सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

प्रमाकरणम् ] प्रमाणनिरूपणम् ४५
उच्यते। सत्यपि प्रमातरि प्रमेये च, प्रमानुत्पत्तेरिन्द्रियसंयोगादौ
सति, अविलम्बेन प्रमोत्पत्तेरत इन्द्रियसंयोगादिरेव करणम्। प्रमायाः
साधकत्वाविशेषेऽप्यनेनैवोत्कर्षेणास्य प्रमात्रादिभ्योऽतिशयितत्वाद्-
तिशयितं साधकं साधकतमं तदेव करणमित्युक्तम्। अत इन्द्रियसंयोगा-
दिरेव प्रमाकरणत्वात् प्रमाणं न प्रमात्रादि।
तानि च प्रमाणानि चत्वारि। तथा च न्यायसूत्रम् :—
‘प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि¹।
इति।
[ उत्तर ] कहते हैं। प्रमाता और प्रमेय के होने पर भी [ इन्द्रिय सन्निकर्ष
के बिना ] प्रमा की उत्पत्ति न होने से, और इन्द्रिय संयोगादि के होने पर
अविलम्ब प्रमा की उत्पत्ति होती है इसलिए इन्द्रिय संयोगादि ही [ प्रमा का ]
करण है। [प्रमाता प्रमेय और प्रमाण तीनों में] प्रमा के साधकत्व में [समानता
होने पर भी या ] भेद न होने पर भी इसी उत्कर्ष के कारण [ कि इन्द्रिय संयोग
के होने पर अविलम्ब प्रमा उत्पन्न हो जाती है ] इस [ इन्द्रिय संयोगादि ] का
प्रमाता आदि की अपेक्षा अतिशय होने से और अतिशय युक्त साधन के ही
साधकतम होने से वही करण कहा जाता है। इसलिए प्रमा का करण होने से
इन्द्रिय संयोगादि ही प्रमाण कहा जाता है। प्रमाता आदि नहीं।
और वह प्रमाण चार [ प्रकार का ] है जैसा कि न्यायसूत्र [ में कहा ] है
प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द [ चारों ] प्रमाण हैं।
इस प्रकार प्रमाण के सामान्य लक्षण के प्रसङ्ग में १ प्रमा का लक्षण,
२ करण का लक्षण, ३ कारण का लक्षण, ४ अन्यों के कारण लक्षण का खंडन,
५ कारण के त्रिविध भेद, ६ समवायिकारण असमवायिकारण निमित्तकारण
के लक्षण, ७ समवाय और संयोग सम्बन्ध का निरूपण, ८ निर्गुणोत्पत्ति का
निरूपण, और ९ धारावाहिक ज्ञान के प्रामाण्य का निरूपण यह सब इस
प्रसक्तानुप्रसक्त रूप से ग्रन्थकार ने इस प्रकरण में दिखाने का प्रयत्न किया है।
अब आगे प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों में से एक-एक को लेकर उसका निरूपण
करेंगे। उनमें सबसे पहिले प्रत्यक्ष प्रमाण का निरूपण प्रारम्भ करते हैं।
१ न्यायसूत्र १, १, ३।

४६ तर्कभाषा [ प्रत्यक्षम्
प्रत्यक्षम्
किं पुनः प्रत्यक्षम् ?
साक्षात्कारिप्रमाकरणं प्रत्यक्षम् । साक्षात्कारिणी च प्रमा सैवोच्यते
या इन्द्रियजा । सा च द्विधा सविकल्पकनिर्विकल्पकभेदात् । तस्याः करणं
त्रिविधम् । कदाचिद् इन्द्रियं, कदाचित् इन्द्रियार्थसन्निकर्षः, कदाचिज् ज्ञानम् ।
[ प्रश्न ] फिर प्रत्यक्ष किसको कहते हैं ?
[ उत्तर ] साक्षात्कारिणी प्रमा के करण को प्रत्यक्ष कहते हैं । और साक्षा-
त्कारिणी प्रमा उसको ही कहते हैं जो इन्द्रिय जन्य [ प्रमा ] होती है । वह दो
प्रकार की है [एक] सविकल्पक और [दूसरी] निर्विकल्पक भेद से । उसके करण
तीन प्रकार के हैं । १ कभी इन्द्रिय २ कभी इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष, और
कभी ( निर्विकल्पक ) ज्ञान ।
'प्रत्यक्ष' शब्द का प्रयोग मुख्यतः, साक्षात्कारिणी प्रमा के 'करण' के लिए
होना चाहिए । परन्तु उस करण से उत्पन्न होने वाली प्रमा जो उस प्रमाण का
फल है वह भी 'प्रत्यक्ष' नाम से व्यवहार में कही जाती है । अन्य प्रमाणों में
तो फल और करण में अलग-अलग शब्द प्रयुक्त होते हैं । जैसे अनुमान प्रमाण
के फल के लिए अनुमिति, उपमान प्रमाण के फल के लिए उपमिति, शब्द
प्रमाण के फल के लिए शाब्दबोध, शब्दों का प्रयोग प्रायः होता है । इसलिए
उनमें 'प्रमाण' और 'प्रमा' का व्यवहार भिन्न-भिन्न शब्दों से होता है । परन्तु
प्रत्यक्ष स्थल में 'प्रमाण' और 'प्रमा' दोनों के लिए ही प्रत्यक्ष पद का प्रयोग
होता है । इसलिए यथास्थान उसका उचित अर्थ ग्रहण करना चाहिए ।
प्रत्यक्ष ज्ञान के दो भेद किए हैं एक 'सविकल्पक' और दूसरा 'निर्विक-
ल्पक' । 'नामजात्यादियोजनासहितं सविकल्पकम्' अर्थात् जिसमें वस्तु के स्वरूप
की प्रतीति के साथ उसके नाम जाति आदि का भी भान होता है उसको
सविकल्पक कहते हैं । जैसे घटः पटः आदि की प्रतीति के साथ उनके नाम
जात्यादि का भान होने से, साधारणतः व्यवहार में आने वाले सभी ज्ञान सवि-
कल्पक के उदाहरण हैं । परन्तु जहां केवल वस्तु का स्वरूप प्रतीत होता है
उसके नाम जाति आदि की प्रतीति नहीं होती उसको निर्विकल्पक ज्ञान कहते
हैं । साधारणतः हमारे सभी व्यवहार में आने वाले ज्ञान सविकल्पक ही होते
हैं । इसलिए हम निर्विकल्पक ज्ञान की कल्पना नहीं कर पाते हैं । इसलिए
निर्विकल्पक ज्ञान का उदाहरण विशेष रूप से बालक तथा गूंगे आदि पुरुषों
के ज्ञान को बताया गया है ॥

प्रत्यक्षम् ] प्रमाणनिरूपणम् ४७
'बालमूकादिविज्ञानसदृशं निर्विकल्पकम्' ।
जैसे बालक एक घड़ी को देखता है तो उसको भी घड़ी के स्वरूप का
ज्ञान उसी प्रकार का होता है जिस प्रकार बड़े व्यक्ति को। जहाँ एक वस्तु के
स्वरूपज्ञान का सम्बन्ध है बड़े और अत्यन्त अबोध बालक के ज्ञान में कोई
अंतर नहीं है। अर्थात् अर्थ के ग्रहण काल में दोनों का ज्ञान एकसा ही होता
है। परन्तु बड़ा व्यक्ति उसके नाम जाति आदि को भी जानता है अतएव
व्यवहार काल में वह उसके नाम जाति का उपयोग करता है। उस अवस्था में
उसका वह ज्ञान सविकल्पक हो जाता है। बालक उसके नाम जाति आदि से
अनभिज्ञ है इसलिए वह नाम आदि से उसका व्यवहार नहीं कर सकता है।
इस प्रकार बालक और प्रौढ़ पुरुष के ज्ञान में अर्थज्ञानकाल में कोई अंतर नहीं
है अपितु व्यवहारकाल में उन दोनों में अन्तर हो जाता है। इस प्रकार बालक
और मूकादि पुरुषों का ज्ञान निर्विकल्पक और अन्य प्रौढ़ पुरुषों का ज्ञान
सविकल्पक ज्ञान है। अर्थ के ग्रहण काल में प्रौढ़ पुरुषों को भी बालक
के ज्ञान के समान नाम जात्यादि रहित निर्विकल्पक ज्ञान ही होता है।
परन्तु 'एकसम्बन्धिज्ञानमपरसम्बन्धिस्मारकम्' अर्थात् सम्बन्धियों में किसी एक
का ज्ञान तुरन्त ही दूसरे सम्बन्धी का स्मरण करा देता है इस नियम के
अनुसार प्रौढ़ पुरुष को अर्थ का स्वरूप ज्ञान होते ही अत्यन्त शीघ्रता से
उसके नाम जात्यादि का स्मरण हो जाता है। इसलिए उसका ज्ञान तुरन्त
सविकल्पक रूप में परिवर्तित हो जाता है।
इस ज्ञान के कारण तीन प्रकार के बताये हैं। एक इन्द्रिय, दूसरा
इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष और तीसरा ज्ञान अर्थात् निर्विकल्पक ज्ञान। इन तीनों के
आगे चौथे सविकल्पक ज्ञान और पांचवें हानोपादानोपेक्षाबुद्धि इन दो फलों को
और जोड़ लेने से पाँच कड़ी की एक शृङ्खला बन जाती है और उस से त्रिविध
करण का स्पष्टीकरण बहुत अच्छे और सरल ढंग से हो जाता है। इन पाँचों
में १ करण, २ अवान्तर व्यापार और ३ फल इन तीन का समावेश होता है।
इन पाँच की श्रृंखला में से यदि प्रथम को करण माना जाय तो दूसरे को
अवान्तर व्यापार और तीसरे को फल मानना चाहिए। इसी प्रकार यदि
दूसरे को करण माना जाय तो तीसरे को अवान्तर व्यापार और चौथे को
फल कहना चाहिए इसी प्रकार यदि तीसरे को करण मानेंगे तो चौथे को
अवान्तर व्यापार और पाँचवें को उसका फल कहना होगा। इस प्रक्रिया को
ध्यान में रख लेने से त्रिविध करणों को सरलता से समझा जा सकेगा। और
उनकी व्याख्या भी स्पष्ट हो जावेगी।
जब संख्या एक अर्थात् इंद्रिय को करण-मानेंगे तब तीसरा अर्थात् निर्वि-

