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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 330 में से

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पृष्ठ 141

७६ तर्कभाषा [ उपाधिनिरूपणम्
ग्योऽयोग्यो वा । अयोग्यस्य शङ्कितुमशक्यत्वात्, योग्यस्य चानुपल-
भ्यमानत्वात् । यत्रोपाधिरस्ति तत्रोपलभ्यते । यथाग्नेर्धूमसम्बन्धे
आर्द्वेन्धनसंयोगः । हिंसात्वस्य चाधर्मसाधनत्वेन सह सम्बन्धे निषिद्ध-
त्वमुपाधिः । मैत्रीतनयत्वस्य च श्यामत्वेन सह सम्बन्धे शाकाद्यन्न-
परिणतिभेदः ।
न चेह धूमस्याग्निसहचर्ये कश्चिदुपाधिरस्ति । यद्यभविष्यत्ततोऽद्रक्ष्यत्,
ततो दर्शनाभावान्नास्ति । इति तर्कसहकारिणानुपलम्भसनाथेन । प्रत्य-
क्षेणैवोपाध्यभावोऽवधार्यते । तथा च उपाध्यभावग्रहणजनितसंस्कारसह-
कृतेन साहचर्यग्राहिणा प्रत्यक्षेणैव धूमाग्न्योर्व्याप्तिरवधार्यते। तेन धूमाग्न्योः
स्वाभाविक एव सम्बन्धो न त्वौपाधिकः । स्वाभाविकश्च सम्बन्धो व्याप्तिः ।
अग्नि के सम्बन्ध में कोई उपाधि ] है तो [ वह उपाधि प्रत्यक्ष होने के ] योग्य है
अथवा अयोग्य । [ यदि प्रत्यक्ष होने के अयोग्य उपाधि है, यह कहना चाहें तो
ठीक नहीं है क्योंकि ] अयोग्य [ है तो उस ] की शङ्का करना भी उचित नहीं
[ जिस उपाधि का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है वह है ही इस में क्या प्रमाण होगा ।
इसलिए उसकी शङ्का भी करना अनुचित है । अर्थात् अयोग्य उपाधि है यह नहीं
कह सकते । ] और [ प्रत्यक्ष के ] योग्य [ उपाधि ] की उपलब्धि नहीं होती ।
[ यत्र यत्र वह्निस्तत्र तत्र धूमः इत्यादि स्थलों में ] जहाँ [ आर्द्वेन्धन संयोग आदि
रूप ] उपाधि है वहाँ उपलब्ध होती है जैसे १ अग्नि के धूम के साथ [ यत्र यत्र
अग्निस्तत्र तत्र धूमः ] इस सम्बन्ध में आर्द्वेन्धन संयोग [ उपाधि है तो वह उप-
लब्ध भी होती है ] और २ हिंसात्व के अधर्म साधनत्व के साथ सम्बन्ध में
निषिद्धत्व उपाधि है और ३ मैत्रीतनयत्व के श्यामत्व के साथ [ यत्र यत्र मैत्री-
तनयत्वं तत्र तत्र श्यामत्वं ] इस सम्बन्ध में शाकादि अन्न परिणाम भेद [ शाक-
पाक-जन्यत्व उपाधि है और उपलब्ध होती है ]
यहाँ धूम के अग्नि के साथ साहचर्य में कोई उपाधि नहीं है । यदि होती तो
दिखाई देती । दिखाई नहीं देती अतः नहीं है । इस प्रकार तर्क सहकृत और
अनुपलब्धियुक्त प्रत्यक्ष से ही उपाधि का अभाव निश्चय होता है । इसलिए उपाधि
के अभाव के ज्ञान से उत्पन्न संस्कार से सहकृत और भूयः सहचार दर्शन जन्य
संस्कार के सहकृत [ धूम तथा अग्नि के ] साहचर्य को ग्रहण कराने वाले प्रत्यक्ष
[प्रमाण] से ही धूम और अग्नि की व्याप्ति गृहीत होती है । इसलिए धूम और अग्नि
का स्वाभाविक सम्बन्ध ही है औपाधिक नहीं । और स्वाभाविक सम्बन्ध [को ही]
व्याप्ति [ कहते ] हैं ।