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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 330 में से

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पृष्ठ 147

८२ तर्कभाषा [ अन्वयव्यतिरेकी हेतुः
तदेवं धूमवत्त्वे हेतावन्वयेन व्यतिरेकेण च व्याप्तिरस्ति । यत्तु वाक्ये
केवलमन्वयव्याप्तेरेव प्रदर्शनं तदेकेनापि चरितार्थत्वात् । तत्राप्यन्वय-
स्यावक्रत्वात् प्रदर्शनम् । ऋजुमार्गेण सिद्धयतोऽर्थस्य वक्रेण साधना-
योगात् । न तु व्यतिरेकव्याप्तेरभावात् ।
तदेवं धूमवत्त्वं हेतुरन्वयव्यतिरेकी । एवमन्येऽप्यनित्यत्वाद्यौ साध्ये
कृतकत्वादयो हेतवोऽन्वयव्यतिरेकिणो द्रष्टव्याः । यथा शब्दोऽनित्यः
कृतकत्वादूघटवत् । यत्र कृतकत्वं तत्रानित्यत्वम् । यत्रानित्यत्वाभावस्तत्र
कृतकत्वाभावो यथा गगने ।
इस प्रकार धूमत्व हेतु में अन्वय और व्यतिरेक [ दोनों प्रकार की व्याप्ति में
उदाहरण मिल जाने से दोनों प्रकार ] से व्याप्ति है । [ परन्तु पर्वतो वह्निमान्,
धूमवत्त्वात्, यो यो धूमवान् सोऽग्निमान् यथा महानसः, इत्यादि अनुमान वाक्य
में ] जो केवल अन्वय व्याप्ति का ही प्रदर्शन किया गया है वह एक [ ही प्रकार
की व्याप्ति प्रदर्शन ] से भी काम चल सकता है [ इसलिए किया गया है । ]
उसमें भी [ व्यतिरेक व्याप्ति की अपेक्षा ] अन्वय [ व्याप्ति ] के सरल होने से
[ केवल अन्वय व्याप्ति का ] प्रदर्शन किया गया है । सरल मार्ग से सिद्ध होने वाले
अर्थ को वक्र मार्ग से साधन अयुक्त होने से [ केवल अन्वय व्याप्ति का प्रदर्शन
किया गया है ] न कि व्यतिरेक व्याप्ति के अभाव के कारण [ केवल अन्वय
व्याप्ति का प्रदर्शन किया गया है । ]
इस प्रकार [ अन्वय व्याप्ति में महानस और व्यतिरेक व्याप्ति में महाह्रद
दोनों प्रकार के उदाहरण मिल जाने से ] धूमवत्त्व हेतु अन्वयव्यतिरेकी [हेतु] है।
इसी प्रकार अनित्यत्वादि की सिद्धि में [ प्रयुक्त ] कृतकत्वादि अन्य हेतु भी अन्वय
व्यतिरेकी [ हेतु ही ] समझने चाहिए । जैसे कृतक [ जन्य ] होने से शब्द घट के
समान अनित्य है। जहाँ कृतकत्व [ अर्थात् जन्यत्व ] रहता है वहाँ अनित्यत्व
[भी] रहता है । [ यह अन्वय व्याप्ति हुई और उसका उदाहरण घट है । क्योंकि
घट में कृतकत्व और अनित्यत्व दोनों पाए जाते हैं ] जहाँ अनित्यत्व का अभाव
होता है वहाँ कृतकत्व का [भी] अभाव होता है। जैसे आकाश में [यह व्यतिरेक
व्याप्ति हुई । अन्वय व्याप्ति 'यत् कृतकं तदनित्यम्' में कृतकत्व हेतु व्याप्य है इस
लिए उसका प्रयोग पहिले किया जाता है । व्यतिरेक व्याप्ति बनाने का जो क्रम
अभी दिखाया है उसके अनुसार व्यतिरेकव्याप्ति बनाते समय उन दोनों के साथ
अभाव पद जुड़ जाता है । और उनका 'व्याप्यव्यापकभाव' बदल कर उल्टा हो
जाता है । इसलिए 'यत्र यत्र अनित्यत्वाभावः तत्र तत्र कृतकत्वाभावः' यह व्यतिरेक
व्याप्ति बनती है । और उसका उदाहरण आकाश मिल जाता है । इसलिए यह