तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ तर्कभाषा [चाक्षुषे विज्ञानमतम्
धूमश्च वह्निव्याप्योऽयं न वेत्येवं हि संशयः ।
नोपपद्येत सामान्यलक्षणा चेन्न सम्भवेत् ॥
अत एव पुरा गीतं पद्यं पञ्चधरैरिदम् ।
श्रीमन्तं रघुनाथं तु समुद्दिश्य विनोदतः ॥
'वक्षोजपानकृत् काण ! संशये जाग्रति स्फुटे ।
सामान्यलक्षणा कस्मादकस्मादपलप्यते ॥
योगजप्रत्यासत्तिं दर्शयति—
सूक्ष्मे व्यवहिते दूरेऽतीतेऽर्थेऽनागते तथा ।
प्रत्यक्षं योगिनां ज्ञेयं सन्निकर्षस्तु योगजात्¹ ॥
चाक्षुषप्रत्यक्ष का वैज्ञानिक प्रकार ।
इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से अर्थ का ग्रहण होता है । इस प्रसङ्ग में
चक्षु के साथ घटादि अर्थों के सन्निकर्ष को लेकर बहुत चर्चा हुई है । चक्षु
शरीर देश में होती है और घटादि अर्थ शरीर से अलग भिन्न देश में होते हैं ।
ऐसी दशा में उन दोनों का सम्बन्ध कैसे होता है ? न तो अर्थ उठकर चक्षु के
पास आता है और न चक्षु चलकर घटादि अर्थ के पास जाती दीखती है । तब
उनका संयोग कैसे होता है । इस विषय में आधुनिक 'प्रकाश विज्ञान' का
सिद्धान्त यह है कि प्रकाश की जो किरणें पदार्थ पर पड़ती हैं वे वहाँ से प्रतिक्षिप्त
होकर देखने वाले की आँख तक पहुँचती हैं और देखने वाले के नेत्र की
कनीनिका के भीतर से जाकर 'रेटीना' नामक केन्द्र पर पदार्थ का प्रतिबिम्ब
उत्पन्न करती हैं । इसी से पदार्थ का दर्शन होता है । 'प्रकाश विज्ञान' का यह
भी सिद्धान्त है कि सामान्यतः प्रकाश की किरणें बिल्कुल सीधी चलती हैं ।
परन्तु जब उनकी गति के माध्यम में घन और विरल भाव का अन्तर होता है
तब किरणों का मार्ग एक नियमके अनुसार उस स्थान पर बनने वाले 'लम्ब' की
ओर या उससे दूर होता जाता है । यह किरणों का वक्रीभवन एक विशेष
बिन्दु जिसे वह 'क्रान्तिबिन्दु' [क्रिटिकल प्वाइंट] कहते हैं, तक होता है । उस
बिन्दु पर पहुँच कर किरण फिर उतने ही अंश का कोण बनाते हुए उल्टी
प्रतिक्षिप्त होने लगती है। इस प्रक्रिया का प्रयोग विशेषरूप से 'मरुमरीचिका' के
उदाहरण में होता है । मरुस्थल में अत्यधिक गर्मी के समय यात्री आदि को रेत में
भी पानी दीखने लगता है । ऐसे अवसर पर वास्तविक पानी तो नहीं दीखता है
१. दर्शन मीमांसा ४ ।