४८ तर्कभाषा [ प्रत्यक्षम्
कदा पुनरिन्द्रियं करणम् ? यदा निर्विकल्परूपा प्रमा फलम् । तथा
हि, आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन । इन्द्रियाणां
वस्तुप्राप्यप्रकाशकारित्वनियमात् । ततोऽर्थसन्निकृष्टेनेन्द्रियेण निर्विकल्पकं
नामजात्यादियोजनाहीनं वस्तुमात्रावगाहि किञ्चिदिदमिति ज्ञानं जन्यते ।
तस्य ज्ञानस्येन्द्रियं करणं, छिदाया इवं परशुः । इन्द्रियार्थसन्निकर्षोऽवा-
न्तरव्यापारः छिदाकरणस्य परशोरिव दारुसंयोगः । निर्विकल्पकं ज्ञानं
फलं, परशोरिव छिदा ।
कल्पक ज्ञान उसका फल और बीच का दूसरा अर्थात् इन्द्रियार्थसन्निकर्ष
अवान्तर व्यापार होगा । अर्थात् इन्द्रिय को कब करण कहा जायगा जब
निर्विकल्पक ज्ञान को फल और इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को अवान्तर व्यापार माना
जाय । इसी प्रकार जब दूसरी संख्या के इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को करण माना
जायगा तब तीसरी संख्या के निर्विकल्पक ज्ञान को अवान्तर व्यापार और चौथी
संख्या के सविकल्पक ज्ञान को फल कहा जायगा । इसी प्रकार जब तीसरी
संख्या के निर्विकल्पक ज्ञान को करण कहा जायगा तब चौथी संख्या का सवि-
कल्पक ज्ञान अवान्तर व्यापार और पाँचवीं संख्या की हानोपादानोपेक्षाबुद्धि
फल होगी । इसी पद्धति से आगे तीन प्रकार के करणों की व्याख्या कहते हैं ।
[ प्रश्न ] फिर इन्द्रिय कब करण होती है ?
[ उत्तर ] जब [ तृतीय संख्या वाला ] निर्विकल्पक [ ज्ञान ] रूप प्रमा फल
होती है । जैसे कि [पहिले १] आत्मा का मन के साथ संयोग होता है [फिर २]
मन का इन्द्रिय के साथ [ ३ ] इन्द्रिय अर्थ के साथ [ संयुक्त होती है ] इन्द्रियों
के वस्तु को प्राप्त करके [ अर्थात् वस्तु से सम्बद्ध होकर ] ही अर्थ को प्रकाशित
[ अर्थात् पदार्थ का ज्ञान करा सकती है ऐसा ] करने का नियम होने से ।
तब [ अर्थात् इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष होने के बाद ] अर्थ से संयुक्त
इन्द्रिय के द्वारा नाम जाति आदि की योजना से रहित वस्तु [ के स्वरूप ] मात्र
का ग्रहण करने वाला यह कुछ [नाम जात्यादि रहित सी वस्तु] है इस प्रकार का
निर्विकल्पक ज्ञान उत्पन्न होता है। उस [नाम जात्यादि योजना रहित निर्विकल्पक]
ज्ञान का करण इन्द्रिय होती है । जैसे छेदन [ अर्थात् लकड़ी आदि के काटने
की ] क्रिया का [ करण ] फरसा [ होता है ] २ इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष
अवान्तर व्यापार होता है जैसे काटने के साधनभूत फरसे का [ लकड़ी के
काटने में ] लकड़ी [ दारु ] के साथ संयोग [ अवान्तर व्यापार होता है ]
[ और ३ संख्या का ] निर्विकल्पक ज्ञान फल [ होता है ] जैसे फरसे [ रूप
करण का फरसा और लकड़ी के संयोग रूप अवान्तर व्यापार द्वारा ] का [ फल ]
कटना [ होता है ] ।

त्रिविधं करणम् ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ४६
कदा पुनरिन्द्रियार्थसन्निकर्षः करणम् ?
यदा निर्विकल्पकानन्तरं सविकल्पकं नामजात्यादियोजनात्मकं
डित्थोऽयं, ब्राह्मणोऽयं, श्यामोऽयमिति विशेषणविशेष्यावगाहि ज्ञानमुत्प-
द्यते, तदेन्द्रियार्थसन्निकर्षः करणम् । निर्विकल्पकं ज्ञानमवान्तरव्यापारः,
सविकल्पकं ज्ञानम् फलम् ।
कदा पुनर्ज्ञानं करणम् ?
यदा, उक्तसविकल्पकानन्तरं हानोपादानोपेक्षाबुद्धयो जायन्ते तदा
निर्विकल्पकं ज्ञानं करणम् । सविकल्पकं ज्ञानमवान्तरव्यापारः, हानादि-
बुद्धयः फलम् ।
यहां इन्द्रिय को 'करण', निर्विकल्पक ज्ञान को 'फल' और उनके बीच में
होने वाले इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को 'अवान्तर व्यापार' बताया है । अवान्तर
व्यापार का लक्षण है 'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकोऽवान्तरव्यापारः' । जो स्वयं
तत् अर्थात् उस करण से जन्य हो और उस करण से जन्य = उत्पन्न होने वाले
अन्य फल का जनक हो उसको 'अवान्तर व्यापार' कहते हैं । जैसे कुल्हाड़ी से
लकड़ी के काटने में कुल्हाड़ी और लकड़ी का संयोग 'अवान्तर व्यापार' है ।
यह संयोग रूप 'अवान्तर व्यापार' तज्जन्य अर्थात् परशुजन्य है और साथ ही
परशुजन्य जो छेदन रूप फल है उसका जनक भी है । इसलिए 'तज्जन्यत्वे
सति' अर्थात् परशुजन्यत्वे सति 'तज्जन्यजनकः' अर्थात् परशुजन्यच्छिदाजनको
दारुपरशुसंयोगोऽवान्तरव्यापारः । दारु और परशु अर्थात् कुल्हाड़ी और लकड़ी
का संयोग 'अवान्तर व्यापार' है। इसी प्रकार इन्द्रियरूप करण से निर्विकल्पक
ज्ञानरूप फल की उत्पत्ति में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष रूप 'अवान्तर व्यापार' है।
क्योंकि वह इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष स्वयं इन्द्रियजन्य है और इन्द्रियजन्य
निर्विकल्पक ज्ञान का जनक है। अतः उसको 'अवान्तर व्यापार' कहते हैं।
२. और इन्द्रिय तथा अर्थ का सन्निकर्ष कब करण होता है ?
जब निर्विकल्पक के बाद नाम-जात्यादि योजना सहित यह डित्थ है [ नाम
युक्त प्रतीति ], यह ब्राह्मण है [ जातियुक्त प्रतीति ], यह श्याम है [ श्याम रूप,
गुणविशिष्ट प्रतीति ] इस प्रकार का विशेषणविशेष्य [ भाव ] विषयक ज्ञान
उत्पन्न होता है तब इन्द्रियार्थसन्निकर्ष करण, निर्विकल्पक ज्ञान अवान्तर व्यापार
और सविकल्पक ज्ञान फल [ होता ] है ।
३ और ज्ञान [ निर्विकल्पक ज्ञान ] कब करण होता है ?
जब उक्त सविकल्पक ज्ञान के अनन्तर [ ज्ञात वस्तु के ] परित्याग करने,
४ त० भा०

