सामान्य विषयक सविकल्पक
ज्ञान को अर्थज न होने से प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता है । ]
यह बौद्ध का पूर्वपक्ष हुआ, इसका उत्तर बहुत संक्षेप में अगली एक पंक्ति
में यह दिया है कि सामान्य भी भावभूत पदार्थ है । इसका अभिप्राय यह है कि
घटादि में जो अनुगत प्रतीति होती है इसका उपपादन करना आवश्यक है ।
इसके उपपादन करने के लिये बौद्ध जो 'अतद्व्यावृत्ति' रूप 'अपोह' का
अवलम्बन करते हैं वह बड़ा वक्रमार्ग है । साधारणतः दश घट व्यक्तियों को
देखने पर देखने वाले के मन में उनकी समानता ही प्रतीति होती है ।
'अतद्व्यावृत्ति' या अघटभिन्नत्व प्रतीत नहीं होता । अतएव इस एकाकार
प्रतीति का कारण भावभूत सामान्य को ही मानना चाहिए, 'अपोह' को नहीं ।
हमने अपनी दर्शनमीमांसा में इस विषय को इस प्रकार लिखा है—
वस्तुमात्रावगाहि यत् प्रत्यक्षं निर्विकल्पकम् ।
तत्तु बौद्धमते सिद्धं सविकल्पं न सम्मतम् ॥
सामान्यं तुच्छरूपत्वादर्थो नैव यतो भवेत् ।
तद्विषयमतो ज्ञेयं सविकल्पं न चार्थजम् ॥
न चैकाकारबुद्ध्यापि सामान्यं संप्रसिद्ध्यति ।
यतोऽनुवृत्तिबुद्धिः सा त्वपोहादेव जायते ॥
भावभूतो न चापोहोऽतद्व्यावृत्तिरूपतः ।
तच्च तद्भिन्नभिन्नत्वमभावरूपतो मतम् ॥
अत्र तद्भिन्नभिन्नत्वेऽनुवृत्तिबुद्धिहेतुता ।
या मता सातिवक्रत्वाद् वस्तुतो नोपयुज्यते ॥
भावभूतमतो ज्ञेयं सामान्यं तत्र कारणम्
अर्थवत्वादतो नूनं प्रत्यक्षं सविकल्पकम् ॥
[ उत्तर ] सामान्य के भी वस्तुभूत होने से यह ठीक नहीं है ।
इस प्रकार प्रत्यक्ष की व्याख्या हो गई ।
१ दर्शनमीमांसा ४ ।