तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलिङ्गपरामर्शः ] अनुमाननिरूपणम् ७७
तदनेन न्यायेन धूमाग्न्योर्व्याप्तौ गृह्यमाणायां, महानसे यद्धूमज्ञानं
तत्प्रथमम् । पर्वतादौ पक्षे यद्धूमज्ञानं तद्द्वितीयम् । ततः पूर्वगृहीतां
धूमाग्न्योर्व्याप्तिं स्मृत्वा यत्र धूमस्तत्राग्निरिति तत्रैव पर्वते पुनर्धूमं परा-
मृशति । अस्त्यत्र पर्वते वह्निना व्याप्तो धूम इति । तदिदं धूमज्ञानं तृतीयम् ।
एतच्चावश्यमभ्युपेतव्यम् । अन्यथा यत्र धूमस्तत्राग्निरित्येव स्यात् ।
इह तु कथमग्निना भवितव्यम् । तस्मादिहापि धूमोऽस्ति इति ज्ञानमन्वे-
षितव्यम् । अयमेव लिङ्गपरामर्शः । अनुमिति प्रति करणत्वाच्चानुमानम् ।
तस्मात्, अस्त्यत्र पर्वतेऽग्निरित्यनुमितिज्ञानमुत्पद्यते ।
ननु कथं प्रथमं महानसे यद्धूमज्ञानं तन्नाग्निमनुमापयति ?
इसलिए, इस प्रकार से [ व्यभिचारादर्शन सहकृत भूयः सहचार दर्शन से ]
धूम और अग्नि की व्याप्ति के ग्रहण में महानस [ रसोई घर ] में जो [ जितनी
बार सहचार दर्शन से व्याप्तिग्रह हो, उतनी बार का सम्मिलित ] धूमज्ञान है वह
प्रथम [ ज्ञान है, इस व्याप्तिग्रह के बाद ] पर्वतादि रूप पक्ष [ 'सन्दिग्धसाध्य-
वान् पक्षः' जिस पर्वतादि में साध्य वह्नि संदिग्ध अवस्था में है उसको 'पक्ष' कहते
हैं ] में जो धूम का ज्ञान है वह द्वितीय [ ज्ञान है ], उस [ पर्वतादि में द्वितीय
धूम दर्शन ] से, पूर्व गृहीत धूम और अग्नि की 'जहाँ धूम होता है वहीं वह्नि
होती है इस 'व्याप्ति' को स्मरण कर उसी पर्वत में [ वह्नि व्याप्ति विशिष्ट ] धूम का
फिर [ 'वह्निव्याप्यधूमवांश्चायं पर्वत.' इस रूप में ] परामर्श करता है । इस पर्वत
में वह्नि के साथ व्याप्त धूम है। यह [ वह्नि व्याप्य धूमवांश्चायं पर्वतः इस प्रकार
का ] धूम ज्ञान, तृतीय ज्ञान [ लिङ्ग परामर्श रूप ] है । [ इसी को 'लिङ्गपरामर्श'
तथा 'अनुमान' कहते हैं। उसी से 'पर्वतो वह्निमान्' यह 'अनुमिति' होती है ]
इस [ तृतीय ज्ञान ] को अवश्य मानना होगा । अन्यथा जहां धूम
होगा वहाँ अग्नि होगी यह [ सामान्य ज्ञान ] ही होगा । यहां [ पर्वत रूप स्थल
विशेष में ] अग्नि क्यों होनी चाहिए । इस [ के उपपादन के ] लिए यहाँ [पर्वत में]
भी धूम है इस प्रकार का ज्ञान मानना चाहिए । यही [ पर्वत में व्याप्तिस्मृति के
बाद हुआ धूम का परामर्श ] लिङ्ग का परामर्श [ कहलाता ] है और [ 'तस्मात्
पर्वतो वह्निमान्' इस प्रकार की ] अनुमिति के प्रति करण होने से अनुमान
[ कहलाता ] है । क्योंकि उस [ लिङ्ग परामर्श रूप तृतीय ज्ञान ] से इस पर्वत में
अग्नि है इस प्रकार का अनुमिति रूप ज्ञान उत्पन्न होता है ।
[ प्रश्न ] अनुमिति के लिए तृतीय ज्ञान तक क्यों जाते हैं । महानस में जो
प्रथम [ बार का ] धूमज्ञान ज्ञान है उसी से अग्नि का अनुमान क्यों नहीं हो
जाता है ?