५० तर्कभाषा [ अवान्तरव्यापारः
तज्जन्यस्तज्जन्यजनकोऽवान्तरव्यापारः। यथा कुठारजन्यः कुठारदारु-
संयोगः कुठारजन्यच्छिदाजनकः। अत्र कश्चिदाह-सविकल्पकादीना-
मपीन्द्रियमेव करणम्। यावन्ति त्यान्तरालिकानि सन्निकर्षादीनि तानि
सर्वाण्यवान्तरव्यापार इति।
ग्रहण करने अथवा उपेक्षा करने की बुद्धि उत्पन्न होती है तब [ उस हान उपादान
अथवा उपेक्षा बुद्धि रूप फल के प्रति ] निर्विकल्पक ज्ञान करण [ होता है ]
सविकल्पक ज्ञान अवान्तर व्यापार और हानादि बुद्धि फल होती है।
इन तीनों करणों के निरूपण में 'अवान्तरव्यापार' शब्द का प्रयोग हुआ
है। अत एव 'अवान्तरव्यापार' किस को कहते हैं यह जिज्ञासा उत्पन्न होती
है। उसके निराकरण के लिए आगे 'अवान्तरव्यापार' का लक्षण करते हैं—
[ जो स्वयं ] तत् अर्थात् उस [ करण ] से जन्य हो और तज्जन्य अर्थात्
उस करण से जन्य, का जनक हो, वह अवान्तर व्यापार है। जैसे कुठारजन्य
कुठार दारु [ लकड़ी ] का संयोग कुठार से उत्पन्न होने वाली छेदन क्रिया का
जनक होता है।
यहां [ अर्थात् त्रिविध करण के प्रतिपादन होने ] पर कोई कहते हैं कि
सविकल्पक आदि सब ही [ फलों ] का करण [ केवल एक ] इन्द्रिय ही है और
बीच के जितने हैं वे सब अवान्तर व्यापार हैं। [ अर्थात् निर्विकल्पक ज्ञान की
उत्पत्ति में इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष रूप एक अवान्तर व्यापार है। सविकल्पक की
उत्पत्ति में इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष और निर्विकल्पक ज्ञान ये दो अवान्तर व्यापार हैं।
और हानोपादान उपेक्षा बुद्धि की उत्पत्ति में इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष, निर्विकल्पक ज्ञान
और सविकल्पक ज्ञान ये तोनों अवान्तर व्यापार हैं। ]
निर्विकल्पक ज्ञान के विषय में बौद्ध और जैन मत—
प्रत्यक्ष ज्ञान के इस निर्विकल्पक और सविकल्पक स्वरूप के विषय में
प्रायः तीन प्रकार के सिद्धान्त दार्शनिक क्षेत्र में पाए जाते हैं। बौद्ध दार्शनिक
केवल निर्विकल्पक को ही प्रत्यक्ष मानते हैं। 'दिङ्नागाचार्य' ने अपने 'प्रमाण
समुच्चय' में लिखा है:—
'प्रत्यक्षं कल्पनापोढं नामजात्याद्यसंयु¹तम्'
'दिङ्नागाचार्य' के समान ही 'धर्मकीर्ति' आदि बौद्ध आचार्यों ने भी केवल
निर्विकल्पक को ही प्रत्यक्ष माना है। सविकल्पक को नहीं। इसके विपरीत जैन
दर्शन की परम्परा में केवल सविकल्पक को ही प्रत्यक्ष माना गया है निर्विकल्पक
को नहीं। आचार्य हेमचन्द्र ने अपने जैन दर्शन की परम्परा के अनुसार सविक-
ल्पक को ही प्रत्यक्ष मानने के कारण निर्विकल्पक को 'अनध्यवसाय' रूप कह कर
१ प्रमाण समुच्चय १,

निर्विकल्पकं ज्ञानम् ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ५१
प्रमाण कोटि से भी बाहर रखा है। न्याय, वैशेषिक आदि वैदिक दर्शन की
परम्परा में सविकल्पक और निर्विकल्पक दोनों को प्रत्यक्ष माना है ।
'नाम-जात्यादि-योजनाहीनं वस्तुमात्रावगाहि ज्ञानं निर्विकल्पकम्' यह
निर्विकल्पक ज्ञान का लक्षण किया गया है। अर्थात् जिस में विशेष्य विशेषण
भाव आदि की प्रतीति न हो उस ज्ञान को 'निर्विकल्पक' कहते हैं। यह
'निर्विकल्पक' शब्द, न्याय, वैशेषिक आदि वैदिक परम्परा का शब्द है। इसको
'आलोचन मात्र' भी कहा गया है।
'अस्ति ह्यालोचनज्ञानं प्रथमं निर्विकल्पकम्¹'
ज्ञान की उत्पत्ति-प्रक्रिया में सर्वप्रथम इस प्रकार का वस्तुमात्रावगाहि
ज्ञान उत्पन्न होता है। इसको बौद्ध और जैन परम्परा में भी माना गया है। जैन
परम्परा जो निर्विकल्पक को प्रत्यक्ष नहीं मानती है वह भी इस प्रकार के ज्ञान
का अस्तित्व तो स्वीकार करती है किन्तु उसको 'दर्शन' नाम से कहती है।
निर्विकल्पक ज्ञान के विषय में वैयाकरण मत—
परन्तु मध्वाचार्य तथा बल्लभाचार्य की दो वेदान्त-परम्पराएँ और भर्तृहरि
तथा उनके पूर्ववर्ती वैयाकरणों की परम्परा, ज्ञान के उत्पत्तिक्रम में किसी प्रकार
के सामान्य मात्र बोध का अस्तित्व स्वीकार नहीं करती हैं। उक्त तीनों
परम्पराओं में विशेष्य विशेषण भाव रहित कोई ज्ञान स्वीकार नहीं किया गया
है। उनके मतानुसार प्रत्येक ज्ञान में किसी प्रकार के विशेष का भान अवश्य
होता है। कहीं कम हो कहीं अधिक यह दूसरी बात है। अतएव सारा ज्ञान
सविकल्पक ही होता है। और जहाँ कहीं निर्विकल्पक ज्ञान कहा जाता है वहाँ
उसका इतना ही अभिप्राय होता है कि उसमें अन्यों की अपेक्षा विशेष का
भान कम होता है। ज्ञान मात्र को सविकल्पक मानने वाली इन तीनों
परम्पराओं में भर्तृहरि की शाब्दिक परम्परा ही प्राचीन² है। मध्वाचार्य और
वल्लभाचार्य ने सम्भवतः उसी को अपना लिया है।
ज्ञान दो प्रकार का होता है एक परोक्ष और दूसरा अपरोक्ष । जिस ज्ञान
में कोई दूसरा ज्ञान करण होता है उसको परोक्ष कहते हैं। जैसे अनुमति में
व्याप्तिज्ञान, उपमिति में सादृश्यज्ञान और शाब्दबोध में पदज्ञान करण होता
है। अतएव यह तीनों 'ज्ञानकरणक ज्ञान' होने से 'परोक्ष' ज्ञान कहलाते हैं ।
प्रत्यक्ष ज्ञान में कोई दूसरा ज्ञान करण नहीं होता है। अतः वह अपरोक्ष ज्ञान
कहलाता है। अपरोक्ष ज्ञान का लक्षण 'ज्ञानकरणकान्यत्वमपरोक्षत्वम्' है ।
अर्थात् ज्ञानकरणक से भिन्न ज्ञान अपरोक्ष कहलाता है ।
१ श्लोक वार्तिक १७२ । २ इण्डियन साइकालाजी पृ० ५२-५४ ।

