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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 330 में से

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पृष्ठ 132

प्रत्यक्षे बौद्धमतम् ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ६७
पर विशेष बल दिया है। शेलिंग ने जब प्रत्यक्ष, अनुभव अथवा प्रतिभान
[ इण्ट्यूशन ] के प्राधान्य का प्रतिपादन किया तब हीगेल आदि विद्वान्
उससे विरक्त हो गए ।
हाँ वर्गसां अवश्य प्रत्यक्ष को महत्त्व देने वाले प्रसिद्ध दार्शनिक हैं। उन्होंने
बुद्धिवाद की कड़ी आलोचना भी की है। वर्गसां के अनुसार ज्ञान दो प्रकार का
होता है—एक बौद्धिक और दूसरा अपरोक्ष अनुभवमूलक अथवा प्रत्यक्ष ।
वर्गसां अपरोक्ष ज्ञान को आन्तरिक ज्ञान मानते हैं जिसमें हम वस्तु के भीतर तक
प्रविष्ट होकर उसका ज्ञान प्राप्त करते हैं । उनकी दृष्टि में बौद्धिक ज्ञान केवल
वस्तु का बाहरी ज्ञानमात्र है जिसमें हम केवल वस्तु के चारों ओर घूमते रहते हैं
उसके आन्तरिक रहस्य को नहीं जान पाते हैं। वर्गसां का कहना है कि बुद्धि कभी
पदार्थों के आन्तरिक रहस्य को नहीं जान सकती है वह तो अनुभव या प्रत्यक्ष
से ही प्राप्त होता है । परन्तु वर्गसां के इस 'प्रतिभानवाद' के विरुद्ध बर्ट्रांड रसेल
आदि आधुनिक विद्वान् फिर बुद्धिवाद का समर्थन कर रहे हैं ।
योरोपीय दर्शन में प्रत्यक्ष या अनुभव की उपेक्षा कर बुद्धिवाद को प्राधान्य
दिया गया है। जैसा कि सर्वपल्ली श्री राधाकृष्णन् १ ने लिखा है कि योरोपीय
दर्शन का झुकाव सदैव बुद्धिवाद की ओर रहा है। भारतीय दर्शन में प्रत्यक्ष की
प्रधानता और पाश्चात्त्य दर्शन में प्रत्यक्ष की उपेक्षा का जो यह भेद है उसका
मुख्य कारण यह है कि भारत में दर्शन और जीवन-उद्देश्य आत्मसाक्षात्कार है
जो अनुभव रूप है। और पाश्चात्य दर्शन का उद्देश्य विश्व की व्याख्या द्वारा
केवल बुद्धि को सन्तुष्ट करना मात्र है ।
प्रत्यक्ष के विषय में बौद्धमत—
ऊपर प्रत्यक्ष के सविकल्पक और निर्विकल्पक दो भेद किए गए हैं। उनके
विषय में तीन प्रकार के मत हैं, यह हम दिखला चुके हैं। जिसमें से बौद्ध लोग
केवल निर्विकल्पक को ही प्रमाण मानते हैं सविकल्पक को नहीं और नैयायिक
सविकल्पक तथा निर्विकल्पक दोनों को प्रमाण मानते हैं । बौद्ध लोग जो केवल
निर्विकल्पक को ही प्रमाण मानते हैं सविकल्प को नहीं इसका कारण यह है
कि उनके मत में निर्विकल्पक तो 'स्वलक्षण' विषयक अर्थात् 'वस्तु मात्र' विषयक
होने से वस्तुमात्र से जन्य है, अतः 'अर्थज' है । इसलिए 'अर्थज' होने से उसको
प्रमाण माना जा सकता है। परन्तु सविकल्पक ज्ञान तो नामजात्यादि योजना
सहित होता है। उसमें जाति का भी भान होता है । इसलिए 'जाति' को भी
१. An Idealist View of life P. P. 129-33.