तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ तर्कभाषा [ तृतीयं ज्ञानम्
सत्यम् । व्याप्तेरगृहीतत्वात् । गृहीतायामेव व्याप्तावनुमित्युदयात् ।
अथ व्याप्तिनिश्चयोत्तरकालं महानस एवाग्निरनुमीयताम् ।
मैवम् । अग्नेर्दृष्टत्वेन सन्देहस्यानुदयात् । सन्दिग्धश्चार्थोऽनुमीयते ।
यथोक्तं भाष्यकृता । 'नानुपलब्धे न निर्णीतेऽर्थे न्यायः प्रवर्तते किन्तु सन्दिग्धे' ।
अथ पर्वतगतमात्रस्य पुंसो यद्धूमज्ञानं, तत् कथं नाग्निमनुमापयति?
अस्ति चात्राग्निसन्देहः । साधकबाधकप्रमाणाभावेन संशयस्य न्याय-
प्राप्तत्वात् ।
सत्यम् । अगृहीतव्याप्तेरिव गृहीतविस्मृतव्याप्तेरपि पुंसोऽनुमानानु-
[ उत्तर ] आपका प्रश्न ठीक है । [ परन्तु ] व्याप्ति का ग्रहण न होने से
[ प्रथम बार के धूमज्ञान से अग्नि का अनुमान नहीं हो सकता है [ क्योंकि ]
व्याप्ति के गृहीत होने पर ही अनुमिति का उदय हो [ सकने ] ने से । प्रथमज्ञान
से अनुमिति नहीं होती ]
[ प्रश्न ] अच्छा तो व्याप्ति के ग्रहण होने के पश्चात् महानस में ही अग्नि का
अनुमान होना चाहिए ।
[ उत्तर ] यह [ कहना भी ] ठीक नहीं है । [ क्योंकि महानस में ] अग्नि
के प्रत्यक्ष होने से सन्देह का उदय न होने से [ व्याप्तिग्रह के बाद महानस में
अग्नि का अनुमान नहीं हो सकता है ] । और सन्दिग्ध अर्थ का ही अनुमान
होता है । जैसा कि [ न्याय दर्शन के ] भाष्यकार [ वात्स्यायन ] ने कहा है
[ कि सर्वथा ] अनुपलब्ध [ अर्थात् अज्ञात ] अर्थ [ के विषय ] में न्याय
[ अर्थात् अनुमान ] की प्रवृत्ति नहीं होती । और न [ सर्वथा ] निर्णीत अर्थ
में न्याय प्रवृत्त होता है किन्तु सन्दिग्ध अर्थ में [ ही न्याय अर्थात् अनुमान की
प्रवृत्ति होती है । ]
[ प्रश्न ] अच्छा [ व्याप्तिग्रह के बाद ] पर्वत में पहुँचे हुए मनुष्य का जो
धूम ज्ञान [ अर्थात् व्याप्ति स्मृति के पूर्व का, द्वितीय ज्ञान ] वह अग्नि का अनुमान
क्यों नहीं कराता ? यहाँ अग्नि का सन्देह तो है । [ क्योंकि अग्नि के ] साधक
अथवा बाधक प्रमाण के अभाव में सन्देह होना उचित ही है ।
[ उत्तर ] [ आपका प्रश्न ] ठीक है । [ परन्तु द्वितीय ज्ञान के समय व्याप्ति
की स्मृति न होने से ] अगृहीत व्याप्तिक पुरुष के समान [ गृहीत होने पर भी
जिसको व्याप्ति विस्मृत हो गई उस ] गृहीत विस्मृत व्याप्तिक पुरुष को भी अनुमान
को उदय न होने से व्याप्ति स्मृति के भी अनुमिति के प्रति हेतु होने से [ व्याप्ति
न्याय दर्शन वात्स्यायन भाष्य १, १, १,