तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याप्तिक्रमः ] ८१
वात् । एवं यत्राग्निर्नास्ति तत्र धूमोऽपि नास्ति यथा महाह्रदे इतीयं व्यति-
रेकव्याप्तिः । महाह्रदे धूमाग्न्योर्व्यतिरेकस्य सद्भावदर्शनात् ।
व्यतिरेकव्याप्तेस्त्वयं क्रमः । अन्वयव्याप्तौ यद्व्याप्यं तदभावोऽत्र
व्यापकः । यच्च व्यापकं तदभावोऽत्र व्याप्य इति । तदुक्तम्—
व्याप्यव्यापकभावो हि भावयोर्यादृगिष्यते ।
तयोरभावयोस्तस्माद् विपरीतः प्रतीयते ॥
अन्वये साधनं व्याप्यं साध्यं व्यापकमिष्यते ।
तदभावोऽन्यथा व्याप्यो व्यापकः साधनात्ययः ॥
व्याप्यस्य वचनं पूर्वं व्यापकस्य ततः परम् ।
एवं परीक्षिता व्याप्तिः स्फुटीभवति तत्त्वतः १ ॥
महानस [ रसोई घर ] में धूम और अग्नि के सद्भाव होने से । इसी प्रकार जहां
अग्नि नहीं होती है वहाँ धूम भी नहीं होता जैसे महाह्रद [ तालाब ] में । यह
व्यतिरेक व्याप्ति हुई । महाह्रद में धूम और अग्नि के व्यतिरेक [ अभाव ] होने
से । [ वहाँ अग्नि के अभाव में धूम का अभाव होने से व्यतिरेक व्याप्ति होती है ।
इस प्रकार अन्वय व्याप्ति में महानस, और व्यतिरेक व्याप्ति में महाह्रद, यह दोनों
उदाहरण बन जाते हैं अतएव धूमवत्त्व हेतु अन्वयव्यतिरेकी हेतु है ]
व्यतिरेक व्याप्ति [ के बनाने ] का तो यह क्रम है । [ कि ] अन्वयव्याप्ति में
जो व्याप्य [ होता है उसका अभाव यहाँ [ व्यतिरेक व्याप्ति में ] व्यापक [ होता
है ] और जो व्यापक होता है उसका अभाव यहाँ व्याप्य होता है । जैसा कि
[ कुमारिल भट्ट ने अपने श्लोकवार्तिक नामक ग्रन्थ में ] कहा है—
भाव अर्थात् सत्पदार्थों [ धूम और अग्नि ] का जैसा व्याप्य व्यापक भाव
[ धूम अर्थात् साधन व्याप्य और साध्य अर्थात् वह्नि व्यापक ] होता है उनके
अभाव [ अर्थात् वह्न्यभाव और धूमाभाव ] का उसके उल्टा [ वह्न्यभाव व्याप्य
और धूमाभाव व्यापक ] होता है ।
अन्वय [ व्याप्ति ] में साधन [ हेतु ] व्याप्य और साध्य व्यापक होता है ।
उससे भिन्न [ व्यतिरेक व्याप्ति ] में साध्याभाव व्याप्य और साधनाभाव व्यापक
होता है ।
[ व्याप्ति के बोलते समय ] व्याप्य को पहिले [ यत्र यत्र के साथ ] और
व्यापक को उसके बाद [ तत्र तत्र के साथ ] बोलना चाहिए । इस प्रकार भली
प्रकार से परीक्षित हुई व्याप्ति तत्त्वतः स्पष्ट हो जाती है ।
१. श्लोकवार्तिकम् १२१-१२३ ।
६ त० भा०