५२ तर्कभाषा [ निर्विकल्पकं ज्ञानम्
निर्विकल्पक ज्ञान का अस्तित्व मानने वाले सभी लोग उसको केवल प्रत्यक्ष
या अपरोक्ष मानते हैं परन्तु जैन परम्परा में जिसने निर्विकल्पक को 'दर्शन' नाम
से व्यवहृत किया है इस 'दर्शन' को परोक्ष भी माना है। क्योंकि उनके यहां परोक्ष
'मतिज्ञान' को भी सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहा है ।
प्रत्यक्ष के प्रकारान्तर से लौकिक और अलौकिक ये दो भेद प्रायः सभी को
स्वीकृत हैं। अस्मदादि लौकिक पुरुषों का प्रत्यक्ष लौकिक प्रत्यक्ष है । और वह
इन्द्रिय सन्निकर्ष आदि कारण सामग्री के होने पर ही सम्भव है। परन्तु योगियों
के प्रत्यक्ष के लिए इन्द्रिय सन्निकर्ष आदि कारण सामग्री की आवश्यकता नहीं है।
योगी जन अपनी योगज सामर्थ्य से इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष के बिना भी भूत, भविष्यत्,
सूक्ष्म, व्यवहित, विप्रकृष्ट सभी वस्तुओं को ग्रहण कर सकते हैं। उनका यह ज्ञान
यथार्थ और साक्षात्कारात्मक निर्विकल्पक ज्ञान होता है। इस प्रकार लौकिक और
अलौकिक दोनों प्रकार के निर्विकल्पक ज्ञान और उनकी कारण सामग्री के विषय
में प्रायः सभी निर्विकल्पकवादी एक मत हैं ।
परन्तु शाङ्कर वेदान्त में इस कारण सामग्री के विषय में एक नवीन मत
प्रस्तुत किया गया है। अन्य कोई दर्शन प्रत्यक्ष को छोड़कर अनुमानादि अन्य
किसी प्रमाण से अपरोक्ष ज्ञान अथवा निर्विकल्पक ज्ञान की उत्पत्ति नहीं
मानते हैं। परन्तु शाङ्कर वेदान्त में 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्य से अपरोक्ष
निर्विकल्पक की उत्पत्ति मानी है। और इसका उपपादन करने के लिए
'दशमस्त्वमसि' यह लौकिक उदाहरण दिया है। कोई व्यक्ति अपने साथियों की
गणना करता है वह एक से लेकर नौ तक हर एक व्यक्ति को गिन जाता है
परन्तु उसके दसवें साथी का उसको पता नहीं चलता है। तब उसको कोई
दूसरा व्यक्ति बताता है कि 'दशमस्त्वमसि'। इस वाक्य को सुनकर जैसे
दशम व्यक्ति रूप में उसको स्वयं अपना अपरोक्ष ज्ञान होता है। इसी प्रकार
'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों में भी शब्द प्रमाण से अपरोक्ष निर्विकल्पक ज्ञान
हो सकता है। इस प्रकार शाङ्कर वेदान्त में शब्द प्रमाण को भी अपरोक्ष
निर्विकल्पक ज्ञान की उत्पत्ति का कारण माना है।
निर्विकल्पक के प्रामाण्याप्रामाण्य विषयक द्विविध न्याय मत—
निर्विकल्पक ज्ञान के प्रामाण्य के विषय में भी जैसा कि ऊपर लिख आए
हैं कई पक्ष हैं। बौद्ध दर्शन तथा वेदान्त दर्शन तो निर्विकल्पक को ही प्रत्यक्ष
मानते हैं और उनके अनुसार निर्विकल्प ही मुख्यतः प्रमाण है। न्याय और
वैशेषिक दर्शन में सविकल्पक तथा निर्विकल्पक दोनों को ही प्रमाण माना है ।

षोढा सन्निकर्षः ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ५३
इन्द्रियार्थयोस्तु यः सन्निकर्षः साक्षात्कारिप्रमाहेतुः स षड्विध एव ।
तद्यथा, संयोगः, संयुक्तसमवायः, संयुक्तसमवेतसमवायः, समवायः, समवेतसमवायः
विशेष्यविशेषणभावश्चेति ।
तत्र यदा चक्षुषा घटविषयं ज्ञानं जयन्ते तदा चक्षुरिन्द्रियं, घटोऽर्थः।
परन्तु उनमें भी नव्य और प्राचीन भेद से कुछ मतभेद है । प्राचीन परम्परा के
अनुसार निर्विकल्पक को प्रमा रूप माना जाता है । जैसा कि श्रीधराचार्य ने
'कन्दली' के पृष्ठ १९८ पर स्पष्ट किया है। परन्तु नव्य न्याय में आकर निर्विकल्पक
ज्ञान के प्रमात्व विषय में दो प्रकार के मत हो गए हैं। 'न्यायसिद्धान्तमुक्तावली'
की कारिका १३४ में 'भ्रमभिन्नं ज्ञानमत्रोच्यते प्रमा' यहां भ्रम भिन्न ज्ञान को
प्रमा कहा है । इससे निर्विकल्पक ज्ञान भी भ्रम भिन्न होने से प्रमा श्रेणी में
आ जाता है । अर्थात् विश्वनाथ को निर्विकल्पक ज्ञान का प्रमात्व अभीष्ट है ।
परन्तु नव्य न्याय के प्रमुख व्यवस्थापक गङ्गेशोपाध्याय के अनुसार निर्वि-
कल्पक ज्ञान न प्रमा कहा जा सकता है और न अप्रमा । क्यों कि उनके यहाँ
प्रमात्व और अप्रमात्व दोनों प्रकारता [ विशेषणता ] आदि घटित ज्ञान हैं और
निर्विकल्पक ज्ञान प्रकारतादि शून्य है । इसलिए वह प्रमा और अप्रमा दोनों
से विलक्षण है । इस नव्य मत का उल्लेख करते हुए विश्वनाथ ने लिखा है:—
'अथवा तत्प्रकारं यज्ज्ञानं तद्वद्विशेष्यकम् ।
तत्प्रमा, न प्रमा नापि भ्रमः स्यान्निर्विकल्पकम् ॥
प्रकारतादिशून्यं हि सम्बन्धानवगाहि तत्' ।
अर्थात् प्रमात्व और अप्रमात्व दोनों प्रकारतादि [ विशेषणता आदि ] घटित
ज्ञान में रहते हैं और निर्विकल्पक ज्ञान प्रकारतादि से शून्य होता है । इसलिए
निर्विकल्पक ज्ञान को न प्रमा कहा जा सकता है और न अप्रमा कहा जा सकता
है इसलिए वह दोनों से विलक्षण है ।
इस प्रकार निर्विकल्पक ज्ञान अनेक रूपों में दार्शनिकों की चर्चा का
विषय रहा है ।
[ प्रत्यक्ष का कारणभूत ] इन्द्रिय और अर्थ का जो सन्निकर्ष साक्षात्कारि-
प्रमा का हेतु है वह छह प्रकार का ही है । १ संयोग, २ संयुक्तसमवाय, ३ संयुक्त-
समवेतसमवाय, ४ समवाय, ५ समवेत समवाय और ६ विशेष्यविशेषणभाव ।
१ उनमें, जब चक्षु से घटविषयक ज्ञान उत्पन्न होता है तब चक्षुः इन्द्रिय, और
घट अर्थ [ होता है और ] इन दोनों का सन्निकर्ष संयोग ही [ होता ] है ।
१—२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली का० १३४, १३५, १३६ ।

५४ तर्कभाषा [ षोढा सन्निकर्षः
अनयोः सन्निकर्षः संयोग एव, अयुतसिद्धयभावात् । एवं मनसाऽन्तरि-
न्द्रियेण यदात्मविषयकं ज्ञानं जन्यतेऽहमिति, तदा मन इन्द्रियम्,
आत्माऽर्थः, अनयोः सन्निकर्षः संयोग एव ।
कदा पुनः संयुक्तसमवायः सन्निकर्षः ?
यदा चक्षुरादिना घटगतरूपादिकं गृह्यते घटे श्यामं रूपमस्तीति,
तदा चक्षुरिन्द्रियं, घटरूपमर्थः, अनयोः सन्निकर्षः संयुक्तसमवाय एव ।
चक्षुःसंयुक्ते घटे रूपस्य समवायात् । एवं मनसाऽऽत्मसमवेते सुखादौ
गृह्यमाणे, अयमेव सन्निकर्षः ।
घटगतपरिमाणादिग्रहे चतुष्टयसन्निकर्षोऽप्यधिकं कारणमिष्यते ।
सत्यपि संयुक्तसमवाये तदभावे दूरे परिमाणाद्यग्रहणात्। चतुष्टयसन्निकर्षो
अयुतसिद्धि का अभाव होने से [ अर्थात् यदि चक्षुः और घट अयुतसिद्ध होते
तो उनका परस्पर समवाय सम्बन्ध होता । परन्तु यह दोनों अयुतसिद्ध नहीं हैं
इसलिए उनका सम्बन्ध संयोग ही है ]
इसी प्रकार अन्तःकरण मन से जब आत्मविषयक ज्ञान होता है तब मन,
इन्द्रिय और आत्मा अर्थ [ होता है और ] इन दोनों का मम्बन्ध संयोग ही
होता है । [ यह दो उदाहरण संयोग सन्निकर्ष के दिये । इनमें से प्रथम
बाह्येन्द्रिय के संन्निकर्ष का और दूसरा अन्तरिन्द्रिय अन्तःकरण-मन-के सन्निकर्ष
का है। आगे संयुक्तसमवाय सन्निकर्ष के भी इसी प्रकार के दो उदाहरण देते हैं ]
२ [ प्रश्न ] फिर संयुक्तसमवाय का सन्निकर्ष कब होता है ?
[ उत्तर ] जब चक्षुः आदि [ इन्द्रिय ] से घटगत रूपादिक [ गुण ] का
ग्रहण होता है कि घट में श्याम रूप है तब चक्षुः इन्द्रिय [ और ] घटरूप अर्थ
[ होता है ] और इन दोनों का सन्निकर्ष 'संयुक्तसमवाय' ही होता है । चक्षु से
संयुक्त घट में रूप का समवाय होने से [ चक्षु इन्द्रिय और घटरूप अर्थ का 'संयुक्त-
समवाय' सन्निकर्ष होता है । ]
इसी प्रकार [ अन्तरिन्द्रिय ] मन से आत्मा में रहने वाले सुखादि [ गुणों के
ग्रहण होने पर यह [ संयुक्तसमवाय ] सन्निकर्ष ही होता है।
[ घटगत रूपादि गुणों के समान घटगत परिमाणादि का ग्रहण भी 'संयुक्त
समवाय' सम्बन्ध से ही होता है परन्तु ] घटगत परिमाण आदि के ग्रहण में
[ इन्द्रिय और अर्थ दोनों के अवयव, दोनों के अवयवी, पहिले का अवयव और
दूसरे का अवयवी या दूसरे का अवयव और पहिले का अवयवी इस प्रकार इन
चार के ] 'चतुष्टय सन्निकर्ष' को भी अतिरिक्त कारण मानना अभीष्ट है !

