तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसांख्ये चाक्षुष प्रक्रिया ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ६५
इन्द्रियेण सहा१र्थस्य सम्बन्धः कुत्र जायते ।
अक्षदेशेऽर्थदेशे वा व्यवस्था चात्र भिद्यते ॥
चक्षुषो गमनं केचिदर्थदेशे तु मन्वते ।
इन्द्रियान्तरदेशे च सम्बद्धं विषयान्तरम् ॥
प्रकाशस्य तु रश्मीनां प्रतिषेपात् पदार्थतः ।
चक्षुषि भाष्यकृद्योगं विज्ञानं मनुते तथो२ ॥
चाक्षुषप्रत्यक्ष के विषय में सांख्यादि की प्रक्रिया—
सांख्य, योग तथा वेदान्त दर्शन की प्रत्यक्षादि ज्ञान की प्रक्रिया न्याय की
प्रक्रिया से कुछ भिन्न है। उन तीनों दर्शनों ने अन्तःकरण अथवा मन को
‘वस्तु प्राप्य प्रकाशकारी माना है जब कि न्याय वैशेषिक तथा बौद्ध आदि
दर्शन मन को ‘वस्तु प्राप्य प्रकाशकारी’ नहीं मानते हैं। सांख्य आदि की
इस प्रक्रिया का आशय यह है कि उनके मत में इन्द्रिय प्रणालिका द्वारा
चित्त अथवा मन का बाह्य घट पट आदि वस्तुओं के साथ सम्बन्ध होता है।
और उस सम्बन्ध के होने से चित्त अर्थाकार में परिणत हो जाता है। चित्त
की इस अर्थाकार परिणति को वह ‘चित्तवृत्ति’ या ‘बुद्धिवृत्ति’ कहते हैं।
उनके मत में अन्तःकरण एक तैजस द्रव्य के समान है। जिस प्रकार नाली
के द्वारा जल खेत की क्यारियों में पहुँचकर चौकोर षट्कोण आदि जिस
आकार की क्यारी उसे मिलती है उसी आकार में परिणत हो जाता
है, उसी प्रकार इन्द्रिय प्रणालिका द्वारा अन्तःकरण भी अर्थाकार में
परिणत हो जाता है । अन्तःकरण की इस अर्थाकार परिणति
का नाम ‘चित्तवृत्ति’ है। और इस ‘वृत्ति’ में पुरुष या चैतन्य आत्मा का
प्रतिबिम्ब होने से अथवा चैतन्य आत्मा में ‘बुद्धिवृत्ति’ का प्रतिबिम्ब होने से
पुरुष या आत्मा को उस अर्थ का बोध होता है। इस बोध को सांख्य में
‘पौरुषेय बोध’ कहा है। उसके मत में ‘बुद्धिवृत्ति’ ‘प्रमाण’ है और उससे होने
वाला ‘पौरुषेय बोध’ फल या ‘प्रमा’ कहलाता है। जब कभी ‘बुद्धिवृत्ति’ के
लिये ‘प्रमा’ शब्द का प्रयोग होता है उस समय ‘इन्द्रिय’ को ‘प्रमाण’ कहा
जायगा। परन्तु अधिकांश में ‘बुद्धिवृत्ति’ को प्रमाण और ‘पौरुषेय बोध’ को
‘प्रमा’ कहा जाता है। ‘योगदर्शन’ के ‘व्यासभाष्य’ में इस प्रक्रिया का वर्णन
करते हुये लिखा है—
ईन्द्रियप्रणालिकया चित्तस्य बाह्यवस्तूपरागात् तद्विषया सामान्यविशेषा-
१ दर्शन मीमांसा ४। २ योगदर्शन व्या० भा० १,७ ।
५ त० भा०