तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 112, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यक्षम् ] प्रमाणनिरूपणम् ४७
'बालमूकादिविज्ञानसदृशं निर्विकल्पकम्' ।
जैसे बालक एक घड़ी को देखता है तो उसको भी घड़ी के स्वरूप का
ज्ञान उसी प्रकार का होता है जिस प्रकार बड़े व्यक्ति को। जहाँ एक वस्तु के
स्वरूपज्ञान का सम्बन्ध है बड़े और अत्यन्त अबोध बालक के ज्ञान में कोई
अंतर नहीं है। अर्थात् अर्थ के ग्रहण काल में दोनों का ज्ञान एकसा ही होता
है। परन्तु बड़ा व्यक्ति उसके नाम जाति आदि को भी जानता है अतएव
व्यवहार काल में वह उसके नाम जाति का उपयोग करता है। उस अवस्था में
उसका वह ज्ञान सविकल्पक हो जाता है। बालक उसके नाम जाति आदि से
अनभिज्ञ है इसलिए वह नाम आदि से उसका व्यवहार नहीं कर सकता है।
इस प्रकार बालक और प्रौढ़ पुरुष के ज्ञान में अर्थज्ञानकाल में कोई अंतर नहीं
है अपितु व्यवहारकाल में उन दोनों में अन्तर हो जाता है। इस प्रकार बालक
और मूकादि पुरुषों का ज्ञान निर्विकल्पक और अन्य प्रौढ़ पुरुषों का ज्ञान
सविकल्पक ज्ञान है। अर्थ के ग्रहण काल में प्रौढ़ पुरुषों को भी बालक
के ज्ञान के समान नाम जात्यादि रहित निर्विकल्पक ज्ञान ही होता है।
परन्तु 'एकसम्बन्धिज्ञानमपरसम्बन्धिस्मारकम्' अर्थात् सम्बन्धियों में किसी एक
का ज्ञान तुरन्त ही दूसरे सम्बन्धी का स्मरण करा देता है इस नियम के
अनुसार प्रौढ़ पुरुष को अर्थ का स्वरूप ज्ञान होते ही अत्यन्त शीघ्रता से
उसके नाम जात्यादि का स्मरण हो जाता है। इसलिए उसका ज्ञान तुरन्त
सविकल्पक रूप में परिवर्तित हो जाता है।
इस ज्ञान के कारण तीन प्रकार के बताये हैं। एक इन्द्रिय, दूसरा
इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष और तीसरा ज्ञान अर्थात् निर्विकल्पक ज्ञान। इन तीनों के
आगे चौथे सविकल्पक ज्ञान और पांचवें हानोपादानोपेक्षाबुद्धि इन दो फलों को
और जोड़ लेने से पाँच कड़ी की एक शृङ्खला बन जाती है और उस से त्रिविध
करण का स्पष्टीकरण बहुत अच्छे और सरल ढंग से हो जाता है। इन पाँचों
में १ करण, २ अवान्तर व्यापार और ३ फल इन तीन का समावेश होता है।
इन पाँच की श्रृंखला में से यदि प्रथम को करण माना जाय तो दूसरे को
अवान्तर व्यापार और तीसरे को फल मानना चाहिए। इसी प्रकार यदि
दूसरे को करण माना जाय तो तीसरे को अवान्तर व्यापार और चौथे को
फल कहना चाहिए इसी प्रकार यदि तीसरे को करण मानेंगे तो चौथे को
अवान्तर व्यापार और पाँचवें को उसका फल कहना होगा। इस प्रक्रिया को
ध्यान में रख लेने से त्रिविध करणों को सरलता से समझा जा सकेगा। और
उनकी व्याख्या भी स्पष्ट हो जावेगी।
जब संख्या एक अर्थात् इंद्रिय को करण-मानेंगे तब तीसरा अर्थात् निर्वि-