षोढा सन्निकर्षः ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ५५
यथा । इन्द्रियावयवैरर्थावयविनाम् ।, २ इन्द्रियावयविनामर्थावय-
वानाम् । ३ इन्द्रियावयवैरर्थावयवानाम् । ४ अर्थावयविनामिन्द्रियावय-
विनां सन्निकर्ष इति ।
यदा पुनश्चक्षुषा घटरूपसमवेतं रूपत्वादिसामान्यं गृह्यते, तदा
चक्षुरिन्द्रियं, रूपत्वादिसामान्यमर्थः, अनयोः सन्निकर्षः संयुक्तसमवेत-
(समवाय एव । चक्षुःसंयुक्ते घटे रूपं समवेतं, तत्र रूपत्वस्य समवायात् ।
कदा पुनः समवायः सन्निकर्षः ?
यदा श्रोत्रेन्द्रियेण शब्दो गृह्यते तदा श्रोत्रमिन्द्रियं, शब्दोऽर्थः, अनयोः
सन्निकर्षः समवाय एव । कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नं नभः श्रोत्रम् । श्रोत्रस्या-
[ क्योंकि ] उस [ चतुष्टय सन्निकर्ष ] के अभाव में [ परिमाण आदि के साथ
चक्षुः का ] संयुक्त समवाय [ सम्बन्ध ] होने पर भी दूर में [ पदार्थ के ]
परिमाणादि का [ ठीक ] ग्रहण नहीं होता [ इसलिए परिमाणादि के
ग्रहण में ‘संयुक्तसमवाय’ के अतिरिक्त ‘चतुष्टय सन्निकर्ष’ को भी कारण मानना
आवश्यक है ।
[ वह ] ‘चतुष्टय सन्निकर्ष’ [ इस प्रकार होगा ] जैसे १ इन्द्रियावयव और
अर्थावयवी का [ सन्निकर्ष ] २ इन्द्रिय अवयवी के साथ अर्थ के अवयवों का ।
३ इन्द्रिय के अवयवों के साथ अर्थ के अवयवों का और ४ इन्द्रिय अवयवी और
अर्थावयवी का सन्निकर्ष ।
३ जब चक्षुः से घटरूप में समवेत रूपत्व आदि सामान्य का ग्रहण किया
जाता है तब चक्षुः इन्द्रिय, रूपत्वादि सामान्य अर्थ और उन दोनों का सन्निकर्ष
‘संयुक्तसमवेतसमवाय’ ही होता है । क्योंकि चक्षुः से संयुक्त घट में रूप समवाय
सम्बन्ध से रहता है और उस [ रूप ] में रूपत्व [ जाति ] का समवाय [सम्बन्ध]
है । [ इसलिए रूपत्व जाति के साथ चक्षुः का परम्परया ‘संयुक्तसमवेतसमवाय’
सम्बन्ध हुआ ]
४ फिर ‘समवाय’ सन्निकर्ष कब होता है ?
जब श्रोत्रेन्द्रिय से शब्द का ग्रहण होता है तब श्रोत्र इन्द्रिय और शब्द अर्थ
[ होता ] है, और इन दोनों का सम्बन्ध समवाय ही [ होता ] है । [ क्योंकि ]
कर्णशष्कुली [ अर्थात् शष्कुली कचौड़ी के आकार का बना जो कर्ण का बाह्य
गोलक उस ] से घिरा हुआ [ उसका मध्यवर्त्ती ] आकाश श्रोत्र है । [ अर्थात्
श्रोत्रेन्द्रिय आकाश स्वरूप ही है आकाश से अतिरिक्त नहीं ] । इसलिए श्रोत्र के
आकाश रूप होने से और शब्द के आकाश का गुण होने तथा गुण गुणी
का समवाय सम्बन्ध होने से [ 'कर्णशष्कुली अवच्छिन्न 'आकाश' रूप

५६ तर्कभाषा [ षोढा सन्निकर्षः
काशात्मकत्वाच्छब्दस्य चाकाशगुणत्वाद् गुणगुणिनोश्च समवायात् ।
कदा पुनः समवेतसमवायः सन्निकर्षः ?
यदा पुनः शब्दसमवेतं शब्दत्वादिकं सामान्यं श्रोत्रेन्द्रियेण गृह्यते,
तदा श्रोत्रमिन्द्रियं, शब्दत्वादि सामान्यमर्थः । अनयोः सन्निकर्षः समवेत-
समवाय एव । श्रोत्रसमवेते शब्दे शब्दत्वस्य समवायात् ।
कदा पुनर्विशेष्यविशेषणभाव इन्द्रियार्थसन्निकर्षो भवति ?
यदा चक्षुषा संयुक्ते भूतले घटाभावो गृह्यते 'इह भूतले घटो नास्ति'
इति, तदा विशेष्यविशेषणभावः सम्बन्धः । तदा चक्षुःसंयुक्तस्य भूतलस्य
श्रोत्रेन्द्रिय के साथ आकाश के गुणरूप शब्द का गुणगुणिभाव मूलक समवाय
सम्बन्ध होने से श्रोत्र से शब्द का ग्रहण समवाय सम्बन्ध से ही होता है । ]
५ [ प्रश्न ] फिर 'समवेतसमवाय' सन्निकर्ष कब होता है ?
[ उत्तर ] फिर जब शब्द में समवाय सम्बन्ध से रहने वाले शब्दत्व आदि
सामान्य [ जाति ] का श्रोत्रेन्द्रिय से ग्रहण होता है तब श्रोत्र इन्द्रिय और
शब्दत्व आदि सामान्य अर्थ [ है ] इन दोनों का सन्निकर्ष 'समवेतसमवाय' ही
[ होता है ] । श्रोत्र [ इन्द्रिय ] में समवाय सम्बन्ध से रहने वाले शब्द में
शब्दत्व [ जाति ] का समवाय [ सम्बन्ध ] होने से । [ श्रोत्रेन्द्रिय से शब्दत्व
जाति का ग्रहण समवेत समवाय सम्बन्ध से ही होता है । ]
६ [ प्रश्न ] फिर 'विशेष्य विशेषणभाव' [ नामक ] इन्द्रिय और अर्थ का
सन्निकर्ष कब होता है ?
[उत्तर] जब चक्षु से संयुक्त भूतल में, 'यहाँ भूतल में घट नहीं है' इस प्रकार
घटाभाव का ग्रहण होता है तब विशेष्य विशेषणभाव सम्बन्ध होता है । तब चक्षु
से संयुक्त भूतल का घटाभाव विशेषण होता है [ और ] भूतल विशेष्य होता है ।
इस प्रकार इन्द्रिय-सम्बद्ध भूतल में घटाभाव के विशेषण होने से घटाभाव
के साथ इन्द्रिय का परम्परा से 'इन्द्रियसम्बद्धविशेषणता' सम्बन्ध होता है। इसी
प्रकार जब 'भूतलनिष्ठः घटाभावः' इस प्रकार की प्रतीति होती है तब घटाभाव
विशेष्य होता है और भूतल विशेषण होता है । उस समय इन्द्रिय का घटाभाव
के साथ 'इन्द्रियसम्बद्धविशेष्यता' सम्बन्ध होता है। इस प्रकार इन्द्रिय का अभाव
के साथ कहीं 'इन्द्रियसम्बद्धविशेष्यता' और कहीं 'इन्द्रियसम्बद्धविशेषणता'
सम्बन्ध होता है । इसी को संक्षेप में 'विशेष्यविशेषणभाव' सम्बन्ध कहा है ।
विशेष्यविशेषणभाव सम्बन्ध के अन्तर्गत एक कोई और भी सम्बन्ध होना
आवश्यक है । जैसे 'घटवद् भूतलम्' इस प्रतीति में भूतल विशेष्य है और घट

