तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्विकल्पकं ज्ञानम् ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ५१
प्रमाण कोटि से भी बाहर रखा है। न्याय, वैशेषिक आदि वैदिक दर्शन की
परम्परा में सविकल्पक और निर्विकल्पक दोनों को प्रत्यक्ष माना है ।
'नाम-जात्यादि-योजनाहीनं वस्तुमात्रावगाहि ज्ञानं निर्विकल्पकम्' यह
निर्विकल्पक ज्ञान का लक्षण किया गया है। अर्थात् जिस में विशेष्य विशेषण
भाव आदि की प्रतीति न हो उस ज्ञान को 'निर्विकल्पक' कहते हैं। यह
'निर्विकल्पक' शब्द, न्याय, वैशेषिक आदि वैदिक परम्परा का शब्द है। इसको
'आलोचन मात्र' भी कहा गया है।
'अस्ति ह्यालोचनज्ञानं प्रथमं निर्विकल्पकम्¹'
ज्ञान की उत्पत्ति-प्रक्रिया में सर्वप्रथम इस प्रकार का वस्तुमात्रावगाहि
ज्ञान उत्पन्न होता है। इसको बौद्ध और जैन परम्परा में भी माना गया है। जैन
परम्परा जो निर्विकल्पक को प्रत्यक्ष नहीं मानती है वह भी इस प्रकार के ज्ञान
का अस्तित्व तो स्वीकार करती है किन्तु उसको 'दर्शन' नाम से कहती है।
निर्विकल्पक ज्ञान के विषय में वैयाकरण मत—
परन्तु मध्वाचार्य तथा बल्लभाचार्य की दो वेदान्त-परम्पराएँ और भर्तृहरि
तथा उनके पूर्ववर्ती वैयाकरणों की परम्परा, ज्ञान के उत्पत्तिक्रम में किसी प्रकार
के सामान्य मात्र बोध का अस्तित्व स्वीकार नहीं करती हैं। उक्त तीनों
परम्पराओं में विशेष्य विशेषण भाव रहित कोई ज्ञान स्वीकार नहीं किया गया
है। उनके मतानुसार प्रत्येक ज्ञान में किसी प्रकार के विशेष का भान अवश्य
होता है। कहीं कम हो कहीं अधिक यह दूसरी बात है। अतएव सारा ज्ञान
सविकल्पक ही होता है। और जहाँ कहीं निर्विकल्पक ज्ञान कहा जाता है वहाँ
उसका इतना ही अभिप्राय होता है कि उसमें अन्यों की अपेक्षा विशेष का
भान कम होता है। ज्ञान मात्र को सविकल्पक मानने वाली इन तीनों
परम्पराओं में भर्तृहरि की शाब्दिक परम्परा ही प्राचीन² है। मध्वाचार्य और
वल्लभाचार्य ने सम्भवतः उसी को अपना लिया है।
ज्ञान दो प्रकार का होता है एक परोक्ष और दूसरा अपरोक्ष । जिस ज्ञान
में कोई दूसरा ज्ञान करण होता है उसको परोक्ष कहते हैं। जैसे अनुमति में
व्याप्तिज्ञान, उपमिति में सादृश्यज्ञान और शाब्दबोध में पदज्ञान करण होता
है। अतएव यह तीनों 'ज्ञानकरणक ज्ञान' होने से 'परोक्ष' ज्ञान कहलाते हैं ।
प्रत्यक्ष ज्ञान में कोई दूसरा ज्ञान करण नहीं होता है। अतः वह अपरोक्ष ज्ञान
कहलाता है। अपरोक्ष ज्ञान का लक्षण 'ज्ञानकरणकान्यत्वमपरोक्षत्वम्' है ।
अर्थात् ज्ञानकरणक से भिन्न ज्ञान अपरोक्ष कहलाता है ।
१ श्लोक वार्तिक १७२ । २ इण्डियन साइकालाजी पृ० ५२-५४ ।