तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपाधिलक्षणम् ] अनुमाननिरूपणम् ७३
'वह्निव्याप्यधूमवांश्चायं पर्वतः' यह तृतीय ज्ञान ही वह्नि ज्ञान के प्रति 'करण'
है और इसी को 'अनुमान' कहते हैं ।
इस तृतीय ज्ञान के दो अंश हैं एक अंश 'व्याप्ति' को सूचित करता है
और दूसरा 'पक्ष धर्मता' को । 'वह्निव्याप्य' इतने अंश से व्याप्ति सूचित होती
है और 'धूमवांश्च पर्वतः' इस अंश से धूम का पर्वत रूप पक्ष में अस्तित्व
प्रतीत होता है । इसको 'पक्षधर्मता' ज्ञान कहते हैं । इस प्रकार अनुमान के
मुख्य दो अंश होते हैं, एक 'व्याप्ति' और दूसरा 'पक्षधर्मता' । 'वह्निव्याप्यधू-
मवांश्च पर्वतः' इस तृतीय ज्ञान में यह दोनों अंश प्रतीत होते हैं । इसलिए
इस 'तृतीय ज्ञान' को 'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञान' भी कह सकते हैं । इसलिए
'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं परामर्शः' 'और लिङ्गस्य तृतीयं ज्ञानं परामर्शः'
यह दोनों ही 'परामर्श' के लक्षण कहे जाते हैं । 'लिङ्गपरामर्शो अनुमानम्'
'लिङ्गस्य तृतीयं ज्ञानं परामर्शः' । लिङ्ग का 'तृतीय ज्ञान' अथवा 'व्याप्तिविशिष्ट-
पक्षधर्मताज्ञान' रूप 'परामर्श' ही 'अनुमान' कहलाता है । इसमें से धूम और
वह्नि के जितने बार के 'सहचारदर्शन' से 'व्याप्ति' का निश्चय होता है, वह सब
मिलकर प्रथम ज्ञान कहलाता है, इस प्रकार प्रथम ज्ञान तो यहाँ दिखा दिया
है और द्वितीय, तृतीय ज्ञान का वर्णन आगे चल कर करेंगे ।
'व्याप्ति' का ग्रहण 'भूयः सहचार दर्शन' से होता है और 'व्याप्ति' 'स्वाभाविक
सम्बन्ध' होता है ये दो बातें प्रतिपादित की हैं । इस पर यह शङ्का करते हैं कि
सर्वत्र 'भूयः सहचार दर्शन' से 'स्वाभाविक सम्बन्ध' का निश्चय नहीं होता है ।
जैसे 'जहाँ-जहाँ धूम है वहाँ-वहाँ वह्नि है' यह तो स्वाभाविक सम्बन्ध है, और
व्याप्ति ठीक है। परन्तु इसको यदि उलटा करके यों कहा जाय कि 'यत्र यत्र वह्नि-
स्तत्र तत्र धूमः' 'जहाँ-जहाँ वह्नि है वहाँ-वहाँ धूम है' तो इनका भूयः सहचार
दर्शन होने पर भी यह 'स्वाभाविक सम्बन्ध' या 'व्याप्ति' नहीं होगा। क्योंकि यदि
लोहे के एक गोले को गर्म कर दिया जाय तो उसमें अग्नि तो होती है परन्तु धूम
नहीं होता । इसलिए 'यत्र यत्र वह्निस्तत्र तत्र धूमः' यह स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं
अपितु 'औपाधिक' सम्बन्ध कहलाता है। इसमें 'आर्द्र इन्धन संयोग' 'उपाधि' है।
'उपाधि' का लक्षण है 'साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वमुपाधिः' ।
जो धर्म साध्य का व्यापक हो और साधन का अव्यापक हो उसको 'उपाधि'
कहते हैं । जैसे यदि कोई यह अनुमान बनावे कि 'अयोगोलकं धूमवत् वह्नेः'
लोहे का गोला वह्नियुक्त होने से धूमवान् है तो इस अनुमान में धूम 'साध्य' है,
वह्नि 'साधन' है, और 'आर्द्वेन्धनसंयोग' को यहाँ उपाधि कहा है । यह