षोढा सन्निकर्षः ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ५७
घटाद्यभावो विशेषणं, भूतलं विशेष्यम् । यदा च मनःसंयुक्त आत्मनि
सुखाद्यभावो गृह्यते 'अहं सुखरहित' इति, तदा मनःसंयुक्तस्यात्मनः
सुखाद्यभावो विशेषणम् । यदा श्रोत्रसमवेते गकारे घत्वाभावो गृह्यते
तदा श्रोत्रसमवेतस्य गकारस्य घत्वाभावो विशेषणम् ।
तदेवं संक्षेपतः पञ्चविधसम्बन्धान्यतमसम्बन्धसम्बद्धविशेषणविशे-
ष्यभावलक्षणेनेन्द्रियार्थसन्निकर्षेण अभाव इन्द्रियेण गृह्यते ।
उसका विशेषण है। भूतल और घट का संयोग संबन्ध है। इस लिये
भूतल में घट संयोग सम्बन्ध से विशेषण है, यह कहा जा सकता है। इसी
प्रकार 'पटवन्तस्तन्तवः' इस प्रतीति में तन्तु विशेष्य है पट विशेषण है। इन
दोनों का समवाय सम्बन्ध है। इसलिए तन्तु में पट समवाय सम्बन्ध से विशेषण
है। इस प्रकार विशेषण विशेष्यभाव सम्बन्ध के अन्तर्गत कोई एक सम्बन्ध
और होना चाहिए। वह सम्बन्ध ऊपर गिनाए हुए सम्बन्धों में से ही कोई हो
सकता है। ऊपर इन्द्रिय और अर्थ के छः प्रकार के सम्बन्ध गिनाए हैं। इनमें
से एक तो स्वयं विशेष्यविशेषण भाव ही है। इसलिए उसको छोड़कर शेष
पाँच सम्बन्ध और रह जाते हैं जो इस विशेष्यविशेषण भाव सम्बन्ध के
नियामक हो सकते हैं इसलिए उन पञ्चविध सम्बन्धों में से अन्यतम सम्बन्ध
से घटादि विशेषण भूतलादि विशेष्य के साथ सम्बद्ध हो सकते हैं। और जिस
सम्बन्ध से घटादि भाव पदार्थ भूतलादि में विशेषण होते हैं उन घटादि का
अभाव भी उसी सम्बन्ध से भूतल आदि में विशेषण होता है। इसलिए पूर्वोक्त
पञ्चविध सम्बन्ध में से अन्यतम सम्बन्ध द्वारा घटाभावादि भूतलादि में विशेष्य
या विशेषण हो सकते हैं। इसी विशेष्यविशेषण भाव से चक्षुः आदि द्वारा
घटाभावादि का ग्रहण होता है। ऊपर संयोग सम्बन्ध का उदाहरण दिया था,
आगे समवायादि सम्बन्ध के भी उदाहरण देकर इस बात को स्पष्ट करेंगे।
और जब मन से संयुक्त आत्मा में सुखादि [गुणों] का अभाव 'मैं सुखरहित
हूँ' इस रूप में गृहीत होता है तब मन से संयुक्त आत्मा में सुखाभाव [समवाय
सम्बन्ध से] विशेषण होता है। [और] जब श्रोत्र में समवायसम्बन्ध से रहने
वाले गकार में घत्व आदि [जाति] का अभाव गृहीत होता है तब श्रोत्रसमवेत
गकार का घत्वाभाव [समवेत समवाय सम्बन्ध से] विशेषण होता है। [और
उनका ग्रहण विशेष्यविशेषणभाव सम्बन्ध से होता है]
इस प्रकार संक्षेप में [१ संयोग, २ संयुक्तसमवाय, ३ संयुक्तसमवेतसमवाय,
४ समवाय और ५ समवेतसमवाय इन] पाँच प्रकार के सम्बन्धों में किसी एक

५८ तर्कभाषा [ षोढा सन्निकर्षः
एवं समवायोऽपि । चक्षुःसम्बद्धस्य तन्तोर्विशेषणभूतः पटसमवायो
गृह्यते 'इह तन्तुषु पटसमवाय' इति ।
तदेवं षोढा सन्निकर्षो वर्णितः । संग्रहश्च—
अक्षजा प्रमितिर्द्वेधा सविकल्पाविकल्पिका ।
करणं त्रिविधं तस्याः सन्निकर्षश्च षड्विधः ॥
घट—तन्नील—नीलत्व—शब्द--शब्दत्वजातयः ।
अभावसमवायौ च ग्राह्याः सम्बन्धषट्कतः ॥
सम्बन्ध से सम्बद्ध विशेष्यविशेषणभाव रूप इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से
अभाव का इन्द्रिय द्वारा [ ही ] ग्रहण किया जाता है ।
इसी प्रकार समवाय भी [विशेष्य विशेषण भाव सम्बन्ध द्वारा] इन्द्रिय से ही
गृहीत होता है । चक्षु से संयुक्त तन्तु का विशेषणभूत पटसमवाय 'इन तन्तुओं में
पटसमवाय [ सम्बन्ध से ] है' इस [प्रतीति] में [विशेष्यविशेषणभाव सम्बन्ध से ]
गृहीत होता है ।
इस प्रकार छः प्रकार के सन्निकर्ष का वर्णन किया गया । और [ इस सब ]
विषय का [ संग्रह ] संक्षेप [ इस प्रकार ] है ।
[ इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न ] इन्द्रियजन्य [ प्रत्यक्ष ] प्रमिति
दो प्रकार की है एक सविकल्पक और दूसरा निर्विकल्पक । उस [ प्रत्यक्ष प्रमा ]
के करण [ १ कभी इन्द्रिय २ कभी इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष, और ३ कभी निर्विकल्पक
ज्ञान ] तीन प्रकार के हैं और [ इन्द्रिय तथा अर्थ का ] सन्निकर्ष [ १ संयोग,
२ संयुक्तसमवाय, ३ संयुक्तसमवेतसमबाय, ४ समवाय, ५ समवेतसमवाय और
३ विशेष्यविशेषणभाव ] छः प्रकार का है ।
[ इस छः प्रकार के सन्निकर्ष से क्रमशः ] १ घट [का १ संयोग सम्बन्ध से]
[ घट ] में रहने वाले नील [ रूप गुण का ग्रहण संयुक्तसमवायसम्बन्ध से और
उस नील गुण में रहने वाली जाति ] नीलत्व [ का ३ संयुक्तसमवेतसमवाय
सम्बन्ध से तथा ] शब्द [ रूप गुण का कर्णाशष्कुली से अवच्छिन्न आकाश रूप
श्रोत्र से समवाय सम्बन्ध से ] और [ उस शब्द में रहने वाली ] शब्दत्व जाति
[ का समवेतसमवाय सम्बन्ध से ] तथा अभाव और समवाय [ का विशेष्य-
विशेषणभाव से ] का छः सम्बन्धों से [ यथाक्रम ] ग्रहण होता है ।
अलौकिक सन्निकर्ष—
ऊपर जिन छः प्रकार के इन्द्रियार्थसन्निकर्षों का वर्णन किया है वे सब
लौकिक सन्निकर्ष हैं । इनके अतिरिक्त तीन प्रकार के अलौकिक सन्निकर्ष भी

