सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 119

५४ तर्कभाषा [ षोढा सन्निकर्षः
अनयोः सन्निकर्षः संयोग एव, अयुतसिद्धयभावात् । एवं मनसाऽन्तरि-
न्द्रियेण यदात्मविषयकं ज्ञानं जन्यतेऽहमिति, तदा मन इन्द्रियम्,
आत्माऽर्थः, अनयोः सन्निकर्षः संयोग एव ।
कदा पुनः संयुक्तसमवायः सन्निकर्षः ?
यदा चक्षुरादिना घटगतरूपादिकं गृह्यते घटे श्यामं रूपमस्तीति,
तदा चक्षुरिन्द्रियं, घटरूपमर्थः, अनयोः सन्निकर्षः संयुक्तसमवाय एव ।
चक्षुःसंयुक्ते घटे रूपस्य समवायात् । एवं मनसाऽऽत्मसमवेते सुखादौ
गृह्यमाणे, अयमेव सन्निकर्षः ।
घटगतपरिमाणादिग्रहे चतुष्टयसन्निकर्षोऽप्यधिकं कारणमिष्यते ।
सत्यपि संयुक्तसमवाये तदभावे दूरे परिमाणाद्यग्रहणात्। चतुष्टयसन्निकर्षो
अयुतसिद्धि का अभाव होने से [ अर्थात् यदि चक्षुः और घट अयुतसिद्ध होते
तो उनका परस्पर समवाय सम्बन्ध होता । परन्तु यह दोनों अयुतसिद्ध नहीं हैं
इसलिए उनका सम्बन्ध संयोग ही है ]
इसी प्रकार अन्तःकरण मन से जब आत्मविषयक ज्ञान होता है तब मन,
इन्द्रिय और आत्मा अर्थ [ होता है और ] इन दोनों का मम्बन्ध संयोग ही
होता है । [ यह दो उदाहरण संयोग सन्निकर्ष के दिये । इनमें से प्रथम
बाह्येन्द्रिय के संन्निकर्ष का और दूसरा अन्तरिन्द्रिय अन्तःकरण-मन-के सन्निकर्ष
का है। आगे संयुक्तसमवाय सन्निकर्ष के भी इसी प्रकार के दो उदाहरण देते हैं ]
२ [ प्रश्न ] फिर संयुक्तसमवाय का सन्निकर्ष कब होता है ?
[ उत्तर ] जब चक्षुः आदि [ इन्द्रिय ] से घटगत रूपादिक [ गुण ] का
ग्रहण होता है कि घट में श्याम रूप है तब चक्षुः इन्द्रिय [ और ] घटरूप अर्थ
[ होता है ] और इन दोनों का सन्निकर्ष 'संयुक्तसमवाय' ही होता है । चक्षु से
संयुक्त घट में रूप का समवाय होने से [ चक्षु इन्द्रिय और घटरूप अर्थ का 'संयुक्त-
समवाय' सन्निकर्ष होता है । ]
इसी प्रकार [ अन्तरिन्द्रिय ] मन से आत्मा में रहने वाले सुखादि [ गुणों के
ग्रहण होने पर यह [ संयुक्तसमवाय ] सन्निकर्ष ही होता है।
[ घटगत रूपादि गुणों के समान घटगत परिमाणादि का ग्रहण भी 'संयुक्त
समवाय' सम्बन्ध से ही होता है परन्तु ] घटगत परिमाण आदि के ग्रहण में
[ इन्द्रिय और अर्थ दोनों के अवयव, दोनों के अवयवी, पहिले का अवयव और
दूसरे का अवयवी या दूसरे का अवयव और पहिले का अवयवी इस प्रकार इन
चार के ] 'चतुष्टय सन्निकर्ष' को भी अतिरिक्त कारण मानना अभीष्ट है !