तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० तर्कभाषा [ अलौकिकसन्निकर्षः
न होने पर भी ऐसे स्थल में ‘सुरभि चन्दनखण्डम् इस ज्ञान को चाक्षुष प्रत्यक्ष
मानते हैं । इसी के लिये नैयायिक ‘ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति’ स्वीकार करते हैं ।
३ तीसरी ‘सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति’ मानी जाती है । जब हम एक वस्तु
का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं तो उस प्रकार की समस्त वस्तुओं को अपने-आप
समझ लेते हैं । हर एक वस्तु के ज्ञान के लिये अलग प्रयत्न नहीं करना पड़ता
है । उनमें रहने वाले सामान्य धर्म के द्वारा एक वस्तु के ज्ञान से ही सजातीय
समस्त वस्तुओं का सामान्य ज्ञान हो जाता है । यह ज्ञान सामान्य के आधार
पर होता है इसलिये अन्य पदार्थों के साथ लौकिक सन्निकर्ष न होने पर भी सामान्य
द्वारा उन सबके साथ अलौकिक सन्निकर्ष हो जाने से उन सबका ज्ञान हो सकता
है । जैसे महानस में धूम और वह्नि को देखते हैं । तो वहाँ धूमत्व सामान्य से
समस्त धूमों का और वह्नित्व सामान्य से समस्त वह्नियों का प्रत्यक्ष हो जाता
है । तब ही धूम सामान्य और वह्नि सामान्य की व्याप्ति का ग्रहण होता है। इसके
लिये ‘सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति’ को भी एक अलौकिक सन्निकर्ष माना है ।
सामान्य-लक्षणा और ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति में परस्पर यह भेद है कि
सामान्य लक्षणा प्रत्यासत्ति में धूमत्व और वह्नित्व रूप सामान्य के आश्रयभूत
जो धूम और वह्नि हैं उनके साथ इन्द्रिय का सन्निकर्ष होता है और सामान्य के
द्वारा ही व्यवहित विप्रकृष्ट या अतीत, अनागत धूम और वह्नि रूप आश्रय के साथ
भी सन्निकर्ष होता है । परन्तु ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति में आश्रय के साथ नहीं
अपितु जिसका ज्ञान होता है उसी के साथ सन्निकर्ष होता है । ‘सुरभि चन्दन-
खण्डम्’ इस प्रतीति में चन्दनखण्ड के साथ नहीं अपितु साक्षात् सौरभ के साथ
ही ‘ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति’ से चक्षु का सन्निकर्ष होता है । और सामान्य-
लक्षणा के स्थल में धूमत्व और वह्नित्व सामान्य के साथ नहीं अपितु उनके
आधारभूत धूम और वह्नि के साथ सामान्य द्वारा इन्द्रिय का अलौकिक
सन्निकर्ष होता है । जैसा कि कहा भी है ।
‘आसत्तिराश्रयाणान्तु सामान्यज्ञानमिष्यते ।
विषयी यस्य तस्यैव व्यापारो ज्ञानलक्षणः ॥’
ज्ञानलक्षणा और सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति के विषय में सब लोग एक मत
नहीं हैं। स्वयं नैयायिकों में भी रघुनाथ शिरोमणि आदि सामान्यलक्षणा प्रत्या-
सत्ति को नहीं मानते हैं । परन्तु सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति मानने वालों का
कहना है कि यदि सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति न मानी जाय तो ‘धूमो वह्निव्याप्यो
१. न्यायमुक्तावली ६५