अलौकिकसन्निकर्षः ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ५६

माने गये हैं। १ 'सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति' २ 'ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति' और
३ 'योगज प्रत्यासत्ति' । इनका वर्णन करते हुये 'न्यायसिद्धान्तमुक्तावलीकार'
श्री विश्वनाथ ने लिखा है—
'अलौकिकस्तु व्यापारस्त्रिविधः परिकीर्तितः ।
सामान्यलक्षणो ज्ञानलक्षणो योगजस्तथा ॥'
१ इनमें से योगज सन्निकर्ष सबसे अधिक स्पष्ट है। योगियों को भूत,
भविष्यत्, सूक्ष्म, व्यवहित, विप्रकृष्ट सभी वस्तुओं का प्रत्यक्ष हो सकता है।
व्यवहित, भूत, भविष्यत् आदि की वस्तुओं के साथ लौकिक इन्द्रिय और अर्थ
का सन्निकर्ष नहीं बन सकता है अतएव वहां योगज सामर्थ्य से अलौकिक
इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष हो जाता है। वह भी 'युक्त' और 'युञ्जान' भेद से दो
प्रकार का होता है। 'युक्त' योगी को सर्वदा भान होता है और 'युञ्जान' को
चिन्ता करने से अर्थ का भान होता है।
'युक्तस्य सर्वदा भानं चिन्तासहकृतोऽपरः ।' १
२ 'ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति' का उदाहरण 'सुरभि चन्दनखण्डम्' यह ज्ञान है।
एक दिन बाजार में किसी ने चन्दन के टुकड़े को सूँघकर परीक्षा कर निश्चय कर
लिया कि यह सुगंधित चंदन का टुकड़ा है। दूसरे दिन किसी ग्राहक ने वह चंदन
का टुकड़ा उस व्यक्ति को दिखलाकर उसके विषय में उसकी सम्मति पूछी। तो उसने
दूर से ही उसको देखकर कहा कि यह सुगन्धित चन्दन है। यहाँ उसने चंदन
को आँख से तो देखा। परन्तु इस समय उसकी गन्ध को घ्राणेन्द्रिय से ग्रहण
नहीं किया है फिर भी 'सुरभिचन्दनखण्डम्' यह प्रतीति हो रही है। इस
प्रतीति में चन्दन, उसमें रहने वाली चन्दनत्व जाति, और उसके सौरभ गुण,
इन तीनों का प्रत्यक्ष होता है इसमें से चंदन के साथ चक्षु का संयोग सम्बन्ध, और
चन्दनत्व सामान्य के साथ संयुक्तसमवाय सम्बन्ध होता है। यह दोनों लौकिक
सन्निकर्ष के अन्तर्गत ही हैं। परंतु सौरभ के साथ तो चक्षु का लौकिक सन्निकर्ष
नहीं बन सकता है। अतएव उसके साथ 'ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति' रूप अलौकिक
सन्निकर्ष बनता है। यहाँ चक्षु का और सौरभ का चक्षुःसंयुक्तमनःसंयुक्तात्मस-
मवेतज्ञानरूपेण' अथवा 'चक्षुःसंयुक्तात्मसमवेतसंस्काररूपेण' अर्थात् चक्षु से संयुक्त
जो मन उससे संयुक्त जो आत्मा उस आत्मा में समवेत जो सौरभगुण का ज्ञान
अथवा उस सौरभज्ञान से उत्पन्न संस्कार के द्वारा चक्षुः से ही उस सौरभ का
अलौकिक सन्निकर्ष द्वारा ग्रहण हो जाता है। इसलिये सौरभ के चक्षु का विषय

१, २ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली ६३, ६६ ।

६० तर्कभाषा [ अलौकिकसन्निकर्षः
न होने पर भी ऐसे स्थल में ‘सुरभि चन्दनखण्डम् इस ज्ञान को चाक्षुष प्रत्यक्ष
मानते हैं । इसी के लिये नैयायिक ‘ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति’ स्वीकार करते हैं ।
३ तीसरी ‘सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति’ मानी जाती है । जब हम एक वस्तु
का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं तो उस प्रकार की समस्त वस्तुओं को अपने-आप
समझ लेते हैं । हर एक वस्तु के ज्ञान के लिये अलग प्रयत्न नहीं करना पड़ता
है । उनमें रहने वाले सामान्य धर्म के द्वारा एक वस्तु के ज्ञान से ही सजातीय
समस्त वस्तुओं का सामान्य ज्ञान हो जाता है । यह ज्ञान सामान्य के आधार
पर होता है इसलिये अन्य पदार्थों के साथ लौकिक सन्निकर्ष न होने पर भी सामान्य
द्वारा उन सबके साथ अलौकिक सन्निकर्ष हो जाने से उन सबका ज्ञान हो सकता
है । जैसे महानस में धूम और वह्नि को देखते हैं । तो वहाँ धूमत्व सामान्य से
समस्त धूमों का और वह्नित्व सामान्य से समस्त वह्नियों का प्रत्यक्ष हो जाता
है । तब ही धूम सामान्य और वह्नि सामान्य की व्याप्ति का ग्रहण होता है। इसके
लिये ‘सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति’ को भी एक अलौकिक सन्निकर्ष माना है ।
सामान्य-लक्षणा और ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति में परस्पर यह भेद है कि
सामान्य लक्षणा प्रत्यासत्ति में धूमत्व और वह्नित्व रूप सामान्य के आश्रयभूत
जो धूम और वह्नि हैं उनके साथ इन्द्रिय का सन्निकर्ष होता है और सामान्य के
द्वारा ही व्यवहित विप्रकृष्ट या अतीत, अनागत धूम और वह्नि रूप आश्रय के साथ
भी सन्निकर्ष होता है । परन्तु ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति में आश्रय के साथ नहीं
अपितु जिसका ज्ञान होता है उसी के साथ सन्निकर्ष होता है । ‘सुरभि चन्दन-
खण्डम्’ इस प्रतीति में चन्दनखण्ड के साथ नहीं अपितु साक्षात् सौरभ के साथ
ही ‘ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति’ से चक्षु का सन्निकर्ष होता है । और सामान्य-
लक्षणा के स्थल में धूमत्व और वह्नित्व सामान्य के साथ नहीं अपितु उनके
आधारभूत धूम और वह्नि के साथ सामान्य द्वारा इन्द्रिय का अलौकिक
सन्निकर्ष होता है । जैसा कि कहा भी है ।
‘आसत्तिराश्रयाणान्तु सामान्यज्ञानमिष्यते ।
विषयी यस्य तस्यैव व्यापारो ज्ञानलक्षणः ॥’
ज्ञानलक्षणा और सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति के विषय में सब लोग एक मत
नहीं हैं। स्वयं नैयायिकों में भी रघुनाथ शिरोमणि आदि सामान्यलक्षणा प्रत्या-
सत्ति को नहीं मानते हैं । परन्तु सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति मानने वालों का
कहना है कि यदि सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति न मानी जाय तो ‘धूमो वह्निव्याप्यो
१. न्यायमुक्तावली ६५

अलौकिकसन्निकर्षः ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ६१
न वा' इस प्रकार का संशय ही नहीं बन सकता है। क्योंकि वर्तमान धूम और
वह्नि का तो सम्बन्ध गृहीत ही है। उनमें व्यभिचार शङ्का हो ही नहीं सकती ।
और कालान्तर देशान्तर के धूम का ग्रहण 'सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति' द्वारा ही
हो सकता है अतएव 'सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति' अवश्य माननी चाहिए । इसी
लिए आचार्य पक्षधर मिश्र ने 'सामान्यलक्षणा' को न मानने वाले श्रीरघुनाथ
शिरोमणि का, जो कि काणे थे, उपहास करते हुए कहा था:—
'वक्षोजपानकृत् काण ! संशये जाग्रति स्फुटे ।
सामान्यलक्षणा कस्मादकस्मादपलप्यते ॥'
तर्कभाषाकार ने केवल षोढा लौकिक सन्निकर्ष का ही प्रतिपादन किया है ।
अधिक क्लिष्ट होने से त्रिविध अलौकिक सन्निकर्ष का प्रतिपादन नहीं किया है ।
हमने अपनी 'दर्शनमीमांसा' में इस त्रिविध अलौकिक सन्निकर्ष का निरूपण
इस प्रकार किया है—
इन्द्रियार्थसन्निकर्षं दर्शयति—
न्यायादौ प्राप्यकारित्वमिन्द्रियाणां यदिष्यते ।
तदिन्द्रियार्थसम्बन्धजिज्ञासां सन्तनोति वै ॥
लौकिकोऽलौकिकश्चेति स तु तावद् द्विधाकृतः ।
षड्विधो लौकिकस्तत्र त्रिविधश्चास्त्यलौकिकः ॥
अलौकिकं सन्निकर्षं त्रिधा विभजते—
ज्ञानलक्षणसम्बन्धस्तथा सामान्यलक्षणः ।
योगजश्चेति विज्ञेयस्त्रिविधोऽयमलौकिकः ॥
तत्र ज्ञानलक्षणप्रत्यासत्तिं दर्शयति—
चन्दनग्रहणे दूरात् सौरभं यत्तु गृह्यते ।
ज्ञानलक्षणसम्बन्धजन्यं तच्चाक्षुषं मतम् ॥
ज्ञानं गुणो निरंशोऽतो नांशभेदोऽत्र विद्यते ।
सौरभांशे स्मृतिर्नातो चाक्षुषं ज्ञानलक्षणात् ॥
सामान्यलक्षणप्रत्यासत्तिं दर्शयति—
धूमादिसहचारोऽयं सर्वधूमादिगोचरः ।
सन्, व्याप्तिं ग्राहयेत् तस्मान्मता सामान्यलक्षणा ॥
सर्वाग्निसहचारोऽयं धूमेष्वखिलकेषु च ।
कथं गृह्येत सामान्यलक्षणा चेन्न मन्यते ॥
१. दर्शन मीमांसा ४ ।

