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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 330 में से

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पृष्ठ 140

उपाधि निरूपणम् ] अनुमाननिरूपणम् ७५
यद्यपि यत्र यत्र मैत्रीतनयत्वं तत्र तत्र श्यामत्वमपीति भूयो दर्शनं
समानमवगम्यते, तथापि मैत्रीतनयत्वश्यामत्वयोर्न स्वाभाविकः सम्बन्धः
किन्तूपाधिक एव । शाकाद्यन्नपरिणामस्योपाधेर्विद्यमानत्वात् ।
तथा हि श्यामत्वे मैत्रीतनयत्वं न प्रयोजकं किन्तु शाकाद्यन्नपरिणति-
भेद एव प्रयोजकः । प्रयोजकश्चोपाधिरित्युच्यते ।
न च धूमाग्न्योः सम्बन्धे कश्चिदुपाधिरस्ति । अस्ति चेत्, यो-
परन्तु जहां जहां मैत्रीतनयत्व होता है वहां वहां 'शाक-पाक-जन्यत्व' अवश्य
हो यह आवश्यक नहीं है । माता गर्भ-काल में शाकादि के स्थान पर दुग्ध
आदि का सेवन करे यह भी हो सकता है । ऐसी दशा में 'यत्र यत्र मैत्रीतनयत्वं
तत्र तत्र शाक-पाक-जन्यत्वं' यह आवश्यक न होने से साधनाव्यापकत्व हुआ ।
इस प्रकार 'शाक-पाक-जन्यत्व' रूप 'उपाधि' के वर्तमान होने से 'मैत्री तन-
यत्व' और श्यामत्व का स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं है अपितु औपाधिक सम्बन्ध है।
इससे यह सिद्ध हुआ कि यद्यपि 'भूयः सहचार दर्शन' से स्वाभाविक
सम्बन्ध अथवा व्याप्ति का निश्चय होता है परन्तु जहां एक भी स्थल में उनके
सहचार का अभाव अथवा व्यभिचार का ग्रहण हो जाता है वहां वह 'भूयः
सहचार दर्शन' भी व्यर्थ हो जाता है और वह उनके स्वाभाविक सम्बन्ध का बोध
नहीं करा सकता है । इसलिए केवल 'भूयः सहचार दर्शन' ही व्याप्ति ग्राहक
नहीं है अपितु उसके साथ व्यभिचार का अदर्शन होना भी आवश्यक है ।
अर्थात् 'व्यभिचारादर्शनसहकृत भूयः सहचार दर्शन' व्याप्ति का ग्राहक होता
है । भूयः सहचार दर्शन होते हुए मैत्रीतनयत्व और श्यामत्व का उपाधि स्थल
में व्यभिचार दर्शन हो जाने से व्याप्ति सिद्ध नहीं हो सकती । अतः उनका
स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं है । यही आगे कहते हैं ।
यद्यपि जहां जहां मैत्रीतनयत्व है वहां वहां श्यामत्व भी है इस प्रकार [मैत्री-
तनयत्व और श्यामत्व का भूयःसहचार मैत्री के चार पुत्रों में, धूम और वह्नि के
भूयः सहचार दर्शन के समान] भूयो दर्शन समान रूप से प्रतीत होता है । फिर
भी मैत्रीतनयत्व और श्यामत्व का स्वाभाविक सम्बन्ध नहीं है अपितु औपाधिक
[ सम्बन्ध ] ही है । शाकादि अन्न परिणाम रूप उपाधि के विद्यमान होने से ।
क्योंकि श्यामत्व का प्रयोजक मैत्रीतनयत्व नहीं है किन्तु शाकादि अन्न परिणाम
ही [ श्यामत्व में ] प्रयोजक है । प्रयोजक को ही उपाधि कहते हैं ।
[ प्रकृत में ] धूम और अग्नि के सम्बन्ध में कोई उपाधि नहीं है । [ इसलिए
उनका सम्बन्ध स्वाभाविक सम्बन्ध अथवा व्याप्ति है । यदि यह कहो कि धूम और
अग्नि के सम्बन्ध में भी कोई उपाधि है तो प्रश्न यह होगा कि ] यदि [ धूम और