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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 330 में से

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पृष्ठ 144

स्वार्थानुमानम् ] अनुमाननिरूपणम् ७६
दयेन व्याप्तिस्मृतेरप्यनुमितिहेतुत्वात् । धूमदर्शनाच्चोद्बुद्धसंस्कारो व्याप्तिं
स्मरति । यो यो धूमवान् स सोऽग्निमान् यथा महानस इति । तेन
धूमदर्शने जाते व्याप्तिस्मृतौ भूतायां यद्धूमज्ञानं तत् तृतीयं 'धूमवांश्चा-
यम्' इति । तदेवाग्निमनुमापयति नान्यत् । तदेवानुमानम् । स एव
लिङ्गपरामर्शः । तेन व्यवस्थितमेत—ल्लिङ्गपरामर्शोऽनुमानमिति ।
तच्चानुमानं द्विविधम् । स्वार्थं परार्थं चेति । स्वार्थं स्वप्रतिपत्तिहेतुः ।
तथा हि स्वयमेव महानसादौ विशिष्टेन प्रत्यक्षेण धूमाग्न्योर्व्याप्तिं गृहीत्वा-
पर्वतसमीपं गतस्तद्गते चाग्नौ सन्दिहानः पर्वतवर्तिनीमविच्छिन्नमूला-
मभ्रंलिहां धूमलेखां पश्यन् धूमदर्शनाच्चोद्बुद्धसंस्कारो व्याप्तिं स्मरति ।
यत्र धूमस्तत्राग्निरिति । ततोऽत्रापि धूमोऽस्तीति प्रतिपद्यते । तस्मादत्र
पर्वतेऽग्निरप्यस्तीति स्वयमेव प्रतिपद्यते । तत्स्वार्थानुमानम् ।
स्मृति के अभाव में अनुमिति नहीं हो सकती है । अतः [ द्वितीय बार के ] धूम
दर्शन से उद्बुद्ध संस्कार [ पुरुष ] 'जो जो धूमवान् होता है वह वह वह्निमान्
होता है' इस रूप में व्याप्ति को स्मरण करता है । इसलिए धूम दर्शन होने के
बाद व्याप्ति स्मृति होने पर जो धूमज्ञान [होता है] वह तृतीय 'धूमवांश्चायं पर्वतः'
यह पर्वत धूमवान् है इस प्रकार का जो ज्ञान होता है वही अग्नि का अनुमान
कराता है । उससे भिन्न [ प्रथम या द्वितीयादि ] अन्य कोई नहीं । उसी [ तृतीय
ज्ञान ] को 'अनुमान' कहते हैं । वही 'लिङ्ग परामर्श' [ लिङ्ग का तृतीय ज्ञान ]
है । इसलिए 'लिङ्गपरामर्शो अनुमानम्' यह लक्षण स्थिर हुआ ।
अनुमान के भेद—
वह अनुमान स्वार्थ [ अनुमान ] और परार्थ [ अनुमान ] इस प्रकार दो
तरह का है । स्वयं अपने ज्ञान का हेतु [ भूत अनुमान ] स्वार्थानुमान
[ कहलाता ] है । जैसे महानस आदि में विशेष प्रत्यक्ष से स्वयं ही धूम और
अग्नि की व्याप्ति को ग्रहण कर के पर्वत के समीप गया हुआ और पर्वतगत अग्नि
के विषय में [ पर्वत में अग्नि है या नहीं इस प्रकार का ] सन्देह करता हुआ पर्वत
पर विद्यमान अविच्छिन्नमूला धूम की रेखा को देख कर, धूम के दर्शन से
[ संस्कार का उद्बोध हो जाने से ] उद्बुद्ध संस्कार [ वाला पुरुष ], जहाँ धूम
होता है वहाँ अग्नि होती है' इस व्याप्ति को स्मरण करता है । उसके बाद यहाँ
[ पर्वत में ] भी धूम है इस प्रकार [ तृतीय बार पर्वत में वह्नि व्याप्य धूम को ]
जानता है । इसलिए इस पर्वत पर अग्नि भी है इस प्रकार स्वयमेव [ पर्वत पर
अग्नि को ] जान लेता है । वही स्वार्थानुमान है ।