६२ तर्कभाषा [चाक्षुषे विज्ञानमतम्
धूमश्च वह्निव्याप्योऽयं न वेत्येवं हि संशयः ।
नोपपद्येत सामान्यलक्षणा चेन्न सम्भवेत् ॥
अत एव पुरा गीतं पद्यं पञ्चधरैरिदम् ।
श्रीमन्तं रघुनाथं तु समुद्दिश्य विनोदतः ॥
'वक्षोजपानकृत् काण ! संशये जाग्रति स्फुटे ।
सामान्यलक्षणा कस्मादकस्मादपलप्यते ॥
योगजप्रत्यासत्तिं दर्शयति—
सूक्ष्मे व्यवहिते दूरेऽतीतेऽर्थेऽनागते तथा ।
प्रत्यक्षं योगिनां ज्ञेयं सन्निकर्षस्तु योगजात्¹ ॥
चाक्षुषप्रत्यक्ष का वैज्ञानिक प्रकार ।
इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से अर्थ का ग्रहण होता है । इस प्रसङ्ग में
चक्षु के साथ घटादि अर्थों के सन्निकर्ष को लेकर बहुत चर्चा हुई है । चक्षु
शरीर देश में होती है और घटादि अर्थ शरीर से अलग भिन्न देश में होते हैं ।
ऐसी दशा में उन दोनों का सम्बन्ध कैसे होता है ? न तो अर्थ उठकर चक्षु के
पास आता है और न चक्षु चलकर घटादि अर्थ के पास जाती दीखती है । तब
उनका संयोग कैसे होता है । इस विषय में आधुनिक 'प्रकाश विज्ञान' का
सिद्धान्त यह है कि प्रकाश की जो किरणें पदार्थ पर पड़ती हैं वे वहाँ से प्रतिक्षिप्त
होकर देखने वाले की आँख तक पहुँचती हैं और देखने वाले के नेत्र की
कनीनिका के भीतर से जाकर 'रेटीना' नामक केन्द्र पर पदार्थ का प्रतिबिम्ब
उत्पन्न करती हैं । इसी से पदार्थ का दर्शन होता है । 'प्रकाश विज्ञान' का यह
भी सिद्धान्त है कि सामान्यतः प्रकाश की किरणें बिल्कुल सीधी चलती हैं ।
परन्तु जब उनकी गति के माध्यम में घन और विरल भाव का अन्तर होता है
तब किरणों का मार्ग एक नियमके अनुसार उस स्थान पर बनने वाले 'लम्ब' की
ओर या उससे दूर होता जाता है । यह किरणों का वक्रीभवन एक विशेष
बिन्दु जिसे वह 'क्रान्तिबिन्दु' [क्रिटिकल प्वाइंट] कहते हैं, तक होता है । उस
बिन्दु पर पहुँच कर किरण फिर उतने ही अंश का कोण बनाते हुए उल्टी
प्रतिक्षिप्त होने लगती है। इस प्रक्रिया का प्रयोग विशेषरूप से 'मरुमरीचिका' के
उदाहरण में होता है । मरुस्थल में अत्यधिक गर्मी के समय यात्री आदि को रेत में
भी पानी दीखने लगता है । ऐसे अवसर पर वास्तविक पानी तो नहीं दीखता है
१. दर्शन मीमांसा ४ ।

मरुमरीचिका ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ६३
परन्तु प्रकाश की किरणों के 'माध्यम' रूप वायुमण्डल में अत्यन्त वेग से
परिवर्तन होने से उक्त 'वक्रीभवन' नियम के अनुसार किरणों के मार्ग में
परिवर्तन होने के कारण वृक्ष आदि का उल्टा प्रतिबिम्ब दीखने लगता है ।
जैसा कि निम्नांकित चित्र से प्रकट होगा ।
मरु मरीचिका
इस चित्र में बाईं ओर एक वृक्ष खड़ा है। इस वृक्ष के ऊपर के भाग से
प्रतिक्षिप्त होकर जो प्रकाश की किरण चलती है वह रेगिस्तान की वायु के
माध्यम में अति वेग से परिवर्तन होने के कारण अपने मार्ग से विचलित होते-
होते 'क्रान्तिबिन्दु' तक जा पहुँचती है। और फिर वहाँ से 'प्रतिक्षेप नियम' के
अनुसार उतने ही अंश का कोण बनाते हुए प्रतिक्षिप्त होकर दूसरी ओर देखने
वाले की आँख में पहुँचती है। देखने वाला अभ्यासवश जिधर से किरण आ
रही है उसकी सीध में अर्थ को देखता है जिसका परिणाम यह होता है कि वृक्ष
का पत्तों वाला ऊपर का भाग उसको नीचे की ओर दीखता है और नीचे का जड़
वाला भाग इसी प्रक्रिया से उसे ऊपर दीखने लगता है। अर्थात् वृक्ष उल्टा दीखता
है। तब देखने वाले को यह प्रतीत होता है कि मानो पानी में पेड़ का उल्टा
प्रतिबिम्ब पड़ रहा है। इसीसे वह पानी समझ कर वहाँ जाता है परन्तु पानी
नहीं पाता है। यह 'मरुमरीचिका' की वैज्ञानिक प्रक्रिया मानी जाती है।
मरुस्थल के वायुमण्डल में जो अत्यन्त शीघ्रता से परिवर्तन होता है
उसका कारण गर्मी की अधिकता ही होती है। मरुभूमि के अत्यधिक उष्ण
होने के कारण जो वायु भूतल का स्पर्श करती है वह तुरन्त उष्ण हो जाती है।
विज्ञान के साधारण नियम के अनुसार गर्मी से वस्तु हल्की हो जाती है। और

६४ तर्कभाषा [ मरुमरीचिका
हल्की वस्तु सदा ऊपर रहती है। इसलिये गर्म वायु भी हल्की होकर ऊपर
जाने लगती है और उसका स्थान लेने के लिए ऊपर की ठंडी वायु नीचे
आने लगती है। परन्तु नीचे आकर भूमि का स्पर्श होते ही वह भी गर्म और
हल्की होकर ऊपर जाने लगती है। इस प्रकार वायुमण्डल में अत्यन्त शीघ्रता
से परिवर्तन होने लगता है। इसी परिवर्तन के वेग के कारण मरुस्थल में
आँधियाँ बहुत अधिक आती हैं और यही वायुमण्डल का परिवर्तन प्रकाश
की किरणों के मार्ग परिवर्तन के द्वारा 'मरुमरीचिका' या 'मृगतृष्णा' आदि का
कारण होता है। 'मरीचि' शब्द का अर्थ किरण होता है। मरुस्थल के वृक्ष
आदि से प्रतिक्षिप्त होने वाली प्रकाश की किरणों के मार्ग के 'माध्यम' में
घन विरल भाव के तारतम्य से उनकी गति में क्रमिक परिवर्तन द्वारा वृक्ष आदि
का उल्टा प्रतिबिम्ब सा दीखने लगने के कारण ही मरुस्थल में जल की मिथ्या
प्रतीति होने लगती है। इसीलिए उस जल के मिथ्या ज्ञान को 'मरुमरीचिका'
कहा जाता है।
न्यायदर्शन के भाष्यकार वात्स्यायन ने प्रत्यक्ष सूत्र के भाष्य में लगभग
इसी रूप में 'मरुमरीचिका' का उल्लेख इस प्रकार किया है:—
'ग्रीष्मे¹ मरीचयो भौमेनोष्मणा संसृष्टाः स्पन्दमाना दूरस्थस्य चक्षुषा सन्नि-
कृष्यन्ते । तत्रेन्द्रियार्थसन्निकर्षादुदकमिति ज्ञानमुत्पद्यते । तत्प्रत्यक्षं प्रसज्यत
अत आह अव्यभिचारीति' ।
अर्थात् ग्रीष्मकाल में पृथिवी की गर्मी के कारण अपने मार्ग से विचलित
होकर प्रकाश की किरणें दूरस्थ पुरुष की आँखों में पहुँचती हैं। इसके कारण
उसको वहाँ जल का ज्ञान होता है। यह ज्ञान व्यभिचारी ज्ञान है। वह प्रत्यक्ष
की श्रेणी में न आ जाय इसलिए सूत्रकार ने प्रत्यक्ष के लक्षण में अव्यभिचारी
पद का ग्रहण किया है।
भाष्यकार ने प्रकाश की किरणों के मार्ग परिवर्तन के लिए 'स्पन्दमानाः'
पद का प्रयोग किया है। 'स्पदि' धातु जिससे 'स्पन्दमाना' पद बना है, का
अर्थ 'स्पदि किंचिच्चलने' है। अर्थात् प्रकाश की किरणों में परिवर्तन माध्यम के
परिवर्तन के अनुसार थोड़ा-थोड़ा होता है इस प्रकार यह अनुमान किया जा
सकता है कि 'प्रकाश विज्ञान' का यह सिद्धान्त प्राचीन आचार्यों को भी
विदित था।
हमने अपनी दर्शनमीमांसा में इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष देश की
चर्चा करते हुए इस विषय में लिखा है—
१ न्यायदर्शन वात्स्यायन भाष्य १, १, ४ ।