तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रमाकरणम् ] प्रमाणनिरूपणम् ४५
उच्यते। सत्यपि प्रमातरि प्रमेये च, प्रमानुत्पत्तेरिन्द्रियसंयोगादौ
सति, अविलम्बेन प्रमोत्पत्तेरत इन्द्रियसंयोगादिरेव करणम्। प्रमायाः
साधकत्वाविशेषेऽप्यनेनैवोत्कर्षेणास्य प्रमात्रादिभ्योऽतिशयितत्वाद्-
तिशयितं साधकं साधकतमं तदेव करणमित्युक्तम्। अत इन्द्रियसंयोगा-
दिरेव प्रमाकरणत्वात् प्रमाणं न प्रमात्रादि।
तानि च प्रमाणानि चत्वारि। तथा च न्यायसूत्रम् :—
‘प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि¹।
इति।
[ उत्तर ] कहते हैं। प्रमाता और प्रमेय के होने पर भी [ इन्द्रिय सन्निकर्ष
के बिना ] प्रमा की उत्पत्ति न होने से, और इन्द्रिय संयोगादि के होने पर
अविलम्ब प्रमा की उत्पत्ति होती है इसलिए इन्द्रिय संयोगादि ही [ प्रमा का ]
करण है। [प्रमाता प्रमेय और प्रमाण तीनों में] प्रमा के साधकत्व में [समानता
होने पर भी या ] भेद न होने पर भी इसी उत्कर्ष के कारण [ कि इन्द्रिय संयोग
के होने पर अविलम्ब प्रमा उत्पन्न हो जाती है ] इस [ इन्द्रिय संयोगादि ] का
प्रमाता आदि की अपेक्षा अतिशय होने से और अतिशय युक्त साधन के ही
साधकतम होने से वही करण कहा जाता है। इसलिए प्रमा का करण होने से
इन्द्रिय संयोगादि ही प्रमाण कहा जाता है। प्रमाता आदि नहीं।
और वह प्रमाण चार [ प्रकार का ] है जैसा कि न्यायसूत्र [ में कहा ] है
प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द [ चारों ] प्रमाण हैं।
इस प्रकार प्रमाण के सामान्य लक्षण के प्रसङ्ग में १ प्रमा का लक्षण,
२ करण का लक्षण, ३ कारण का लक्षण, ४ अन्यों के कारण लक्षण का खंडन,
५ कारण के त्रिविध भेद, ६ समवायिकारण असमवायिकारण निमित्तकारण
के लक्षण, ७ समवाय और संयोग सम्बन्ध का निरूपण, ८ निर्गुणोत्पत्ति का
निरूपण, और ९ धारावाहिक ज्ञान के प्रामाण्य का निरूपण यह सब इस
प्रसक्तानुप्रसक्त रूप से ग्रन्थकार ने इस प्रकरण में दिखाने का प्रयत्न किया है।
अब आगे प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों में से एक-एक को लेकर उसका निरूपण
करेंगे। उनमें सबसे पहिले प्रत्यक्ष प्रमाण का निरूपण प्रारम्भ करते हैं।
१ न्यायसूत्र १, १, ३।