तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुमानम् ] अनुमाननिरूपणम् ७१
अनुमानम्
लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम् । येन हि अनुमीयते तदनुमानम् । लिङ्गपरा-
मर्शेन चानुमीयतेऽतो लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम् । तच्च धूमादिज्ञानमनुमितिं
अनुमानम् ।
प्रत्यक्ष के बाद दूसरा स्थान 'अनुमान' प्रमाण का है । अनुमान
शब्द का अर्थ 'मितेन लिङ्गेन अर्थस्य अनु पश्चान्मानमनुमानम्'¹ इस
प्रकार वात्स्यायन भाष्य में किया गया है । अर्थात् प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञात
लिङ्ग द्वारा अर्थ के अनु अर्थात् पीछे से उत्पन्न होने वाले ज्ञान को
अनुमान कहते हैं । यह तो अनुमान शब्द की निरुक्ति या व्युत्पत्ति हुई और
उससे वस्तुतः अनुमान प्रमाण के फल 'अनुमिति' का ज्ञान होता है ।
परन्तु अनुमान प्रमाण का लक्षण 'लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम्' अर्थात् 'लिङ्ग' के
'परामर्श' को 'अनुमान' कहते हैं यह किया गया है । इस लक्षण में 'लिङ्ग'
और 'मरामर्श' दो शब्द हैं । इनके स्पष्टीकरण के बिना लक्षण स्पष्ट नहीं हो
सकता है । अतएव 'लिङ्ग' और 'परामर्श' इन दोनों का अर्थ स्पष्ट करना
चाहिए । लिङ्ग' का लक्षण है 'व्याप्तिबलेन अर्थगमकं लिङ्गम्' । अर्थात् व्याप्ति
बल से जो अर्थ का बोधक है उसको लिङ्ग कहते हैं । इस लक्षण में फिर एक
'व्याप्ति' शब्द नया आ गया है। अतः उसकालक्षण करना आवश्यक हो गया ।
व्याप्ति का अर्थ है 'साहचर्य नियम' । 'यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्निः' जहां जहां धुंआ
होता है वहां वहां अग्नि होती है इस साहचर्य नियम को व्याप्ति कहते हैं । इस
व्याप्ति के बल से जो अर्थ का बोधक हो उसको 'लिङ्ग' कहते हैं । जैसे धूम
वह्नि का लिङ्ग है । पर्वतादि पर धूम को देख कर जहां जहां धुंआ होता है
वहां वहां वह्नि होती है इस साहचर्य नियम या व्याप्ति के आधार पर अप्रत्यक्ष
वह्नि का ज्ञान होता है। इसलिए धूम वह्नि का लिङ्ग कहलाता है। लिङ्ग शब्द की
निरुक्ति या व्युत्पत्ति 'लीनम् अप्रत्यक्षं अर्थं गमयति इति लिङ्गम्' यह की गई है।
इस प्रकार 'लिङ्ग' का लक्षण हो जाने के बाद दूसरा शब्द 'परामर्श' रह
जाता है । परामर्श के अर्थ दो प्रकार से किए जाते हैं। 'लिङ्गस्य तृतीयं ज्ञानं
परामर्शः' या 'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं परामर्शः' । अर्थात् लिङ्ग के तृतीय
ज्ञान को 'परामर्श' कहते हैं अथवा 'व्याप्तिविशिष्टपक्षधर्मताज्ञान' को 'परामर्श'
कहते हैं । इसका उपपादन आगे करेंगे ।
लिङ्गपरामर्श को अनुमान कहते हैं । जिस से अनुमिति [ अनु पश्चान्मितिः,
प्रमितिः ] हो उसको अनुमान कहते हैं । और लिङ्ग के परामर्श से अनुमिति होती
१ न्यायदर्शन वात्स्यायन भाष्य १, १, ३ ।