तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ६८ | तर्कभाषा | [ प्रत्यक्षे बौद्धमतम् |
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उसका कारण मानना होगा। परन्तु बौद्धमत में 'जाति' कोई भावभूत पदार्थ नहीं
है। इसलिए उससे उत्पन्न होने वाला सविकल्पक ज्ञान 'अर्थज' नहीं है। इसलिए
'अर्थज' न होने से उसको प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता है ।
बौद्ध 'जाति' को भावभूत पदार्थ नहीं मानते हैं इसका कारण यह है कि
नैयायिकों की अभिमत 'जाति' नित्य पदार्थ है। 'नित्यत्वे सति अनेकसमवेतत्वम्'
यह जाति का लक्षण नैयायिक मानते हैं । अर्थात् उनकी 'जाति' अथवा 'सामान्य'
नित्य पदार्थ है। परन्तु बौद्धदर्शन का प्रथम सिद्धान्त 'क्षणभङ्गवाद' है। बौद्धों
के मत में सब कुछ क्षणिक है। संसार में कोई भी नित्य पदार्थ नहीं है। अतएव
नैयायिक जिस नित्य 'जाति' को मानना चाहता है क्षणभङ्गवादी बौद्ध के लिए
उसका मानना सम्भव ही नहीं है। फलतः बौद्ध जाति को पदार्थ नहीं मानते ।
इसीलिए 'सामान्य' विषयक सविकल्पक को भी 'अर्थज' न होने से वह प्रमाण
नहीं मानते हैं !
अब यह प्रश्न हो सकता है कि जब बौद्ध 'जाति' या 'सामान्य' को नहीं
मानते हैं तब 'जाति' का काम वह कैसे निकालते हैं । न्यायसिद्धान्त में 'जाति'
का कार्य 'अनुगत प्रतीति' कराना है । 'अनुवृत्ति प्रत्ययहेतुः सामान्यम्'१
अनुवृत्ति प्रत्यय अर्थात् अनुगत प्रतीति अर्थात् एकाकार प्रतीति का जो कारण
है उसको 'सामान्य' कहते हैं। दश घट व्यक्ति उपस्थित है। उन सब में 'अयं
घटः' 'अयं घटः' इस प्रकार की एकाकार प्रतीति होती है । इस एकाकार
प्रतीति का कारण उनमें रहने वाला 'घटत्व सामान्य' है । सब घटों में घटत्व
नाम का एक साधारण धर्म रहता है। इसी के कारण सब घटों में 'अयं घटः'
'अयं घटः' इस प्रकार की एकाकार प्रतीति होती है । इसी अनुगतप्रतीति के
हेतुको 'सामान्य' या 'जाति' कहते हैं ।
इस प्रकार 'जाति' या 'सामान्य' का कार्य 'अनुवृत्ति प्रत्यय' अर्थात् एकाकार,
प्रतीति को उत्पन्न करना है ! जब बौद्ध लोग 'सामान्य' को भाव पदार्थ नहीं मानते हैं
तब उनके मत में इस एकाकार प्रतीति की उत्पत्ति कैसे होती है। इस प्रश्न के समाधान
के लिए बौद्ध दार्शनिक 'अपोह' की कल्पना करते हैं। उनके 'अपोह' शब्द का अर्थ
'अतद्व्यावृत्ति' अर्थात् 'तद्भिन्न, भिन्नत्व' है । तत् शब्द से घट आदि का
ग्रहण करना चाहिए। अतद् माने अघट अर्थात् घट भिन्न सम्पूर्ण जगत्, उससे
भिन्न फिर घट ही होगा। इसलिए प्रत्येक घट, अतद्व्यावृत्त या तद्भिन्न से
भिन्न है। इसी कारण घट कहलाता है। इस प्रकार प्रत्येक घट में 'अतद्व्यावृत्ति
या' तद्भिन्नभिन्नत्व' जिसे 'अपोह' भी कहते हैं होने के कारण ही एकाकार प्रतीति
१. तर्कभाषा सा ० पृ० ।